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Saturday, 3 May 2014

Maa Tara Chaleesa - माँ तारा चालीसा - Tara Chalisa - तारा चालीसा

माँ तारा चालीसा




जय तारा जगदम्ब जै - जय कृपाद्रष्टि की खान।
कृपा करो सुरेश्वरि - मोहि शरण तिहारी जान।।

  1. माता तुम ही जगत की पालन हारी - तुम ही भक्तन कि भयहारी। 
  2. तुम ही आदिशक्ति कलिका माइ - तुम ही सन्त जनों की सुखदायी। 
  3. तारणी तरला तन्वी कहलाती - निज जनो की मंगलदाता कहलाती। 
  4. तारा तरुणा बल्लरी तुम ही - तीररुपातरी श्यामा तनुक्षीन हो तुम ही। 
  5. बामा खेपा की पालन कर्त्री - माँ तुम ही कहलाती हो सिद्धि दात्री। 
  6. माता रूप तुम्हारा अति पावन - भक्तन की हो तुम मनभावन। 
  7. तुमसे इतर नहीं कछु दूजा - तुम हो सुर-नर मुनि जन की भूपा। 
  8. तुम ही माता नागलोक मे बसती - जन-जन की विपदा हरती। 
  9. तुम ही माता कहलाती प्रलयंकारी - सकल त्रैलोक्य की भयहारी।
  10. माँ तुमने ही शिव प्राण बचाये - तुम्हरे सुमिरन से विष पार ना पाए। 
  11. दस महाविद्या क्रम मे तुम आती - द्वितीय विद्या तुम कहलाती। 
  12. माता तुम ही सरस्वती कहलाती - तुम ही हो ज्ञान की अधिष्ठात्री। 
  13. नील सरस्वती है नाम तिहारो - चहूँ लोक फैलो जगमग उजियारो। 
  14. श्मशान प्रिय श्मशाना कहलाती - एकजटा जगदम्बा कहलाती। 
  15. माता शिव तुम्हरी गोद विराजे - मुण्डमाल गले मे अति साजे। 
  16. बाम मार्ग पूजन तुम्को अति प्यारा - शरणागत की तुम हो सहारा। 
  17. वीरभूमि कि माता तुम वासिनी - तुम ही अघोरा तुम ही विलासिनी। 
  18. तुम्हरो चरित जगत आधारा - तुमसे ही माँ चहुँ दिशि उजियारा। 
  19. तुम्हरो चरित सदा मै गाउं - तुमहि मात रूप मे पाऊं। 
  20. चिंता सगरी हरो महतारी - तुम्हरो आसरा जगत मे भारी। 
  21. तुरीया तरला तीव्रगामिनी तुमही - नीलतारा उग्रा विषहरी भी तुमही। 
  22. तुम परा परात्परा अतीता कहलाती - वेदारम्भा वेदातारा कहलाती 
  23. अचिन्तयामिताकार गुणातीता - बामाखेपा रक्षिता बामाखेपा पूजिता। 
  24. अघोरपूजिता नेत्रा नेत्रोत्पन्ना तुमहि - दिव्या दिव्यज्ञाना भी तुमहि। 
  25. सब जन मन्त्र रूप तुमहि माँ जपहि - त्रीं स्त्रीं रूप का ध्यान सब धरहिं । 
  26. मुझ पर माँ कृपाल हो जाओ - अपनी कृपा का अमिय जल बरसाओ।
  27. काली पुत्र निशदिन तुम्हे मनावे - निश-वासर माँ तुमको ध्यावे।
  28. खडग खप्पर तुम्हरे हस्त विराजे - खष्टादश तुम्हरी कळा अति साज़े। 
  29. तुमने माता अगम्य चरित दिखलायो - अक्षोभ ऋषि को मान बढ़ायो। 
  30. माता तारा मोरे हिय आय विराजो - नील सरस्वती बन साजो। 
  31. तुम ही भक्ति भाव की अमित सरूपा - अखिल ब्रह्माण्ड की भूपा। 
  32. बिन तुम्हरे नहि मोक्ष अधिकार - तुमसे है माता जगत का बेङा पार। 
  33. आकर मात मोहि दरस दिखाओ - मम जीवन को सफल बनाओ। 
  34. रमाकांत है तुम्हारि शरण मे - दीजो माता मोहि जगह चरण मे। 
  35. जो मन मन्दिर मे तुमहि बसावे - उसका कोई बाल न बांका कर पावे। 
  36. तुम्ही आदि शक्ति जगदीशा - ब्रह्मा विष्णु शिव सब नवायें शीशा। 
  37. तुम ही चराचर जगत कि पालनहारी - तुम ही प्रलय काल मे नाशनकारी। 
  38. जो नर पढ़ें निरन्तर तारा चालीसा - बिनश्रम होए सिद्ध साखी गौरीशा।
  39. जो नर-सुर मुनि आवे तुम्हरे धामा - सफल होयें उनके सब कामा। 
  40. जय जय जय माँ तारा - दीन दुखियन की तुम हो मात्र सहारा। 

निशदिन माता तारिणी तुम्हे नवाऊँ माथ ।

हे जगदम्ब दीज्यो मोहि सदा तिहारो साथ । ।
बिन तुम्हरे इस जगत मे नहि कोइ आलम्ब ।
तुमही पालनहार हो दक्षिणवासिनी जगदम्ब । ।


Monday, 31 March 2014

Tara Kali - तारा काली

Tara Kali - तारा काली



माता तारा दस दस महाविद्याओं में से दुसरे क्रम में आती हैं - हालाँकि मान्यताओं के आधार पर ये काली कुल में आती हैं और इनकी सिद्धि सिर्फ वाम मार्गीय साधना से ही हो सकती है -!


पहले हम ये देख लेते हैं कि कुल क्या हैं ?


दस महाविद्या परिवार में आद्या माता महाकाली के दस रूप पूजित होते हैं जो निम्न प्रकार हैं :-

  1. महाकाली 
  2. तारा 
  3. त्रिपुरसुंदरी 
  4. भुवनेश्वरी 
  5. त्रिपुर भैरवी 
  6. धूमावती 
  7. छिन्नमस्ता 
  8. बगला 
  9. मातंगी 
  10. कमला 
उपरोक्त दसों रूप अत्यंत ही मंगलकारी और कल्याणकारी हैं और हर एक रूप सम्पूर्ण तथा भक्तों को सब कुछ प्रदान करने में समर्थ है - इसलिए जैसा कि मैंने कई बार देखा है कि अक्सर साधक वर्ग संदेह में रहता है और यदि उसे कोई समस्या आती है तो वह कई लोगों से संपर्क करता है और यदि वह समस्या आसानी से समाप्त नहीं होती तो उसको ये है कि जिनकी साधना मैं कर रहा हूँ वे या तो भक्त वत्सल नहीं हैं या फिर मेरी सहायता करना नहीं चाहती हैं - इसी समय यदि कोई दूसरा साधक उसे अपनी इष्ट के बारे में बताता है तो उसे लगने लगता है कि ये वाली माता बहुत अच्छी हैं और फिर कई बार साधक अपनी साधना छोड़कर दूसरे रूप के पीछे भागने लग जाता है जो किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है -!

क्योंकि कहते हैं कि जो इष्ट और मंत्र को बदलता है उससे बड़ा अपराधी कोई और नहीं होता -!

दस महाविद्या साधना को दो मुख्य धाराओं में बांटा जाता है जिसमे से एक धारा का नाम काली कुल और दूसरी धारा का नाम श्री कुल कहा गया है -!

कथित तौर पर या पूर्व वर्णित आख्यानों और गुरुओं के आधार पर काली कुल में सम्मिलित महाविद्याओं की सिद्धि के लिए वाम मार्ग का अनुसरण आवश्यक है एवं श्री कुल कि महाविद्याओं को प्रसन्न या सिद्ध करने के लिए दक्षिण मार्ग का अनुसरण किया जाना चाहिए -!

इसीलिए विज्ञजनों में कई बार इस सम्बन्ध में मतभेद भी होता है और यह मतभेद कई बार वाद और विवाद में भी परिवर्तित हो जाता है - क्योंकि सैद्धांतिक रूप से कोई भी साधक दोनों मार्गों का अनुसरण नहीं कर सकता जिसकी वजह से यदि कोई यह कहे कि उसने दसों महाविद्याओं को सिद्ध कर लिया है तो यह बात हास्यास्पद भी लगती है और साथ ही विवादित भी -!

लेकिन यहाँ पर मैं एक बात का और उल्लेख करना चाहूंगा की यह मेरे हिसाब से मुश्किल भी नहीं है और न ही विवादित तथा न ही हास्यास्पद - क्योंकि मार्गगत प्रतिबन्ध सिर्फ सिद्धियों पर लागु होता है साधना पर नहीं -!

साधना एक विस्तृत अर्थ रखने वाला शब्द है और इसे किसी एक अर्थ में बाँध कर नहीं रखा जा सकता है - साधना एक मार्ग है जिसके रास्ते में बहुत से पड़ाव आते हैं जिनमे से एक पड़ाव सिद्धि नाम का भी होता है - बहुत से मित्रों को देखा है - हर इंसान लघु मार्ग का चयन करके अधिकाधिक प्राप्त कर लेना चाहता है - लेकिन यह किसी कि समझ में नहीं आता कि लघु मार्ग कि आयु भी लघु ही होती है - मेरे पास जितने भी प्रश्न आते हैं सब के सब या तो सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुक होते हैं या फिर वशीकरण जैसी तुच्छ चीज के इच्छुक - मैं उनसे पूछता हूँ :- " यह साधना आप क्यों करना चाहते हो " ? जवाब मिलता है = " शुरू से ही मेरी इच्छा थी कि मैं भी साधना करूँ " मुझे अच्छा लगता है ये जानकर और सोचता हूँ कि चलो अभी भी कुछ लोग हैं जो इस दिशा में बढ़ना चाहते हैं - इसके बाद बातों के दौरान ही मैं पूछता हूँ :- " तो आप यह साधना कुछ समय के लिए / किसी खास उद्देश्य कि पूर्ति के लिए चाहते हैं या फिर आजीवन " ? जवाब आता है = " कुछ चाहते हैं उन्हें प्राप्त करना चाहता हूँ - अभी आजीवन के बारे में तो नहीं सोचा लेकिन हां इस बारे में बाद में सोचूंगा - अचानक उसका मन करवट बदलता है और सवाल आता है " अच्छा एक चीज बताओ आप - क्या आप माता के दर्शन करवा सकते हो मुझे " ?


मैं स्तब्ध रह जाता हूँ और जवाब देता हूँ :- " भाई अभी तक तो मैं खुद भी दर्शन नहीं पा सका तो फिर आप से कैसे ये वादा करूँ - हाँ यदि आपके समर्पण में दम हुआ तो यह कोई मुश्किल नहीं है -!


और बस इसके बाद फिर कई दिनों तक निश्तब्धता तत्पश्चात फिर कुछ दिनों के बाद सन्देश आता है " आपके पास यदि कोई शक्तिशाली वशीकरण प्रयोग तो देने कि कृपा करें लेकिन उसमे विधि विधान का ज्यादा झंझट न हो "


मैं उपेक्षित कर देता हूँ सन्देश को और फिर लग जाता हूँ तलाश में किसी अन्य साधक की :::

::: माता तारा :::


सभी विज्ञजनो एवं पूर्व में कर चुके सभी अनुभवी साधकों से मेरा विनम्र निवेदन है कि यदि मेरे इस लिखे विधान में कोई त्रुटि नजर आये तो कृपया मुझे सुझाव प्रदान करें जिससे यह विधान जनहित में और भी अधिक परिष्कृत हो सके - इसके अतिरिक्त सभी नए एवं पुराने साधकों के समक्ष यह स्पष्ट कर दूँ कि यह विधान कोई सिद्धि विधान नहीं यह मातृ इष्ट निर्धारण और आजीवन पूजा पद्धति है - मैं वस्तुतः सिद्धियों के पूर्णतया खिलाफ हूँ और बस समर्पण और प्रेम के माध्यम से महाविद्याओं के चरणों में जगह बनाना चाहता हूँ एवं अन्य उन साधकों के लिए भी ये विधान समर्पित करना चाहता हूँ जो सामयिक सफलता के स्थान पर सर्वकालिक क्षमताओं को विकसित और पल्लवित करना चाहते हैं -!

सिद्धिगत सफलता के लिए माँ तारा कि साधना में वाम मार्ग का अनुसरण करना आवश्यक है - किन्तु यदि हम सिद्धि की जगह भक्ति पर दें तो हम उनकी कृपा किसी भी मार्ग से प्राप्त कर सकते हैं और मैं सात्विक / दक्षिण मार्ग का समर्थक हूँ अतएव मैं इसी मार्ग के विधान यहाँ प्रस्तुत करूँगा -!

किसी भी साधना के मार्ग में गुरु का बहुत बड़ा स्थान होता है एवं सर्वप्रथम गुरु का पूजन होता है इसलिए यदि पहले से ही आपके पास गुरु हैं और आपने गुरु मंत्र लिया हुआ है तो अपने गुरु का एक चित्र या गुरु प्रदत्त यन्त्र को अपने साथ रखें किन्तु यदि आपके पास कोई गुरु नहीं है तो निराश होने कि कोई जरुरत नहीं है आप मेरे गुरु को अपना गुरु स्वीकार करके अपनी साधना प्रारम्भ कर सकते हैं - मेरे गुरु को अपना गुरु स्वीकार करने के लिए आपको कुछ भी खास नहीं करना बस मुझे एक सन्देश भेजें मैं अपने गुरु कि तस्वीर आपको भेज दूंगा और तस्वीर को आप अपने पूजा स्थल में रखकर अपनी साधना के पथ पर आगे बढ़ सकते हैं :::


साधना मार्ग में आगे बढ़ने से पहले एक बात :- माता तारा का मंत्र " त्रीं " है किन्तु "त्रीं" बीजमंत्र वशिष्ट  ऋषि द्वारा शापित कर दिया गया था अतएव "स्त्रीं " को बीज मंत्र के रूप में जपा जाता है इसमें " आधा स " लगाने से शाप विमोचन हो जाता है एवं माँ तारा कि साधना अक्षोभ ऋषि कि पूजा के बिना फलप्रद नहीं होती तथा यदि कोई साधक इस साधना को अक्षोभ ऋषि कि पूजा किये बिना करता है तो वह अपने सर्वस्व का नाश कर बैठता है -!

माता कि साधना में अधिकतम वस्तुएं नीले रंग कि प्रयोग की जानी चाहिए :-

पूजन सामग्री :-


एक आसन - नीला रंग - माँ कि स्थापना के लिए 

एक आसन - नीला रंग - आपकी साधना के लिए 

एक ताम्बे कि प्लेट - गुरु चित्र स्थापित करने के लिए 

एक ताम्बे का -लोटा - जल रखने के लिए 

एक ताम्बे कि छोटी चमची - जल एवं आचमन समर्पण के लिए 

एक माला - मंत्र जप के लिए ( काला हकीक / रुद्राक्ष / लाल मूंगा )

गुरु का चित्र , आम की लकड़ी से बना सिंहासन या फिर जो भी उपलब्ध हो सामर्थ्य के अनुसार , सिंहासन वस्त्र ( जो सिंहासन पर बिछाया जायेगा ) माता को समर्पित करने के लिए वस्त्र , माता के लिए श्रंगार सामग्री , साधक के खुद के लिए कपडे जो नीले रंग के होने चाहिए तथा यदि किसी पुरोहित की मदद लेते हैं पूजा में तो पुरोहित के लिए कपडे ( पुरोहित को समर्पित किये जाने वाले कपड़ो में रंग भेद नहीं होगा ) जनेउ , लाल अबीर

२. पान के पत्ते , सुपारी , लौंग , काले तिल , सिंदूर , लाल चंदन ,गाय का घी , गाय का दूध , गाय का गोबर

३. धूप , सुगन्धित अगरबत्ती , रुई , कपूर , पञ्चरत्न , कलश के लिए मिटटी का घड़ा , नारियल ( एक कच्चा और एक सूखा )

४. केले , फल पांच प्रकार के , पांच प्रकार की मिठाई

५. पुष्प , विल्व पत्र ( बेल पत्र ) , आम के पत्ते , केले के पत्ते , गंगाजल , अरघी , पांच बर्तन कांसे के / पीतल के ( २ कटोरी , २ थाली , १ गिलास )

६. आसन कम्बल के - नीला रंग -२ ( यदि पुरोहित साथ में हों तो २ अन्यथा १ ) चौमुखी दीपक , रुद्राक्ष या लाल चन्दन की माला , आम की लकड़ी , माचिस , दूर्वादल ( दूब ) , शहद , शक्कर , पुस्तक ( जिसके विधि विधान से साधना की जानी है ) , जौ , अभिषेक करने के लिए पात्र , विग्रह ( स्नान के बाद और नवेद्य समर्पित करने के पश्चात ) पोंछने के लिए नीला कपडा , शंख , पंचमेवा , मौली , सात रंगों में रंगे हुए चावल , एवं भेंट में प्रदान करने के लिए द्रव्य ( दक्षिणा धन ) !

नित्य पूजा प्रकाश में वर्णित कुछ पूजन से सम्बंधित तथ्य :-

अक्षत :- कम से कम सौ की मात्रा में हों

दूर्वा :- कम से कम सौ की मात्रा में हों

आसन :- आसन समर्पण के समय आसन में पुष्प भी चढाने चाहिए

पाद्य :- चार आचमनी जल उसमे श्यामा घास ( दूर्वा / दूब ) कमल पुष्प देने चाहिए

अर्घ्य :- चार आचमनी जल , गंध पुष्प , अक्षत ( चावल ) दूर्वा , काले तिल , कुशा , एवं सफ़ेद सरसों

आचमन में :- छः आचमनी जल तथा लौंग

मधुपर्क :- कांश्य / ताम्बे के पात्र में घी , शहद , दही

स्नान/ विग्रह :- पचास आचमनी जल

वस्त्र :- वस्त्रों का जोड़ा भेंट करना चाहिए

आभूषण :- स्वर्ण से बने हुए हों या फिर सामर्थ्यानुसार अथवा यदि उपलब्धता न हो तो सांकेतिक या मानसिक आभूषण समर्पण

गंध :- चन्दन , अगर और कर्पूर को एक साथ मिलकर बनाया गया हो

पुष्प :- कई रंग के हों और कम से कम पचास हों

धूप :- गुग्गल का धूप अति उत्तम होता है और कांश्य / ताम्र पात्र में समर्पित करना चाहिए

नैवेद्य :- कम से कम एक व्यक्ति के खाने लायक वस्तुएं होनी चाहिए

दीप :- कपास की रुई में कर्पूर मिलकर लगभग चार अंगुल लम्बी बत्ती होनी चाहिए

सारी सामग्री को अलग अलग बर्तन में होना चाहिए और बर्तन / पात्र स्वर्ण/ रजत / कांश्य / पीतल / ताम्र से निर्मित हों .... या फिर मिटटी के बने हुए हों

पूजन प्रारम्भ :::

१. गणेश पूजन ::

आवाहन :- गदा बीज पूरे धनु शूल चक्रे
सरोजोत्पले पाशधान्या ग्रदन्तानकरै संदधानं
स्वशुंडा ग्रराजन मणीकुंभ मंकाधि रूढं स्वपत्न्या
सरोजन्मा भुषणानाम्भ रेणोज्जचलम
द्धस्त्न्वया समालिंगिताम करीद्राननं चन्द्रचूडाम
त्रिनेत्र जगन्मोहनम रक्तकांतिम भजेत्तमम

गणपति पंचोपचार पूजन :::

ॐ गंगाजले स्नानियम समर्पयामि श्री गणेशाय नमः

ॐ अक्षतं समर्पयामि भगवते श्री गणपति नमः

ॐ वस्त्रं समर्पयामि भगवान् श्री गणपति नमः

ॐ चन्दनं समर्पयामि भगवान् गणपति इदं आगच्छ इहतिष्ठ

ॐ विल्वपत्रम समर्पयामि भगवते श्री गणपति नमः

ॐ पुष्पं समर्पयामि भगवान् श्री गणपति नमः

ॐ नवेद्यम समर्पयामि भगवान् गणपति इदं आगच्छ इहतिष्ठ

इस प्रकार पंचोपचार पूजन के पश्चात् हाथ जोड़कर भगवान् गणपति की अराधना निम्न स्तोत्र के द्वारा करें :::

विश्वेश माधवं ढुंढी दंडपाणि बन्दे काशी

गुह्या गंगा भवानी मणिक कीर्णकाम

वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्य सम प्रभ

निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा

सुमश्वश्यैव दन्तस्य कपिलो गज कर्ण कः

लम्बरोदस्य विकटो विघ्ननासो विनायकः

धूम्रकेतु गर्णाध्यक्ष तो भालचन्द्रो गजाननः

द्वादशैतानि नमामि च पठेच्छणु यादपि

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते

शुक्लां वर धरं देवं शशि वर्ण चतुर्भुजम

प्रसन्न वदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोप शान्तये

अभीष्ट सिध्धार्थ सिद्ध्यर्थं पूजितो य सुरासुरै

सर्व विघ्नच्छेद तस्मै गणाधिपते नमः

इसके पश्चात् सद्गुरु का आवाहन और पूजन करें :-

गुरु आवाहन मंत्र :-

सहस्रदल पद्मस्थ मंत्रात्मा नमुज्ज्वलम

तस्योपरि नादविन्दो मर्घ्ये सिन्हास्नोज्ज्वले

चिंतयेन्निज गुरुम नित्यं रजता चल सन्निभम

वीरासन समासीनं मुद्रा भरण भूषितं

इसके पश्चात् गुरु देव का पंचोपचार विधि से पूजन करें :-

ॐ गंगाजले स्नानियम समर्पयामि श्री गुरुभ्यै नमः

ॐ अक्षतं समर्पयामि भगवते श्री गुरुभ्यै नमः

ॐ वस्त्रं समर्पयामि भगवान् श्री गुरुभ्यै नमः

ॐ चन्दनं समर्पयामि भगवान् गुरुभ्यै इदं आगच्छ इहतिष्ठ

ॐ विल्वपत्रम समर्पयामि भगवते श्री गुरुभ्यै नमः

ॐ पुष्पं समर्पयामि भगवान् श्री गुरुभ्यै नमः

ॐ नवेद्यम समर्पयामि भगवान् गुरुभ्यै इदं आगच्छ इहतिष्ठ


इसके पश्चात् गुरुस्तोत्र का पाठ करें :-

श्री गुरुस्तोत्रम् :-


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥२॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशालाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३॥

स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं येन कृत्स्नं चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४॥

चिद्रूपेण परिव्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५॥

सर्वश्रुतिशिरोरत्नसमुद्भासितमूर्तये ।
वेदान्ताम्बूजसूर्याय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥६॥

चैतन्यः शाश्वतः शान्तो व्योमातीतोनिरञ्जनः ।
बिन्दूनादकलातीतस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥७॥

ज्ञानशक्तिसमारूढस्तत्त्वमालाविभूषितः ।
भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥८॥

अनेकजन्मसम्प्राप्तकर्मेन्धनविदाहिने ।
आत्मञ्जानाग्निदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९॥

शोषणं भवसिन्धोश्च प्रापणं सारसम्पदः ।
यस्य पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१०॥

न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः ।
तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥११॥

मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः ।
मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१२॥

गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम् ।
गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१३॥

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुंतं नमामि ॥१४॥

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इसके पश्चात् पृथ्वी शुद्धि करण कर लें
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प्रथ्वी शुद्धि मंत्र :-

ॐ अपरषन्तु ये भूता ये भूता भूवि संस्थिता

ये भूता विघ्नकर्ता रश्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया

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इसके पश्चात् अक्षोभ ऋषि का पंचोपचार विधि से पूजन करें :-

ॐ गंगाजले स्नानियम समर्पयामि श्री अक्षोभ ऋषये नमः

ॐ अक्षतं समर्पयामि भगवते श्री अक्षोभ ऋषये नमः

ॐ वस्त्रं समर्पयामि भगवान् श्री अक्षोभ ऋषये नमः

ॐ चन्दनं समर्पयामि श्री अक्षोभ ऋषये नमः

ॐ विल्वपत्रम समर्पयामि श्री अक्षोभ ऋषये नमः

ॐ पुष्पं समर्पयामि भगवान् श्री अक्षोभ ऋषये नमः

ॐ नवेद्यम समर्पयामि श्री अक्षोभ ऋषये नमः
तत्पश्चात निम्न मंत्र को २१ /५१ /एक माला जाप कर लें

" ॐ अक्षोभ्य ऋषये नम: "
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इसके पश्चात् माता के पूजन की प्रक्रिया प्रारंभ होता होती जिसमे सर्व प्रथम संकल्प के लिए हाथ की अंजुली पर पान , सुपारी , द्रव्य ( धन ) गंगाजल , अक्षत , पुष्प , तिल लेकर निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें :-

ॐ विष्णु विश्नुर्विष्णु श्री मद भगवतो महा पुरुषस्य विष्णो राज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्राह्मणोंह्विं द्वितीय प्रह्रार्द्धे , श्री श्वेत वाराह कल्पे वैवस्त- मन्वन्तरे अष्टान्विशा तितमे युगे कलियुगे कलिप्रथम चरणे भूर्लोक जम्बू द्विपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्त देशे " अमुक नगरे " " अमुक ग्रामे " " अमुक स्थाने " वा बुद्धावतारे " अमुक नाम " संवत्सरे श्री सूर्य " अमुकायने " " अमुक तौ महा मांगल्य प्रद मासोत्तमे मासे " " अमुक मासे " " अमुक पक्षे " " अमुक तिथौ " " अमुक नक्षत्रो " " अमुक वासरे " " अमुक योगे " " अमुक करणे " " अमुक राशि स्थिते " देव गुरौ शेषेसु ग्रहेषु च यथा " अमुक शर्मा " महात्मनः मनोकामना पूर्ति , धन , जन , सुख सम्पदा प्रसन्नता परिवार सुख शांतिः , ग्राम सुख शांतिः हेतु , सफलता हेतु श्री तारा पूजन - कलश स्थापन - हवन - कर्म - आरती कर्म अहम् करिश्येत :::

प्रथम पूजन खंड

स्तुति :-

प्रत्यालीढ़ पदार्पिताग्ध्रीशवहृद घोराटटहासा
पराखड़गेन्दीवरकर्त्री खर्परभुजा हुंकार बीजोद्भवा,
खर्वानीलविशालपिंगलजटाजूटैकनागैर्युताजाड्यन्न्यस्य
कपालिके त्रिजगताम हन्त्युग्रतारा स्वयं


आवाहन :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं आगच्छय आगच्छय ::

आसन :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं आसनं समर्पयामि ::

पाद्य :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं पाद्यं समर्पयामि ::

अर्घ्य :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं अर्घ्यं समर्पयामि ::

आचमन :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं आचमनीयं निवेदयामि ::

मधुपर्क :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं मधुपर्कं समर्पयामि ::

आचमन :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं पुनराचमनीयम् निवेदयामि ::

स्नान :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं स्नानं निवेदयामि ::

वस्त्र :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं प्रथम वस्त्रं समर्पयामि ::

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि ::

आभूषण :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं आभूषणं समर्पयामि ::

सिन्दूर :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं सिन्दूरं समर्पयामि ::

कुंकुम :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं कुंकुमं समर्पयामि ::

गन्ध / इत्र :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि ::

पुष्प :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं पुष्पं समर्पयामि ::

धूप / अगरबत्ती :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं धूपं समर्पयामि ::

दीप :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं दीपं दर्शयामि ::

नैवेद्य :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं नैवेद्यं समर्पयामि ::


मध्यम पूजन खंड :-

नैवेद्य समर्पण के बाद पूजन का मध्यम क्रम आरम्भ होता है जिसमे शप्तशती पाठ एवं अन्य कर्म सम्पादित किये जाते हैं :-

अष्टोत्तरशत नाम :- 108 Name of Mata Tara Kali 

  1. तारणी 
  2. तरला 
  3. तन्वी 
  4. तारातरुण 
  5. बल्लरी
  6. तीररूपातरी 
  7. श्यामा 
  8. तनुक्षीन 
  9. पयोधरा 
  10. तुरीया 
  11. तरला 
  12. तीब्रगमना 
  13. नीलवाहिनी
  14. उग्रतारा
  15. जया 
  16. चंडी 
  17. श्रीमदेकजटाशिरा
  18. परा 
  19. परात्परा 
  20. अतीता 
  21. चित्परा 
  22. तत्परा 
  23. तदतीता 
  24. सर्वातीता
  25. महानीला 
  26. शिवपालिनी 
  27. शिवपोषिणी 
  28. शिवमाता 
  29. विषहरा 
  30. नीलतारा 
  31. श्यामला 
  32. उग्रा 
  33. भक्तपालिनी 
  34. भवतारिणी 
  35. द्वितीया 
  36. एकांका 
  37. जगत्पालिनी 
  38. भयहारिणी 
  39. भक्तवत्सला 
  40. सरस्वती 
  41. नील सरस्वती 
  42. वेदारंभा 
  43. वेदाधारा 
  44. विजया 
  45. मंगला 
  46. कपालिका 
  47. श्मशाना 
  48. श्मशानप्रिय 
  49. खड्गधारिणी
  50. खर्परा 
  51. हुंकारा
  52. जगत हंत्री 
  53. घोराटटहासा
  54. विशाला 
  55. नाग आभूषणा 
  56. गरलहर्ता
  57. सुधा 
  58. सुधादायिनी 
  59. शिवप्राणरक्षिता 
  60. अम्बिका 
  61. अम्बा 
  62. आनंदा 
  63. अक्षोभ पूजिता 
  64. काली 
  65. कृष्णा 
  66. कृष्णवर्णा
  67. देवपालिनी 
  68. सर्वदेव प्रपूजिता
  69. आद्या 
  70. अघोरा 
  71. वामा खेपा पूजिता 
  72. वामा खेपा माता 
  73. वामा खेपा रक्षिता 
  74. कालहर्त्री 
  75. कपर्दिनी 
  76. कुलपूजिता 
  77. कृत्या 
  78. कृशांगी 
  79. कुलपालिका 
  80. कंकाली 
  81. मुण्डमालधारिणी 
  82. शववाहिनी 
  83. श्मशानालयवासिनी 
  84. अचिन्त्यामिताकार 
  85. शक्तिस्वरूपा 
  86. गुणातीता 
  87. परम्ब्रह्मरूपिणी 
  88. सिद्धा 
  89. सिद्धिदात्री 
  90. अघोर प्रपूजिता
  91. नेत्रा 
  92. नेत्रोत्पन्ना 
  93. अघोरा काली 
  94. अनादिरूपा 
  95. अनन्ता 
  96. दिव्या 
  97. दिव्य ज्ञाना 
  98. महामाया 
  99. सुखदा 
  100. सुखमूला 
  101. दुष्टमुण्ड विदारिणी 
  102. दुष्ट हंता 
  103. दानव विदारिणी 
  104. भक्त रक्षिता 
  105. ज्ञानदा 
  106. मोक्षदा 
  107. सत्वैक मूर्ति 
  108. सिद्ध प्रपूजिता 


तारास्तोत्रम् - Tara Stotram


श्रीगणेशाय नमः 

मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसम्पत्प्रदे
प्रत्यालीढपदस्थिते शवहृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।
फुल्लेन्दीवरलोचने त्रिनयने कर्त्रीकपालोत्पले खङ्गं
चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥१॥

वाचामीश्वरि भक्तिकल्पलतिके सर्वार्थसिद्धिश्वरि
गद्यप्राकृतपद्यजातरचनासर्वार्थसिद्धिप्रदे ।
नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारान्निधे
सौभाग्यामृतवर्धनेन कृपयासिञ्च त्वमस्मादृशम् ॥२॥

खर्वे गर्वसमूहपूरिततनो सर्पादिवेषोज्वले
व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते ।
सद्यःकृत्तगलद्रजःपरिमिलन्मुण्डद्वयीमूर्द्धज-
ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय ॥३॥

मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्द्धचन्द्राम्बिके
हुम्फट्कारमयि त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशः ।
मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा
परा वेदानां नहि गोचरा कथमपि प्राज्ञैर्नुतामाश्रये ॥४॥

त्वत्पादाम्बुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतां
तस्याः श्रीपरमेश्वरत्रिनयनब्रह्मादिसाम्यात्मनः ।
संसाराम्बुधिमज्जने पटुतनुर्देवेन्द्रमुख्यासुरान्
मातस्ते पदसेवने हि विमुखान् किं मन्दधीः सेवते ॥५॥

मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिणस्ते
देवा जयसङ्गरे विजयिनो निःशङ्कमङ्के गताः ।
देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्द्धां वहन्तः परे
तत्तुल्यां नियतं यथा शशिरवी नाशं व्रजन्ति स्वयम् ॥६॥

त्वन्नामस्मरणात्पलायनपरान्द्रष्टुं च शक्ता न ते
भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षश्च नागाधिपाः ।
दैत्या दानवपुङ्गवाश्च खचरा व्याघ्रादिका जन्तवो
डाकिन्यः कुपितान्तकश्च मनुजान् मातः क्षणं भूतले ॥७॥

लक्ष्मीः सिद्धिगणश्च पादुकमुखाः सिद्धास्तथा वैरिणां
स्तम्भश्चापि वराङ्गने गजघटास्तम्भस्तथा मोहनम् ।
मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिद्ध्यन्ति ते ते गुणाः
क्लान्तः कान्तमनोभवोऽत्र भवति क्षुद्रोऽपि वाचस्पतिः ॥८॥

ताराष्टकमिदं पुण्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः ।
प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः ॥९॥

लभते कवितां विद्यां सर्वशास्त्रार्थविद्भवेत्
लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् ।
कीर्तिं कान्तिं च नैरुज्यं प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात् ॥१०॥

॥इति श्रीनीलतन्त्रे तारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
   


।। तारा प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् ।। Tara Pratyangira Kawcham 
।।




।। ॐ प्रत्य़ञ्गिरायै नमः ।।


ईश्वर उवाच 

ॐ तारायाः स्तम्भिनी देवी मोहिनी क्षोभिनी तथा ।
हस्तिनी भ्रामिनी रौद्री संहारण्यापि तारिणी ।
शक्तयोहष्टौ क्रमादेता शत्रुपक्षे नियोजितः ।
धारिता साधकेन्द्रेण सर्वशत्रु निवारिणी ।।

ॐ स्तम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय ।
ॐ क्षोभिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् क्षोभय क्षोभय ।
ॐ मोहिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् मोहय मोहय ।
ॐ जृम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् जृम्भय जृम्भय ।।

ॐ भ्रामिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् भ्रामय भ्रामय ।
ॐ रौद्री स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् सन्तापय सन्तापय ।
ॐ संहारिणी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् संहारय संहारय ।
ॐ तारिणी स्त्रें स्त्रें सर्व्वपद्भ्यः सर्व्वभूतेभ्यः सर्व्वत्र
रक्ष रक्ष मां स्वाहा ।।

य इमां धारयेत् विध्यां त्रिसन्ध्यं वापि यः पठेत् ।
स दुःखं दूरतस्त्यक्त्वा ह्यन्याच्छत्रुन् न संशयः ।
रणे राजकुले दुर्गे महाभये विपत्तिषु ।
विध्या प्रत्य़ञ्गिरा ह्येषा सर्व्वतो रक्षयेन्नरं ।।

अनया विध्या रक्षां कृत्वा यस्तु पठेत् सुधी ।
मन्त्राक्षरमपि ध्यायन् चिन्तयेत् नीलसरस्वतीं ।
अचिरे नैव तस्यासन् करस्था सर्व्वसिद्ध्यः
ॐ ह्रीं उग्रतारायै नीलसरस्वत्यै नमः ।।

इमं स्तवं धीयानो नित्यं धारयेन्नरः ।
सर्व्वतः सुखमाप्नोति सर्व्वत्रजयमाप्नुयात् ।
नक्कापि भयमाप्नोति सर्व्वत्रसुखमाप्नुयात् ।।

।। इति रूद्रयामले श्रीमदुग्रताराया प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् समाप्तम् ।।



प्रणामाज्जलि / पुष्पांजलि :-

:: ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं महामाया त्रिगुणा या दिगम्बरी पुष्पांजलिं समर्पयामि ::

नीराजन :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं नीराजनं समर्पयामि ::

दक्षिणा :-

::ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं दक्षिणां समर्पयामि ::

अपराधा क्षमा याचना  :-

अपराधसहस्राणि क्रियंतेऽहर्निशं मया । 
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥१॥
 
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । 
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥२॥ 

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । 
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥३॥ 

अपराधशतं कृत्वा जगदंबेति चोचरेत् । 
यां गर्ति समबाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥४॥ 

सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदंबिके । 
ड्रदानीमनुकंप्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥५॥ 

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् च । 
तत्सर्व क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥६॥ 

कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानंदविग्रहे । 
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥७॥ 

गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । 
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ॥८॥

आरती :-

मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े।
पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले तारा तेरी भेंट करे।।

सुन जगदम्बा कर न विलम्बा, संतन के भण्डार भरे।
संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जय काली कल्याण करे ।।

बुद्वि -विधाता तू जग माता, मेरा कारज सिद्व करे।
चरण कमल का लिया आसरा, शरण तुम्हारी आन परे ।।

जब -जब भीड़ पड़े भक्तन पर, तब -तब आय सहाय करे ।
बार -बार ते सब जग मोहयो, तरूणी रूप अनूप धरे ।।

माता होकर पुत्र खिलावे, भार्या होकर भोग करे।
संतन सुखदाई सदा सहाई, संत खड़े जयकार करे ।।

ब्रह्मा विष्णु महेश फल लिए, भेंट देन तेरे द्वार खड़े ।
अटल सिंहासन बैठी माता, सिर सोने का छत्र फिरे ।।

बार शनिश्चर कुम कुम बरणी, जब लांगुर पर हुक्म करे ।
खड़ग खप्पर त्रिशूल हाथ लिए, रक्तबीज को भस्म करे ।।

शुम्भ निशुम्भ पछाड़े माता, महिषासुर को पकड़ दले ।
आदित बार आदि का राजत, अपने जन का कष्ट हरे ।।

कोप करा जब दानव मारे, चण्ड मुण्ड सब चूर करे ।
सौम्य  स्वभाव धरयो मेरी माता, जन की अर्ज कबूर करे ।।

सिंह पीठ पर चढ़ी भवानी, अटल भवन में राज करे।
मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े ।।

प्रदक्षिणा :-यानि कानि च पापानि,
जन्मान्तर कृतानि च,
तानि तानि प्रनश्यन्ति,
प्रदक्षिणायाम् पदे पदे ।





Wednesday, 12 March 2014

Mata Mahakali Sadhna - माता महाकाली साधना

Mata Mahakali Sadhna - माता महाकाली साधना

स्पष्टीकरण :- सभी सुधी पाठकों एवं साधकों से मेरा विनम्र निवेदन है कि यदि आपको मेरे इस लेखन में और प्रकरण में किसी प्रकार का कोई विरोधाभास नजर आता है और आपको लगता है कि मुझे इसे सही या संशोधित करना चाहिए तो सहर्ष आप सबके विचार आमंत्रित हैं -!


दस महाविद्या परिवार कि प्रथम एवं प्रधान मातृका शक्ति हैं माता महाकाली - साधकों एवं ग्रंथों में वर्णित रूप एवं अवतरण वर्णन के क्रम में साधक वर्ग जो नया है वह अक्सर भ्रमित हो जाता है - बहुत से लोग या साधक इस वजह से भ्रमित होते हैं क्योंकि जो भी लोग या व्यक्ति उनका मार्गदर्शन करने वाले होते हैं वे खुद ही सम्पूर्ण ज्ञान धारण किये हुए नहीं होते है -!


अस्तु जैसे कि दुर्गा शप्तशती में या अन्य स्थानों पर विवरण मिलता है कि जब दैत्यों के साथ युद्ध में माता दुर्गा को अपनी सहायक शक्तियों कि आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने उनका आवाहन किया और परिणाम स्वरुप माता काली भी वहाँ पधारीं और शत्रुओं के संहार में अपनी भूमिका निभायी - किन्तु वह रूप वास्तव में तब सिर्फ एक मातृका या योगिनी के रूप में उद्भूत हुआ था वह वास्तविक प्राकट्य नहीं था -!


यदि गहराई से देखा जाये और विस्तृत विश्लेषण किया जाये तो माता महाकाली आद्या शक्ति हैं और इस अखिल ब्रह्माण्ड में या जहाँ भी हम या कोई देव - दानव , परा या अपरा नहीं पहुँच सकता , जिसे शेष और शारदा भी वर्णित नहीं कर सकते जिनका कोई ओर - छोर नहीं है और जो हर कण में व्याप्त हैं जिनके इशारे मात्र से प्रलय आ सकती है जिनका ग्रास खुद काल भी बन जाता है और जिन्होंने इस समस्त सृष्टि के पालन का भार भी खुद ही वहन किया है - खुद त्रिदेव भी जिनका सुमिरन आठों याम करते हैं और जगत सञ्चालन में उन्ही कि आज्ञा का अनुसरण करते हैं -!


इस अखिल ब्रह्माण्ड में जब कुछ नहीं होता तब सिर्फ अँधेरा होता है - माता महाकाली का रूप भी काला है - जब कोई तत्व शेष नहीं होता तब भी माता महामाया महाकाली विद्यमान होती हैं और जब यह श्रृष्टि चल रही होती है तब अपने विभिन्न रूपों में भक्तों का कल्याण करने के लिए विद्यमान होती हैं -!


यदि रूप के आधार पर विवेचन किया जाये तो :-


१. भगवती आद्या महाकाली दस भुजाओं से युक्त हैं :-


( इस चराचर जगत में दस दिशाएं मानी गयीं है और दसों दिशाएं उनकी पहुँच से बाहर नहीं हैं अर्थात अपने शरणागत या भक्त की रक्षा के लिए वे हमेशा तत्पर हैं दिशा कोई भी हो - स्थान कोई भी हो )


२. भगवती महाकाली कि जीभ बाहर निकली हुयी है :-


( यदि शरणागत अपने आपको माता महाकाली कि शरण में सौंप देता देता है तो माता महाकाली उसके सारे दोष और अपराध बिना किसी भेदभाव के भक्षण कर जाती हैं वह नीच से नीच और पवित्र सभी के कर्मों का प्रतिफल देने वाली और उनका नाश करने वाली ममता मयी माता हैं )


विशेष :- हालाँकि कुछ ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि माता महाकाली जब शत्रु दमन एम् व्यस्त थीं तो उस ससमय वे इतने क्रोध में आ गयीं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब शत्रु समाप्त हो गए और वे शत्रु दमन कि धुन में जो भी जड़ या जंगम / देव या दानव उनके सामने पड़ा उसका संहार करने लगीं जब समस्त देवलोक उनको शांत करने के प्रयास में असफल हो गया तो उन्होंने महादेव की प्रार्थना कि और उनसे इस परिश्थिति को सँभालने कि प्रार्थना कि जिसके जवाब में भगवान् शिव जाकर उसके रस्ते में लेट गए और जैसे ही माँ का पैर शिव के शरीर से टकराया वे गयीं और उसी समय लज्जावश उनकी जीभ बाहर निकल आयी ( क्योंकि उन्हें स्मरण हुआ कि उनके एक रूप जो कि माता पारवती का है उस रूप में भगवान् शिव पति तुल्य हुए और पति को लातों से मारना सती शर्मनाक होता है और तभी से उनके जितने भी काली रूप हैं उनमे जीभ / जिव्हा बाहर है)


किन्तु यह तत्व विवेचन नहीं है, तत्व विवेचन के आधार पर सभी देवताओं ने उनको रोकने कि कोशिश की किन्तु वे देवता होने का अहम् नहीं त्याग सके और जब तक अहम् का लेशमात्र भी बाकी है माता महाकाली कि कृपा प्राप्त होना सम्भव ही नहीं है - किन्तु देवादिदेव ने अपने अहम् का परित्याग करके खुद को ही माँ के चरणों में समर्पित कर दिया - यह देखकर माँ को रुकना ही पड़ा - क्योंकि दया कि भंडार और भक्त वत्सल अपने अधीन को न तो दुःख में देख सकती हैं और न ही अवहेलना कर सकती हैं - माँ कि जीभ बाहर आने का बस यही एक कारन था की माँ ने शर्मवश नहीं बल्कि प्रेमवश अपनी जीभ बाहर निकाल दी क्योंकि इतना त्याग और भक्त वत्सलता उन्हें किसी में नजर नहीं आयी -!


आज के परिवेश में भी अक्सर देखा जा सकता है कि जब माँ अपने किसी बच्चे के साथ खेल रही होती है और बच्चे कि कोई कोई बाल सुलभ क्रीड़ा से भाव विह्वल होकर अपनी जीभ बहार निकाल देती है - जीभ बहार निकालना स्त्रियोचित गुण है -!



३. माता महाकाली मुंडों का माला धारण किये हुए हैं :-


मुंडों कि माला धारण करने के पीछे का जो तत्व है वह इंगित करता है कि मानव शरीर में मुंड भाग ही एक ऐसा क्षेत्र है जो व्यक्ति को ब्रह्म से मिला सकता है अर्थात मोक्ष तत्व कि प्राप्ति करा सकता है - मान्यता है कि सिर का वह भाग जहाँ ब्रह्मरंध्र स्थित होता है वहाँ अमृत तत्व के गुण पाये जाते हैं - जैसा कि सुनने में भी आता है अक्सर कि कई सिद्ध योगी आज भी हिमालय के क्षेत्र में पाये जाते हैं जो यदा कदा कुछ भागयशाली लोगों को दिख भी जाते हैं - तो यहाँ पर एक सवाल पैदा होता है कि यह मृत्यु लोक है और यहाँ कि समस्त चीजें नाशवान हैं तो फिर ये योगी क्यों जिन्दा हैं अब तक ? इनका नाश क्यों नहीं हो सका ? इसका बस इतना सा ही जवाब है कि उन सब लोगों ने उस रहस्य को पा लिया जहाँ अमृत तत्व कि उपस्थिति होती है और इस प्रकार वे लोग कालजयी हो गए -!


अर्थात माँ महाकाली अपने भक्तों को सन्देश देती हैं कि वे ही ब्रह्म हैं वे ही कालजयी हैं और जिसने खुद को माता की शरण में दे दिया वह कालजयी हो सकता है एवं इसका एक अन्य सन्दर्भ भी है कि मुंड माला धारण करने के पीची कि वजह यह है कि माँ कहती है कि उसके चरणों में सबको शरण मिलती है चाहे वह पुण्यात्मा हो या दुरात्मा क्योंकि जैसी कि मान्यता है कि माँ ने जिन दुष्ट दैत्यों का संहार किया उनके मुंड काटकर गले में धारण कर लिए -!


४. माता महाकाली का रूप दिगंबरा है :-


माता महाकाली आद्या हैं उनका रूप इस बात को प्रकट करता है कि यह देह और इस पर चढ़ाये जेन वाले अलंकार शाश्वत नहीं हैं - सभी समयातीत हैं और नश्वर हैं - माता आद्या प्रकृति को इंगित करती हैं और प्राकृतिक रूप धारण करती हैं जो आडम्बर और अति का निषेध करता है और प्राकृतिक रूप से सभी दिगंबर ही होते हैं - आडम्बर और आभूषण तो इस दुनिया में आने के बाद ही सम्मिलित होते हैं -!


५. माता महाकाली शवारूढ़ हैं :-


भगवान शिव को देवादिदेव और अजेय माना जाता है - किन्तु यहाँ आकर शिव भी असहाय हो जाते हैं और माता के क़दमों में खुद को समर्पित कर देते हैं और इसके बाद माता खुद ही अपनी गति को नियंत्रित करती हैं - इससे पता चलता है कि शक्ति के बिना शिव तत्व भी शव के समान है - जैसे कि वैदिक एवं अन्य धर्म ग्रंथों भी बताया गया है कि शिव पुरुष तत्व को निरूपित करते हैं तथा माता पार्वती जो शिव कि अर्धांगिनी हैं वे स्त्री तत्व का प्रतिनिधित्व करती हैं -!


विशेष :- इसका सबसे बड़ा उदहारण आप प्रत्यक्ष देख सकते हैं कि जहाँ भी वैदिक विधान और सत्यापित रूप से शिव लिंग कि स्थापना हुयी होगी वहाँ कहीं भी शिवलिंग कि अकेले स्थापना नहीं होती है शिवलिंग हमेशा योनि पर अवस्थित होता है जिसे सामान्यतया लोग ये समझते हैं कि यह नाली कि तरह कि कलात्मकता है जिससे जब लिंग का अभिषेक किया जाये या जल चढ़ाया जाये तो वह जल बह जाये -!



१. पूजन प्रथम खंड

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ध्यान :-
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ॐ कराल वदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम
आद्यं कालिकां दिव्यां मुंडमाला विभूषिताम
सद्यश्छिन्ना शिरः खडग वामोर्ध्व कराम्बुजाम
महामेघप्रभाम् कालिकां तथा चैव दिगम्बराम्


कंठावसक्तमुंडाली गलद्वधिर चर्चिताम्
कर्णावतंसतानीत शव युग्म भयानकाम
घोरदृष्टाम करालास्यां पीनोन्नत पयोधराम
शवानाम करसंघातै कृतकांची हसनमुखीम्


सृक्कद्वय गलद्वक्त धारा विस्फुरिताननाम
घोररावां महारौद्रीं श्मशानालय वासिनीम्
बालार्क मंडलाकारां लोचन त्रितयांविताम्
दंतुरां दक्षिण व्यापि मुक्तालविकचोच्चयाम


शव रूप महादेव हृदयोपरि संस्थिताम्
शिवाभिर्घोर रावाभिष्चतुर्दिक्षु समन्विताम्
महाकालेन च समं विपरीत रतातुराम
सुख प्रसन्न वदनां स्मेराननसरोरुहाम


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पुष्प समर्पण :-
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ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते
यावत्तवां पूजयिष्यामि तावद्देवी स्थिरा भव

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पुष्पांजलि :-
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ॐ महाकालं यजेद देव्या दक्षिणे धूम्रवर्णकम्
विभ्रतं दंडखटवांगौ दृष्टा भीम मुखं शिवम्
व्याघ्र चर्मावृतकटिं तुन्दिलं रक्त वासनम्
त्रिनेत्र मूर्द्धवकेशन्च मुण्डमाला विभूषिताम
जटाभीषण सच्चंद्र खण्डं तेजो जवलननिव
ॐ हूं स्फ्रों यां रां लां क्रौं महाकाल भैरव
सर्व विघ्ननाशय नाशय ह्रीं श्रीं फट स्वाहा 

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नमस्कार :- 
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शत्रुनाशकरे देवि ! सर्व सम्पत्करे शुभे
सर्व देवस्तुते ! कालिके ! त्वां नमाम्यहम


१. आसन :- प्रथम दिन कि पूजा में माँ को काले रंग के कपडे का / आम कि लकड़ी का सिंहासन जो काले रंग से रंगा गया हो समर्पित करें एवं माँ को उस पर विराजित करने इसके बाद फिर प्रत्येक दिन माँ के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें

ॐ आसनं भास्वरं तुङ्गं मांगल्यं सर्वमंगले
भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरी
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

२. पाद्य :- इस क्रिया में शीतल एवं सुवासित जल से चरण धोएं और ऐसा सोचें कि आपके आवाहन पर माँ दूर से आयी हैं और पाद्य समर्पण से माँ को रास्ते में जो श्रम हुआ लगा है उसे आप दूर कर रहे हैं

ॐ गंगादि सलिलाधारं तीर्थं मंत्राभिमंत्रिम
दूर यात्रा भ्रम हरं पाद्यं तत्प्रति गृह्यतां
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा पाद्यं समर्पयामि )

३. उद्वर्तन :- इस क्रिया में माँ के चरणों में सुगन्धित / तिल के तेल को समर्पित करते हैं

ॐ तिल तण्डुल संयुक्तं कुश पुष्प समन्वितं
सुगंधम फल संयुक्तंमर्ध्य देवी गृहाण में
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )

४. आचमन :- इस क्रिया में माँ को आचमनी से या लोटे से आचमन जल प्रदान करते हैं ( याद रहे कि जल समर्पित करने का क्रम आप मूर्ति और यदि जल कि निकासी कि सुगम व्यवस्था है तो कर सकते हैं किन्तु यदि आपने कागज के चित्र को स्थापित किया हुआ है तो चित्र के सम्मुख एक पात्र रख लें और जल से सम्बंधित सारी क्रियाएँ करके जल उसी पात्र में डालते जाएँ )

ॐ स्नानादिक विधायापि यतः शुद्धिख़ाप्यते
इदं आचमनीयं हि कालिके देवी प्रगृह्यताम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा आचमनीयम् समर्पयामि )

५. स्नान :- इस क्रिया में सुगन्धित पदार्थों से निर्मित जल से स्नान करवाएं ( जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें यदि सामर्थ्य नहीं है तो सदा जल भी पर्याप्त है जो पूर्ण श्रद्धा से समर्पित किया गया हो )

ॐ खमापः पृथिवी चैव ज्योतिषं वायुरेव च
लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा स्नानं निवेदयामि )

६. मधुपर्क :- इस क्रिया में ( पंचगव्य मिश्रित करें प्रथम दिन ( गाय का शुद्ध दूध , दही , घी , चीनी , शहद ) अन्य दिनों में यदि व्यवस्था कर सकें तो बेहतर है अन्यथा सिर्फ शहद से काम लिया जा सकता है

ॐ मधुपर्क महादेवि ब्रह्मध्धे कल्पितं तव
मया निवेदितम् भक्तया गृहाण गिरिपुत्रिके
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा मधुपर्कं समर्पयामि )

विशेष :- ध्यान रखें चन्दन या सिन्दूर में से कोई भी चीज मस्तक पर समर्पित न करें बल्कि माँ के चरणों में समर्पित करें

७. चन्दन :- इस क्रिया में सफ़ेद चन्दन समर्पित करें

ॐ मळयांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं
शीतलं बहुलामोदम चन्दम गृह्यतामिदं
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा चन्दनं समर्पयामि )

८. रक्त चन्दन :- इस क्रिया में माँ को रक्त / लाल चन्दन समर्पित करें
ॐ रुक्तानुलेपनम् देवि स्वयं देव्या प्रकाशितं
तद गृहाण महाभागे शुभं देहि नमोस्तुते
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा रक्त चन्दनं समर्पयामि )


९. सिन्दूर :- इस क्रिया में माँ को सिन्दूर समर्पित करें

ॐ सिन्दूरं सर्वसाध्वीनाम भूषणाय विनिर्मितम्
गृहाण वर दे देवि भूषणानि प्रयच्छ में
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा सिन्दूरं समर्पयामि )


१०. कुंकुम :- इस क्रिया में माँ को कुंकुम समर्पित करें

ॐ जपापुष्प प्रभम रम्यं नारी भाल विभूषणम्
भाष्वरम कुंकुमं रक्तं देवि दत्तं प्रगृह्य में
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा कुंकुमं समर्पयामि )


११. अक्षत :- अक्षत में चावल प्रयोग करने होते हैं जो काले रंग में रंगे हुए हों

ॐ अक्षतं धान्यजम देवि ब्रह्मणा निर्मितं पुरा
प्राणंद सर्वभूतानां गृहाण वर दे शुभे
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा अक्षतं समर्पयामि )

१२. पुष्प :- माता के चरणो में पुष्प समर्पित करें ( फूलों एवं फूलमालाओं का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि यदि आपको काला गुलाब मिल जाये तो बहुत बढ़िया यदि नहीं मिलता तो लाल गुलाब उपयुक्त होगा किन्तु यदि स्थानीय या बाजारीय उपलब्धता के हिसाब से जो उपलब्ध हो वही प्रयोग करें )

ॐ चलतपरिमलामोदमत्ताली गण संकुलम्
आनंदनंदनोद्भूतम् कालिकायै कुसुमं नमः
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पं समर्पयामि )

१३. विल्वपत्र :- माता के चरणों में बिल्वपत्र समर्पित करें ( कहीं कहीं पर उल्लेख मिलता कि देवी पूजा में बिल्वपत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है तो इस स्थिति में आप अपने लोक/ स्थानीय प्रचलन का प्रयोग करें )

ॐ अमृतोद्भवम् श्रीवृक्षं शंकरस्व सदाप्रियम
पवित्रं ते प्रयच्छामि सर्व कार्यार्थ सिद्धये
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा बिल्वपत्रं समर्पयामि )

१४. माला :- इस क्रिया में माँ को फूलों कि माला समर्पित करें

ॐ नाना पुष्प विचित्राढ़यां पुष्प मालां सुशोभताम्
प्रयच्छामि सदा भद्रे गृहाण परमेश्वरि
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पमालां समर्पयामि )

१५. वस्त्र :- इस क्रिया में माता को वस्त्र समर्पित किये जाते हैं ( एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वस्त्रों कि लम्बाई १२ अंगुल से कम न हो - प्रथम दिन कि पूजा में काले वस्त्र समर्पित किये जाने चाहिए तत्पश्चात [ मौली धागा जिसे प्रायः पुरोहित रक्षा सूत्र के रूप में यजमान के हाथ में बांधते हैं वह चढ़ाया जा सकता है लेकिन लम्बाई १२ अंगुल ही होगी )

अ. ॐ तंतु संतान संयुक्तं कला कौशल कल्पितं
सर्वांगाभरण श्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा प्रथम वस्त्रं समर्पयामि )


ब. ॐ यामाश्रित्य महादेवि जगत्संहारकः सदा
तस्यै ते परमेशान्यै कल्पयाम्युत्रीयकम
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि )

१५. धूप :- इस क्रिया में सुगन्धित धुप समर्पित करनी है

ॐ गुग्गुलम घृत संयुक्तं नाना भक्ष्यैश्च संयुतम
दशांग ग्रसताम धूपम् कालिके देवि नमोस्तुते
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा धूपं समर्पयामि )

१६. दीप :- इस क्रिया में शुद्ध घी से निर्मित दीपक समर्पित करना है जो कपास कि रुई से बनी बत्तियों से निर्मित हो

ॐ मार्तण्ड मंडळांतस्थ चन्द्र बिंबाग्नि तेजसाम्
निधानं देवि कालिके दीपोअयं निर्मितस्तव भक्तितः
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा दीपं दर्शयामि )

१७. इत्र :- इस क्रिया में माता को इत्र / सुगन्धित सेंट समर्पित करना है

ॐ परमानन्द सौरभ्यम् परिपूर्णं दिगम्बरम्
गृहाण सौरभम् दिव्यं कृपया जगदम्बिके
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )

१८. कर्पूर दीप :- इस क्रिया में माँ को कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करना है

ॐ त्वम् चन्द्र सूर्य ज्योतिषं विद्युद्गन्योस्तथैव च
त्वमेव जगतां ज्योतिदीपोअयं प्रतिगृह्यताम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा कर्पूर दीपम दर्शयामि )

१९. नैवेद्य :- इस क्रिया में माता को फल - फूल या भोजन समर्पित करते हैं भोजन कम से कम इतनी मात्रा में हो जो एक आदमी के खाने के लिए पर्याप्त हो बाकि सारा कुछ सामर्थ्यानुसार )

ॐ दिव्यांन्नरस संयुक्तं नानाभक्षैश्च संयुतम
चौष्यपेय समायुक्तमन्नं देवि गृहाण में
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा नैवेद्यं समर्पयामि )

२०. खीर :- इस क्रिया में ढूध से निर्मित खीर चढ़ाएं

ॐ गव्यसर्पि पयोयुक्तम नाना मधुर मिश्रितम्
निवेदितम् मया भक्त्या परमान्नं प्रगृह्यताम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा दुग्ध खीरम समर्पयामि )

२१. मोदक :- इस क्रिया में माँ को लड्डू समर्पित करने हैं

ॐ मोदकं स्वादु रुचिरं करपुरादिभिरणवितं
मिश्र नानाविधैर्द्रुव्यै प्रति ग्रह्यशु भुज्यतां
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा मोदकं समर्पयामि )

२२. फल :- इस क्रिया में माता को ऋतु फल समर्पित करने होते हैं

ॐ फल मूलानि सर्वाणि ग्राम्यांअरण्यानि यानि च
नानाविधि सुंगंधीनि गृहाण देवि ममाचिरम
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा ऋतुफलं समर्पयामि )

२३. जल :- इस क्रिया में खान - पान के पश्चात् अब माता को जल समर्पित करें

ॐ पानीयं शीतलं स्वच्छं कर्पूरादि सुवासितम्
भोजने तृप्ति कृद्य् स्मात कृपया प्रतिगृह्यतां
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा जलम समर्पयामि )

२४. करोद्वर्तन जल :- इस क्रिया में माता को हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें

ॐ कर्पूरादीनिद्रव्याणि सुगन्धीनि महेश्वरि
गृहाण जगतां नाथे करोद्वर्तन हेतवे
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )

२५. आचमन :- इस क्रिया में माता को पुनः आचमन करवाएं

ॐ अमोदवस्तु सुरभिकृतमेत्तदनुत्तमम्
गृह्णाचमनीयम तवं माया भक्त्या निवेदितम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुनराचमनीयम् समर्पयामि )

२६. ताम्बूल :- इस क्रिया में माता को सुगन्धित पान समर्पित करें

ॐ पुन्गीफलम महादिव्यम नागवल्ली दलैर्युतम्
कर्पूरैल्लास समायुक्तं ताम्बूल प्रतिगृह्यताम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा ताम्बूलं समर्पयामि )

२७. काजल :- माता को काजल समर्पित करें

ॐ स्निग्धमुष्णम हृद्यतमं दृशां शोभाकरम तव
गृहीत्वा कज्जलं सद्यो नेत्रान्यांजय कालिके
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा कज्जलं समर्पयामि )


२८. महावर :- इस क्रिया में माँ को लाला रंग का महावर समर्पित करते हैं ( लाल रंग एवं पानी का मिश्रण जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पैरों में लगाती हैं )

ॐ चलतपदाम्भोजनस्वर द्युतिकारि मनोहरम
अलकत्कमिदं देवि मया दत्तं प्रगृह्यताम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा महावरम समर्पयामि )

२९. चामर :- इस क्रिया में माँ को चामर / पंखा ढलना होता है

ॐ चामरं चमरी पुच्छं हेमदण्ड समन्वितम्
मायार्पितं राजचिन्ह चामरं प्रतिगृह्यताम्
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा चामरं समर्पयामि )

३० . घंटा वाद्यम् :- इस क्रिया में माँ के सामने घंटा / घंटी बजानी होती है ( यह ध्वनि आपके घर और आपसे सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है एवं आपके मन में प्रसन्नता और हर्ष को जन्म देती है )

ॐ यथा भीषयसे दैत्यान् यथा पूरयसेअसुरम
तां घंटा सम्प्रयच्छामि महिषधिनी प्रसीद में
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा घंटा वाद्यं समर्पयामि )

३१. दक्षिणा :- इस क्रिया में माँ को दक्षिणा धन समर्पित किया जाता है - ( जो कि सामर्थ्यानुसार है )

ॐ काञ्चनं रजतोपेतं नानारत्न समन्वितं
दक्षिणार्थम् च देवेशि गृहाण त्वं नमोस्तुते
( ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

2. पूजन मध्यम खंड
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काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

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भैरवोवाच

शतनाम प्रवक्ष्यामि कालिकाय वरानने ।
यस्य प्रपठनाद्वाग्मी सर्वत्र विजयी भवेत् ॥

अथ स्तोत्रम्
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काली कपालिनी कान्ता कामदा कामसुन्दरी ।
कालारात्रिः कालिका च कालभैरव पूजिता ॥
क्रुरुकुल्ला कामिनी च कमनीय स्वभाविनी ।
कुलीना कुलकत्रीं च कुलवर्त्म प्रकाशिनी ॥
कस्तूरिरसनीला च काम्या कामस्वरूपिणी ।
ककारवर्णनिलया कामधेनुः करालिका ॥
कुलकान्ता करालस्या कामार्त्ता च कलावती ।
कृशोदरी च कामाख्या कौमारी कुलपालिनी ॥
कुलजा कुलमन्या च कलहा कुलपूजिता ।
कामेश्वरी कामकान्ता कुञ्जरेश्वरगामिनी ॥
कामदात्री कामहर्त्री कृष्णा चैव कपर्दिनी ।
कुमुदा कृष्णदेहा च कालिन्दी कुलपूजिता ॥
काश्यापी कृष्णमाता च कुलिशाङ्गी कला तथा ।
क्रीं रूपा कुलगम्या च कमला कृष्णपूजिता ॥
कृशाङ्गी किन्नरी कत्रीं कलकण्ठी च कार्तिकी ।
कम्बुकण्ठी कौलिनी च कुमुदा कामजीविनी ॥
कलस्त्री कीर्तिका कृत्या कीर्तिश्च कुलपालिका ।
कामदेवकला कल्पलता कामाङ्गवर्द्धिनी ॥
कुन्ता च कुमुदप्रीता कदम्बकुसुमोत्सुका ।
कादम्बिनी कमलिनी कृष्णानन्दप्रदायिनी ॥
कुमारीपूजनरता कुमारीगणशोभिता ।
कुमारीरञ्जनरता कुमारीव्रतधारिणी ॥
कङ्काली कमनीया च कामशास्त्रविशारदा ।
कपालखट्वाङ्गधरा कालभैरवरूपिणी ॥
कोटरी कोटराक्षी च काशीकैलासवासिनी ।
कात्यायनी कार्यकरी काव्यशास्त्र प्रमोदिनी ॥
कामाकर्षणरूपा च कामपीठनिवासिनी ।
कङिकनी काकिनी क्रीडा कुत्सिता कलहप्रिया ॥
कुण्डगोलोद्भवप्राणा कौशिकी कीर्तिवर्द्धिनी,
कुम्भस्तनी कलाक्षा च काव्या कोकनदप्रिया ।
कान्तारवासि कान्तिश्च कठिना कृष्णवल्लभा ॥

फलश्रुति

इति ते कथितम् देवि गुह्याद् गुह्यतरम् परम् ।
प्रपठेद्य इदम् नित्यम् कालीनाम शताष्टकम् ॥
त्रिषु लोकेषु देवेशि तस्यासाध्यम् न विद्यते ।
प्रातः काले च मध्याह्ने सायाह्ने च सदा निशि ॥
यः पठेत्परया भक्त्या कालीनाम शताष्टकम् ।
कालिका तस्य गेहे च संस्थानम् कुरुते सदा ॥
शून्यागारे श्मशाने वा प्रान्तरे जलमध्यतः ।
वह्निमध्ये च संग्रामे तथा प्राणस्य संशये ॥
शताष्टकम् जपेन्मंत्री लभते क्षेममुत्तमम्,
कालीं संस्थाप्य विधिवत्श्रुत्वा नामशताष्टकैः ।
साधकः सिद्धिमाप्नोति कालिकायाः प्रसादतः ॥

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काली चालीसा :-
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जयकाली कलिमलहरण, महिमा अगम अपार ।
महिष मर्दिनी कालिका , देहु अभय अपार ॥


अरि मद मान मिटावन हारी । मुण्डमाल गल सोहत प्यारी ॥
अष्टभुजी सुखदायक माता । दुष्टदलन जग में विख्याता ॥
भाल विशाल मुकुट छवि छाजै । कर में शीश शत्रु का साजै ॥
दूजे हाथ लिए मधु प्याला । हाथ तीसरे सोहत भाला ॥
चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे । छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे ॥
सप्तम करदमकत असि प्यारी । शोभा अद्भुत मात तुम्हारी ॥
अष्टम कर भक्तन वर दाता । जग मनहरण रूप ये माता ॥
भक्तन में अनुरक्त भवानी । निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी ॥
महशक्ति अति प्रबल पुनीता । तू ही काली तू ही सीता ॥
पतित तारिणी हे जग पालक । कल्याणी पापी कुल घालक ॥
शेष सुरेश न पावत पारा । गौरी रूप धर्यो इक बारा ॥
तुम समान दाता नहिं दूजा । विधिवत करें भक्तजन पूजा ॥
रूप भयंकर जब तुम धारा । दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा ॥
नाम अनेकन मात तुम्हारे । भक्तजनों के संकट टारे ॥
कलि के कष्ट कलेशन हरनी । भव भय मोचन मंगल करनी ॥
महिमा अगम वेद यश गावैं । नारद शारद पार न पावैं ॥
भू पर भार बढ्यौ जब भारी । तब तब तुम प्रकटीं महतारी ॥
आदि अनादि अभय वरदाता । विश्वविदित भव संकट त्राता ॥
कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा । उसको सदा अभय वर दीन्हा ॥
ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा । काल रूप लखि तुमरो भेषा ॥
कलुआ भैंरों संग तुम्हारे । अरि हित रूप भयानक धारे ॥
सेवक लांगुर रहत अगारी । चौसठ जोगन आज्ञाकारी ॥
त्रेता में रघुवर हित आई । दशकंधर की सैन नसाई ॥
खेला रण का खेल निराला । भरा मांस-मज्जा से प्याला ॥
रौद्र रूप लखि दानव भागे । कियौ गवन भवन निज त्यागे ॥
तब ऐसौ तामस चढ़ आयो । स्वजन विजन को भेद भुलायो ॥
ये बालक लखि शंकर आए । राह रोक चरनन में धाए ॥
तब मुख जीभ निकर जो आई । यही रूप प्रचलित है माई ॥
बाढ्यो महिषासुर मद भारी । पीड़ित किए सकल नर-नारी ॥
करूण पुकार सुनी भक्तन की । पीर मिटावन हित जन-जन की ॥
तब प्रगटी निज सैन समेता । नाम पड़ा मां महिष विजेता ॥
शुंभ निशुंभ हने छन माहीं । तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं ॥
मान मथनहारी खल दल के । सदा सहायक भक्त विकल के ॥
दीन विहीन करैं नित सेवा । पावैं मनवांछित फल मेवा ॥
संकट में जो सुमिरन करहीं । उनके कष्ट मातु तुम हरहीं ॥
प्रेम सहित जो कीरति गावैं । भव बन्धन सों मुक्ती पावैं ॥
काली चालीसा जो पढ़हीं । स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं ॥
दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा । केहि कारण मां कियौ विलम्बा ॥
करहु मातु भक्तन रखवाली । जयति जयति काली कंकाली ॥
सेवक दीन अनाथ अनारी । भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी ॥

प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ ।
तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ ॥

3. पूजन अंतिम खंड

32. पुष्पांजलि :-


ॐ काली काली महाकाली कालिके पाप नाशिनी
काली कराली निष्क्रान्ते कालिके तवननमोस्तुते
ॐ उत्तिष्ठ देवी चामुण्डे शुभां पूजा प्रगृह्य में
कुरुष्व मम कल्याणमस्टाभि शक्तिभिः सह
भुत प्रेत पिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरि
देवेभ्यो मानुषोभ्योश्च भयेभ्यो रक्ष मा सदा
सर्वदेवमयीं देवीं सर्व रोगभयापहाम
ब्रह्मेश विष्णु नमिताम् प्रणमामि सदा उमां
आय़ुर्ददातु में काली पुत्रा नादि सदा शिवा
अर्थ कामो महामाया विभवं सर्व मङ्गला
ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि पुष्पांजलिं समर्पयामि


33. नीराजन :- इस क्रिया में पुनः माँ कि प्राथमिक आरती उतारते हैं जिसमे सिर्फ कर्पूर का प्रयोग होता है

ॐ कर्पूरवर्ति संयुक्तं वहयिना दीपितंचयत
नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके

34. क्षमा प्रार्थना :-


ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते
ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः
न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः


35. आरती :- इस क्रिया में माता कि आरती उतारते हैं और यह चरण आपकी उस काल कि साधना के समापन का प्रतीक है -( इसके लिए अलग से कोई आरती जलने कि कोई जरुरत नहीं है आप उसी दीपक का उपयोग करेंगे जो आपने पूजा के प्रारम्भ में घी का दीपक जलाया था )

आरती -

 अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली |
तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
तेरे भक्त जनों पे माता, भीर पड़ी है भारी |
दानव दल पर टूट पडो माँ, करके सिंह सवारी ||
सौ सौ सिंहों से तु बलशाली, दस भुजाओं वाली |
दुखिंयों के दुखडें निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
माँ बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता |
पूत कपूत सूने हैं पर, माता ना सुनी कुमाता ||
सब पर करुणा दरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली ||
दुखियों के दुखडे निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
नहीं मांगते धन और दौलत, न चाँदी न सोना |
हम तो मांगे माँ तेरे मन में, इक छोटा सा कोना ||
सबकी बिगडी बनाने वाली, लाज बचाने वाली |
सतियों के सत को संवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली |
तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||

क्रमशः 

जय माता महाकाली 

Monday, 10 March 2014

माता बगलामुखी साधना - Mata Baglamukhi Sadhna - Mata Bagulamukhi Sadhana - माता बगुलामुखी साधना


 माता बगलामुखी साधना - Mata Baglamukhi Sadhna - Mata Bagulamukhi Sadhana




माता  बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं यह स्तम्भन की देवी हैं. संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है. इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है. बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है.
बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती होती हैं रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं. देवी के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं. देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है.
साधना के लिए जो मुख्य बातें ध्यान में रखनी चाहिए  वे निम्न प्रकार होंगी :-

१- माँ का एक चित्र  ( यदि मूर्ति स्थापित करते हैं जैसे कि पीतल (ब्रॉस) या फिर अन्य किसी धातु की तो एक बात का ध्याना रखना चाहिए कि मूर्ति कि ऊंचाई १२ इंच से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे अधिक ऊंचाई कि मूर्ति घर में नहीं रखी जाती बल्कि मंदिर में स्थापित होती है ) लेकिन कागज या पेंटिंग के मामले में यह नियम लागु नहीं  होता

२. आसन / चौकी / बाजोट :- बहुत बार देखने में आता है कि लोग किसी भी चौकी या किसी भी स्थान पर इष्ट कि स्थापना कर लेते हैं किन्तु यदि वैदिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो इष्ट कि मूर्ति कि अवस्था आप जब बैठें तो आपकी नाभि से ऊपर होनी चाहिए कहने का मतलब कि आसन इस प्रकार व्यवस्थित करें कि जब आप साधना के लिए अपने इष्ट के सामने बैठें तो उनका आसन जिस पर उन्हें स्थान दिया गया है उसकी ऊंचाई आपके ह्रदय क्षेत्र के सामने होनी चाहिए 

३. स्थान चुनाव :- स्थान का चुनाव भी आपकी साधना में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है --- साधना के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए जहाँ पर आम आना जाना न हो -- कहने का अभिप्राय ये है कि साधना कक्ष एकांत में होना चाहिए और वहाँ तक सबकी पहुँच नहीं होनी चाहिए 

४. दिशा निर्धारण :- साधना के लिए हमेशा अपने इष्ट देव कि स्थापना इस प्रकार करनी चाहिए कि जब आप साधना के लिए उनके समक्ष बैठें तो आपका मुंह उत्तर - नॉर्थ / पूर्व  - ईस्ट  कि तरफ पड़े ! 

५. रंग निर्धारण :- माता बगलामुखी का पसंदीदा रंग पीला (येलो ) है अतएव मुख्यतः इनकी पूजा में वस्त्र - फूल - आसन इत्यादि पीले रंग के ही प्रयोग किये जायेंगे !

६. सामान्य चेतावनी :- माता बगलामुखी बहुत ही तीव्र फल प्रदान करने वाली माँ हैं और इनके मन में भक्तों के लिए अथाह प्यार भी होता है इस्के साधक को इनकी साधना के बाद फिर किसी के सामने हाथ फ़ैलाने कि आवश्यकता नहीं है - भक्ति और मुक्ति / मोक्ष सब प्रदान करने इनके लिए बस निगाह फिरने के काम जैसा ही है इस दुनिया में कोई ऐसी शक्ति नहीं जो इनके साधक के समक्ष ठहर सके या उसका सामना कर सके -!

किन्तु साधक या भक्त कि छोटी सी भी गलती से ये कुपित भी हो सकती हैं इसलिए जब पहले एक बार स्वनियंत्रण करने कि कला सीख लें तब इनकी साधना के बारे में विचार करें - जैसा कि इनके मूल चित्र से भी इंगित होता है कि माता अपने ही भक्त कि गर्दन खुद ही काटने को उद्धत हैं इसलिए मेरा अपना परामर्श ये है कि नियंत्रण और समर्पण से यदि इनकी साधना कि जाए तो फिर कोई समस्या नहीं है -!

आराधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा साधना क्रम में स्त्री स्पर्श, चर्चा और संसर्ग कतई नहीं करना चाहिए। साधना डरपोक किस्म के लोगों को नहीं करनी चाहिए। बगलामुखी देवी अपने साधक की परीक्षा भी लेती हैं। साधना काल में भयानक अवाजें या आभास हो सकते हैं, इससे धबराना नहीं चाहिए और अपनी साधना जारी रखनी चाहिए।

क्योंकि पंडितों या ज्ञानियों कि गलतियां हमेशा अक्षम्य होती हैं जबकि नादान बच्चे कि सारी गलतियां माफ़ कि जाने लायक होती हैं -- !

पसंदीदा रंग :- पीला है इसलिए सारी चीजें पीले रंग कि ही होंगी जप के लिए माला हल्दी / हरिद्रा / टर्मरिक की प्रयोग होगी - अंक ३६ इनको विशेष प्रिय है अतएव मंत्रजाप संख्या भी इसी क्रुम में रखें जैसे कि ३६०० / ३६०००/ ३६०००० इत्यादि - इनका प्रिय दिन है वीरवार - गुरुवार - थर्स्डे 



प्रथम खंड पूजा 

ध्यान 
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।


आवाहनम् 
।। ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी 
        अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा ।।
आसनम्

ॐ बगला देव्यै नमः आसनम समर्पयामि 

पाद्यम् 
ॐ बगला देव्यै नमः पाद्यम समर्पयामि 
अर्घ्यम् 
ॐ बगला देव्यै नमः अर्घ्यं समर्पयामि 

आचनम्
ॐ बगला देव्यै नमः आचमनं समर्पयामि 


जल स्त्रानम् 
ॐ बगला देव्यै नमः स्नानं समर्पयामि 


पञ्चामृत स्नानम् 
ॐ बगला देव्यै नमः पञ्चामृत स्नानं समर्पयामि 
वस्त्रम् 
वस्त्रं च सोमदेवत्यं लज्जायास्तु निवारणम् ।
मया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरी ॥


उपवस्त्रम् 
यमाश्रित्य महामाया जगत्सम्मोहिनी सदा ।
तस्यै ते परमेशानि कल्पयाम्युत्तरीयकम् ॥


गन्धम् 
ॐ बगला देव्यै नमः गन्धं समर्पयामि 

सिन्दूरं 
ॐ बगला देव्यै नमः सिन्दूरं समर्पयामि

आभूषणम् 
ॐ बगला देव्यै नमः आभूषणं समर्पयामि
कज्जलम् 
चक्षुभ्यां कज्जलं रम्यं सुभगे शान्तिकारिके ।
कर्पूर ज्योतिरुत्पन्नं ग्रहाण परमेश्वरि ॥


सौभाग्यसूत्रम् 
सौभाग्यसूत्रं वरदे सुवर्णमणि संयुते ।
कण्ठे बध्नामि देवेशि सौभाग्यं देहि मे सदा ॥


गन्धम्
चन्दनागरु कर्पूरं कंकुमं रोचनं तथा ।
कस्तूर्यादि सुगन्धांश्च सर्वाङ्नेषु विलेपये ॥


अक्षतम् 
रञ्जिता कुंकुमौघेन अक्षताश्चापि शोभना: ।
ममैषां देवि दानेन प्रसन्नाभवमीश्वरी ।


पुष्पम् 
मंदार पारिजातादि पाटली केतकानि च ।
जाती चम्पक पुष्पाणि गृहाण परमेश्वरी ॥


धूपम् 
दशांग गुग्गुलं धूपं चन्दनागरु संयुतम् ।
समर्पितं मया भक्त्या महादेवि प्रगृह्यताम् ॥


दीपम् 
घृतवर्ति समायुक्त महातेजो महोज्ज्वलम् ।
दीपं दास्यामि देवेशि सुप्रीता भव सर्वदा ॥


नैवेद्यम् 
अन्नं चतुर्विधिं स्वादु रसै: षड्‌भि समन्वितम् ।
नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्ति मे ह्यचलां कुरु ॥

इत्रम् 

ॐ बगला देव्यै नमः इत्रम् समर्पयामि

ऋतुफलम् 
द्रक्षाखर्जूर कदली पनसाम्र कपित्थकम् ।
नारिकेलेक्षुजम्ब्वादि फलानि प्रतिगृह्यताम् ॥


आचमनीयम् 
ॐ बगला देव्यै नमः पुनराचमनीयम् समर्पयामि

अखण्ड ऋतुफलम् 
नारिकेलं च नारंगं कलिगमचिरं तथा ।
ऊर्वारुकं च देवेशि फलान्येतानि गृह्यताम् ॥


ताम्बूलम् 
एलालवंग कस्तूरी कर्पूरै: सुष्ठुवासिताम् ।
वीटिकां मुखवासार्थ समर्पयामि सुरेश्वरि ॥

द्वितीय खंड पूजन 

माता बगलामुखी अष्टोत्तरशत नाम 

ब्रह्मास्त्ररुपिणी देवी माता श्रीबगलामुखी ।
चिच्छिक्तिर्ज्ञान-रुपा च ब्रह्मानन्द-प्रदायिनी ।। १ ।।
महाविद्या महालक्ष्मी श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ।
भुवनेशी जगन्माता पार्वती सर्वमंगला ।। २ ।।
ललिता भैरवी शान्ता अन्नपूर्णा कुलेश्वरी ।
वाराही छीन्नमस्ता च तारा काली सरस्वती ।। ३ ।।
जगत्पूज्या महामाया कामेशी भगमालिनी ।
दक्षपुत्री शिवांकस्था शिवरुपा शिवप्रिया ।। ४ ।।
सर्व-सम्पत्करी देवी सर्वलोक वशंकरी ।
विदविद्या महापूज्या भक्ताद्वेषी भयंकरी ।। ५ ।।
स्तम्भ-रुपा स्तम्भिनी च दुष्टस्तम्भनकारिणी ।
भक्तप्रिया महाभोगा श्रीविद्या ललिताम्बिका ।। ६ ।।
मैनापुत्री शिवानन्दा मातंगी भुवनेश्वरी ।
नारसिंही नरेन्द्रा च नृपाराध्या नरोत्तमा ।। ७ ।।
नागिनी नागपुत्री च नगराजसुता उमा ।
पीताम्बा पीतपुष्पा च पीतवस्त्रप्रिया शुभा ।। ८ ।।
पीतगन्धप्रिया रामा पीतरत्नार्चिता शिवा ।
अर्द्धचन्द्रधरी देवी गदामुद्गरधारिणी ।। ९ ।।
सावित्री त्रिपदा शुद्धा सद्योराग विवर्धिनी ।
विष्णुरुपा जगन्मोहा ब्रह्मरुपा हरिप्रिया ।। १० ।।
रुद्ररुपा रुद्रशक्तिश्चिन्मयी भक्तवत्सला ।
लोकमाता शिवा सन्ध्या शिवपूजनतत्परा ।। ११ ।।
धनाध्यक्षा धनेशी च नर्मदा धनदा धना ।
चण्डदर्पहरी देवी शुम्भासुरनिबर्हिणी ।। १२ ।।
राजराजेश्वरी देवी महिषासुरमर्दिनी ।
मधूकैटभहन्त्री देवी रक्तबीजविनाशिनी ।। १३ ।।
धूम्राक्षदैत्यहन्त्री च भण्डासुर विनाशिनी ।
रेणुपुत्री महामाया भ्रामरी भ्रमराम्बिका ।। १४ ।।
ज्वालामुखी भद्रकाली बगला शत्रुनाशिनी ।
इन्द्राणी इन्द्रपूज्या च गुहमाता गुणेश्वरी ।। १५ ।।
वज्रपाशधरा देवी ज्ह्वामुद्गरधारिणी ।
भक्तानन्दकरी देवी बगला परमेश्वरी ।। १६ ।।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां बगलायास्तु यः पठेत् ।
रिपुबाधाविनिर्मुक्तः लक्ष्मीस्थैर्यमवाप्नुयात् ।। १७ ।।
भूतप्रेतपिशाचाश्च ग्रहपीड़ानिवारणम् ।
राजानो वशमायांति सर्वैश्वर्यं च विन्दति ।। १८ ।।
नानाविद्यां च लभते राज्यं प्राप्नोति निश्चितम् ।
भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति साक्षात् शिवसमो भवेत् ।। १९ ।।


बगला दशक 

(१)
यस्मिंल्लोका अलोका अणु-गुरु-लघवः स्थावरा जंगमाश्च ।
सम्प्रोताः सन्ति सूत्रे मणय इव वृहत्-तत्त्वमास्तेऽम्बरं तत् ।।
पीत्वा पीत्यैक-शेषा परि-लय-समये भाति या स्व-प्रकाशा ।
तस्याः पीताम्बरायास्तव जननि ! गुणान् के वयं वक्तुमीशाः ।।


(२)
आद्यैस्त्रियाऽक्षरैर्यद् विधि-हरि-गिरिशींस्त्रीन् सुरान् वा गुणांश्च,
मात्रास्तिस्त्रोऽप्यवस्थाः सततमभिदधत् त्रीन् स्वरान् त्रींश्च लोकान् ।
वेदाद्यं त्यर्णमेकं विकृति-विरहितं बीजमों त्वां प्रधानम्,
मूलं विश्वस्य तुर्य्यं ध्वनिभिरविरतं वक्ति तन्मे श्रियो स्यात् ।।


(३)
सान्ते रान्तेन वामाक्षणि विधु-कलया राजिते त्वं महेशि !
बीजान्तःस्था लतेव प्रविलससि सदा सा हि माया स्थिरेयम् ।
जप्ता श्याताऽपि भक्तैरहनि निशि हरिद्राक्त-वस्त्रावृतेन ।
शत्रून् स्तभ्नाति कान्तां वशयति विपदो हन्ति वित्तं ददाति ।।


(४)
मौनस्थः पीत-पीताम्बर-वलित-वपुः केसरीयासवेन ।
कृत्वाऽन्तस्तत्त्व-शोधं कलित-शुचि-सुधा-तर्पणोऽर्चां त्वदीयाम् ।
कुर्वन् पीतासनस्थः कर-धृत-रजनी-ग्रन्थि-मालोऽन्तराले ।
ध्यायेत् त्वां पीत-वर्णां पटु-युवति-युतो हीप्सितं किं न विन्देत् ।।



(५)
वन्दे स्वर्णाभ-वर्णा मणि-गण-विलसद्धेम-सिंहासनस्थाम् ।
पीतं वासो वसानां वसु-पद-मुकुटोत्तंस-हारांगदाढ्याम् ।
पाणिभ्यां वैरि-जिह्वामध उपरि-गदां विभ्रतीं तत्पराभ्याम् ।
हस्ताभ्यां पाशमुच्चैरध उदित-वरां वेद-बाहुं भवानीम् ।।



(६)
षट्-त्रिंशद्-वर्ण-मूर्तिः प्रणव-मुख-हरांघ्रि-द्वयस्तावकीन-
श्चम्पा-पुष्प-प्रियाया मनुरभि-मतदः कल्प-वृक्षोपमोऽयम् ।
ब्रह्मास्त्रं चानिवार्य्यं भुजग-वर-गदा-वैरि-जिह्वाग्र-हस्ते !
यस्ते काले प्रशस्ते जपति स कुरुतेऽप्यष्ट-सिद्धिः स्व-हस्ते ।।



(७)
मायाद्या च द्वि-ठान्ता भगवति ! बगलाख्या चतुर्थी-निरुढा ।
विद्यैवास्ते य एनां जपति विधि-युतस्तत्व-शोधं निशीथे ।
दाराढ्यः पञ्चमैस्त्वां यजति स हि दृशा यं यमीक्षेत तं तम् ।
स्वायत्त-प्राण-बुद्धीन्द्रिय-मय-पतितं पादयोः पश्यति द्राक् ।।



(८)
माया-प्रद्युम्न-योनिव्यनुगत-बगलाऽग्रे च मुख्यै गदा-धारिण्यै ।
स्वाहेति तत्त्वेन्द्रिय-निचय-मयो मन्त्र-राजश्चतुर्थः ।
पीताचारो य एनं जपति कुल-दिशा शक्ति-युक्तो निशायाम् ।
स प्राज्ञोऽभीप्सितार्थाननुभवति सुखं सर्व-तन्त्र-सवतन्त्रः ।।


(९)
श्री-माया-योनि-पूर्वा भगवति बगले ! मे श्रियं देहि देहि,
स्वाहेत्थं पञ्चमोऽयं प्रणव-सह-कृतो भक्त-मन्दार-मन्त्रः ।
सौवर्ण्या मालयाऽमुं कनक-विरचिते यन्त्रके पीत-विद्याम् ।
ध्यायन् पीताम्बरे ! त्वां जपति य इह स श्री समालिंगितः स्यात् ।।

(१०)
एवं पञ्चापि मन्त्रा अभिमत-फलदा विश्व-मातुः प्रसिद्धाः,
देव्या पीताम्बरायाः प्रणत-जन-कृते काम-कल्प-द्रुमन्ति ।
एतान् संसेवमाना जगति सुमनसः प्राप्त-कामाः कवीन्द्राः ।
धन्या मान्या वदान्या सुविदित-यशसो देशिकेन्द्रा भवन्ति ।।


करस्थ चषकस्यात्र, संभोज्य झषकस्य च ।
बगला-दशकाध्येतुर्मातंगी मशकायते ।।



माता बगलामुखी चालीसा 

दोहा

सिर नवाइ बगलामुखी, लिखूं चालीसा आज।।
कृपा करहु मोपर सदा, पूरन हो मम काज।।


चौपाई

जय जय जय श्री बगला माता। आदिशक्ति सब जग की त्राता।।
बगला सम तब आनन माता। एहि ते भयउ नाम विख्याता।।

शशि ललाट कुण्डल छवि न्यारी। असतुति करहिं देव नर-नारी।।
पीतवसन तन पर तव राजै। हाथहिं मुद्गर गदा विराजै।।

तीन नयन गल चम्पक माला। अमित तेज प्रकटत है भाला।।
रत्न-जटित सिंहासन सोहै। शोभा निरखि सकल जन मोहै।।

आसन पीतवर्ण महारानी। भक्तन की तुम हो वरदानी।।
पीताभूषण पीतहिं चन्दन। सुर नर नाग करत सब वन्दन।।

एहि विधि ध्यान हृदय में राखै। वेद पुराण संत अस भाखै।।
अब पूजा विधि करौं प्रकाशा। जाके किये होत दुख-नाशा।।

प्रथमहिं पीत ध्वजा फहरावै। पीतवसन देवी पहिरावै।।
कुंकुम अक्षत मोदक बेसन। अबिर गुलाल सुपारी चन्दन।।

माल्य हरिद्रा अरु फल पाना। सबहिं चढ़इ धरै उर ध्याना।।
धूप दीप कर्पूर की बाती। प्रेम-सहित तब करै आरती।।

अस्तुति करै हाथ दोउ जोरे। पुरवहु मातु मनोरथ मोरे।।
मातु भगति तब सब सुख खानी। करहुं कृपा मोपर जनजानी।।


त्रिविध ताप सब दुख नशावहु। तिमिर मिटाकर ज्ञान बढ़ावहु।।
बार-बार मैं बिनवहुं तोहीं। अविरल भगति ज्ञान दो मोहीं।।

पूजनांत में हवन करावै। सा नर मनवांछित फल पावै।।
सर्षप होम करै जो कोई। ताके वश सचराचर होई।।

तिल तण्डुल संग क्षीर मिरावै। भक्ति प्रेम से हवन करावै।।
दुख दरिद्र व्यापै नहिं सोई। निश्चय सुख-सम्पत्ति सब होई।।

फूल अशोक हवन जो करई। ताके गृह सुख-सम्पत्ति भरई।।
फल सेमर का होम करीजै। निश्चय वाको रिपु सब छीजै।।

गुग्गुल घृत होमै जो कोई। तेहि के वश में राजा होई।।
गुग्गुल तिल संग होम करावै। ताको सकल बंध कट जावै।।

बीलाक्षर का पाठ जो करहीं। बीज मंत्र तुम्हरो उच्चरहीं।।
एक मास निशि जो कर जापा। तेहि कर मिटत सकल संतापा।।

घर की शुद्ध भूमि जहं होई। साध्का जाप करै तहं सोई।
सेइ इच्छित फल निश्चय पावै। यामै नहिं कदु संशय लावै।।

अथवा तीर नदी के जाई। साधक जाप करै मन लाई।।
दस सहस्र जप करै जो कोई। सक काज तेहि कर सिधि होई।।

जाप करै जो लक्षहिं बारा। ताकर होय सुयश विस्तारा।।
जो तव नाम जपै मन लाई। अल्पकाल महं रिपुहिं नसाई।।

सप्तरात्रि जो पापहिं नामा। वाको पूरन हो सब कामा।।
नव दिन जाप करे जो कोई। व्याधि रहित ताकर तन होई।।

ध्यान करै जो बन्ध्या नारी। पावै पुत्रादिक फल चारी।।
प्रातः सायं अरु मध्याना। धरे ध्यान होवै कल्याना।।

कहं लगि महिमा कहौं तिहारी। नाम सदा शुभ मंगलकारी।।
पाठ करै जो नित्या चालीसा।। तेहि पर कृपा करहिं गौरीशा।।


दोहा

सन्तशरण को तनय हूं, कुलपति मिश्र सुनाम।
हरिद्वार मण्डल बसूं , धाम हरिपुर ग्राम।।
उन्नीस सौ पिचानबे सन् की, श्रावण शुक्ला मास।
चालीसा रचना कियौ, तव चरणन को दास।।





दक्षिणाम् 
पूजाफल समृद्‌ध्यर्थं तवाग्रे स्वर्गमीश्वरि ।
स्थापितं तेन मे प्रीता पूर्णान् कुरु मनोरथान् ॥

नीराजनम् 
नीराजनं सुमंगल्यं कर्पूंरेण समन्वितम् ।
चन्द्रार्क वह्नि सदृशं महादेवि नमोऽस्तुते ॥



श्री बगलामुखी माता की आरती

जय पीताम्बरधारिणी जय सुखदे वरदे, देवी जय सुखदे वरदे।

भक्तजनानां क्लेशं भक्तजनानां क्लेशं सततं दूर करें।। ॐ  जय बगलामुखी माता….

असुरैः पीडि़तदेवास्तव शरणं प्राप्ताः, देवीस्तव शरणं प्राप्ताः।

धृत्वा कौर्मशरीरं धृत्वा कौर्मशरीरं दूरीकृतदुःखम् ।। 
ॐ  जय बगलामुखी माता…

मुनिजनवन्दितचरणे जय विमले बगले, देवी जय विमले बगले।

संसारार्णवभीतिं संसारार्णवभीतिं नित्यं शान्तकरे ।। 
ॐ  जय बगलामुखी माता…

नारदसनकमुनीन्द्रै ध्यातं पदकमलं देवीध्यातं पदकमलं।

हरिहरद्रुहिणसुरेन्द्रैः हरिहरदु्रुहिणसुरेन्द्रैः सेवितपदयुगलम् ।।
ॐ  जय बगलामुखी माता….

कांचनपीठनिविष्टे मुद्गरपाशयुते, देवी मुद्गरपाशयुते।

जिव्हावज्रसुशोभित जिव्हावज्रसुशोभित पीतांशुकलसिते ।।
ॐ  जय बगलामुखी माता….

बिन्दु त्रिकोण षडस्त्रै अष्टदलोपरिते, देवी अष्टदलोपरिते।
षोडशदलगतपीठं षोडशदलगतपीठं  ।। 
ॐ  जय बगलामुखी माता…

.इत्थं साधकवृन्दं चिन्तयते रूपं देवी चिन्तयते रूपं।

शत्रुविनाशकबीजं शत्रुविनाशकबीजं धृत्वा हृत्कमले ।। 
ॐ  जय बगलामुखी माता…

अणिमादिकबहसिद्धिं लभते सौख्ययुतां, देवी लभते सौख्ययुतां।


प्रदक्षिणाम् 
नमस्ते देवि देवेशि नमस्ते ईप्सितप्रदे ।
नमस्ते जगतां धात्रि नमस्ते भक्तवत्सले ॥

नमस्कारम् 
नमः सर्वहितार्थायै जगदाधार हेतवे ।
साष्टांगो अयं प्रणामस्तु प्रयत्नेन मयाकृत: ॥



मन्त्र – “ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:"