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Saturday, 28 March 2020

बुधुआ तेरी भक्ति अमर - Spiritual Story


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बुधुआ तेरी भक्ति अमर
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"उठ ना अब" चिल्लाते हुए मघई काकी ने बुधुआ की चादर खींच फेंकी एक तरफ !

लेकिन यह क्या ? बुधुआ ने फिर से नीचे बिछाई हुयी चादर को आधी ओढ़कर दूसरी करवट ले ली।

यह हर रोज की ही किचकिच थी मघई काकी और बुधुआ के बीच।

असल में यह छोटा सा पहाड़ी गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए दूर-दूर तक मशहूर है और यहाँ के निवासी भी मशहूर हैं अपने प्राकृतिक और सरल स्वभाव के लिए।

मघई काकी का परिवार भी कभी बहुत संपन्न घर माना जाता था लेकिन समय के बदलाव के साथ गोवर्धन काका की बीमारी और फिर वैद्य हकीमों की दुनिया के चक्कर में सब कुछ जैसे स्वप्न सा बिखरने लगा और बीमारी भी जैसे गोवर्धन काका को ले जाने के लिए ही हुयी थी और एक दिन काका इस नश्वर दुनिया को छोड़कर चल बसे।

मरने से पहले काका को अपने पुत्र बुधुआ से बहुत सी उम्मीदें थीं और काका की दिली ख्वाहिश थी कि अपने जीवन में जिस चीज को वे पूर्ण नहीं कर पाए वह बुधुआ पूरा करेगा।

काका को अपने जीवन में बस एक ही धुन थी की वे तंत्र-मंत्र के इतने बड़े विद्वान बनें कि आने वाली पीढियां उन्हें याद करें, खाने-पहनने की कोई समस्या थी नहीं इसलिए बस कभी इस ओझा तो कभी उस ओझा की शरण में पड़े रहते थे लेकिन किसी से उन्हें वह चीज नहीं मिली जिसके वो मुन्तजिर थे।

 एक ओझा बाबा थे उन्होंने काका की सेवा से खुश होकर कुछ सिद्धियां उन्हें हस्तगत कर दी थीं लेकिन टीले वाले भूत को सबक सिखाने के लिए शायद वे पर्याप्त नहीं थीं।  सौन्दर्य की खान इस गांव में एक ही काला साया था जिसका नाम आते ही गांव वालों का मूत निकल जाता था।

 प्रतिवर्ष कई लोगों के जीवन लील जाता था वह टीले वाला भूत और उसी के इलाज के लिए काका ने तंत्र मार्ग का रुख किया था और अपनी इस यात्रा में काका ने सिद्धियां पाने के बाद टीले पर जाकर उसे ललकार दिया, बताने वाले बताते हैं कि "ऐसा लगा था जैसे पूरा टीला ही उखड आया हो और पुरे गांव के ऊपर आसमान बनकर छा गया, दिन रात का भान नहीं रहा, लोग अपने घरों में दुबक गए थे, बस दो ही आवाजें सुनाई दे रही थीं एक काका की और दूसरी हवा की सांय-सांय की जो बवंडर की तरह आकर काका को अपनी लपेट में लेकर दूर फेंकने की कोशिश करती लेकिन काका अपने कौशल से पुनः सकुशल जमीन पर अपने पैरों पर खड़े नजर आते।

 कई बार आग के भभूके भी नजर आते थे लेकिन अगले ही पल वे भभूके काका से थोड़ा पहले ही गिर जाते थे।

 घंटों के निरंतर माया युद्ध के बाद काका आखिर फैसला हो ही गया कि वह भूत बहुत ही प्रबल और भयङ्कर है अंतिम पलटी के समय जब काका अपने कौशल से सकुशल जमीन पर खड़े हो पाते इससे पहले ही टीले के आकाश से ढेरों मिटटी काका के ऊपर गिरी और काका अपना संतुलन ना बनाये रख सके, भरभराकर जमीन पर गिरे और बस सारी माया ख़तम।

 टीला अपनी जगह, लोग अपनी जगह, धरती अपनी जगह, आसमान अपनी जगह बस कोई अगर अपनी जगह नहीं था तो वे गोवर्धन काका ही नहीं थे।

 मघई काकी ने पूरा गांव सर पर उठा लिया रो रोकर और किसके-किसके पैर नहीं पड़े लेकिन ना कोई कुछ कर सकता था और ना ही किसीने कुछ किया।

 सप्ताह भर बाद काका सुबह अपने बिस्तर पर आसक्त सी दशा में मिले थे और उस दिन के बाद उनका बोलना-चालना सब बंद हो गया था, बस एकटक शून्य को निहारते और यदि सामने बुधुआ पड़ जाता तो याचनात्मक दृष्टि से उसे निहारते, मानो कह रहे हों कि बुधुआ तू ही है जो मेरा बदला लेगा उस टीले वाले से।

बुधुआ शायद सब समझता था, लेकिन वही झंझावात उसके मस्तिष्क को भी अपने घेरे में लिए हुए था कि आखिर किस्से मदद मांगे और कौन उसे इस लायक बनाएगा कि वह काका को शांति पहुंचा सके।

 एक दिन बुधुआ घूमते घामते पड़ोस के गांव की टेकरी पर पहुँच गया तो देखता है कि एक आदमी टेकरी के मंदिर में बैठा कुछ कर रहा था, बुधुआ भी देखने के लोभ में ऐसी जगह जाकर खड़ा हुआ जहाँ से उसे सब स्पष्ट दिख सके।

 वह आदमी कुछ बुदबुदाता और वहीँ जमीन पर कुछ फेंक देता इसके बाद धुवें का एक गुबार सा उठता और फिर उस गुबार से बनती एक आकृति और कुछ पल के बाद फिर विलीन हो जाती।

 और अंत में तो कमाल ही हो गया वही टेकरी वाला भूत उस आदमी के सामने आ खड़ा हुआ और आते ही उस आदमी को किसी गुलाम की तरह प्रणाम कर रहा था।

आज बुधुआ का एक संदेह तो ख़तम हो गया था कि टीले वाला भूत  ही सबसे बड़ा है अब उसे भरोसा हो चला था कि टीले वाले भूत को भी हराया जा सकता है।

फिर बुधुआ ने देखा कि वह आदमी अंदर गया मंदिर के और वहां मंदिर के अंदर जो एक भयानक सी मूर्ति रखी थी उसके सामने वह व्यक्ति दंडवत लेट गया और किसी दीन-दास की तरह विनती करने लगा "हे माँ कालिके तेरे आदेशानुसार सब कुछ भली-भांति संपन्न हुआ और आशा है कि आने वाला समय शीघ्र ही शांति का होगा।"

बुधुआ को फिर एक झटका लगा और वह सोचने लगा "पहले टीले वाला भूत ही सर्वशक्तिमान था मेरी नजर में लेकिन फिर वह टीले वाला भूत जिस तरह इस व्यक्ति के सामने दास की भांति आ खड़ा हुआ उससे लग रहा था कि यह व्यक्ति उससे भी शक्तिशाली है किन्तु अब यह व्यक्ति जिस मूर्ति के सामने दासों की तरह पड़ा है तो इसका मतलब यह मूर्ति ही सर्वशक्तिमान है।"

 बुधुआ सरल व्यक्ति था गांव का उसे तो यह भी पता नहीं था कि उसे अब क्या करना चाहिए ?

 लेकिन उसे  एक बात पता थी कि यह व्यक्ति ही उसकी मदद कर सकता है और विचार आते ही वह भागकर पहुंचा उस व्यक्ति के पास और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

 उस व्यक्ति की नजर पड़ी बुधुआ पर तो अनायास ही वह मुस्कुरा उठा "आओ बुधुआ।"

बुधुआ हतप्रभ रह गया कि उस व्यक्ति को उसका नाम कैसे पता चला ?

 लेकिन फिर शीघ्र ही वह सम्भला और उसे उद्देश्य याद आ गया, उसने विनीत भाव से कहा कि " बाबा बहुत तलाश के बाद तुम मिले हो मुझे - कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे कि मैं उस टीले वाले भूत को पराजित कर अपने बाबा का बदला ले सकूँ।"

 उस व्यक्ति ने मुस्कराते हुए उस प्रतिमा की तरफ संकेत किया और कहा "वही है जो सब समस्यायों को जन्म  भी देती है एवं उनका नाश भी करती है।"

बुधुआ ने  कातर भाव से सीधे स्वभाव पूछा "बाबा अगर वह सब करती है तो फिर मेरे बाबा के मरने की जिम्मेदार भी वही हुयी,

'उस टीले वाले भूत को भी उसने ही बनाया होगा जो सबको मार देता है, उसे क्यों बनाया?’

'जब मैं बाबा की याद में अकेले में रोता हूँ और खुद को बहुत अकेला और असहाय महसूस करता हूँ तो यह भी उसी की वजह से होता है, ऐसा क्यों करती है वह?’

कुछ और गहरी मुस्कान के साथ उस व्यक्ति ने बुधुआ को कहा "बुधुआ इसमें वह बिलकुल भी दोषी नहीं होती जबकि सब कुछ वही करती है तब भी ! क्योंकि इंसान को आभासी सोचने-समझने की शक्ति मिली है जिससे वह अपने बुरे और भले के फैसले अपने विवेक का अनुसार ले सकता है और इसी लिए इंसान अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी माना जाता है।'

'बस यही कारण है कि सोच और विवेक भी वही उपजाती है फिर भी उसका दोष उसको लगता है जो सोचता है कि सब कुछ मैं कर रहा हूँ।'

'तुम्हारे बाबा इस संघर्ष में इसलिए प्राण गँवा बैठे क्योंकि उन्होंने अपने शत्रु की थाह और बलाबल का आकलन किये बिना ही उसके साथ लड़ाई करने का निर्णय ले लिया।'

'बिना विचारे किये गए कामों का परिणाम प्रायः विनाशकारी ही हुआ करता है, साथ ही नियति ही तो यही थी !'

'बुधुआ आंख्ने फाड़कर यह सब सुन रहा था लेकिन उसके बेचैन मन में बस एक ही चीज तांडव कर रही थी कि आखिर टीले वाले भूत पर विजय कैसे होगी?'

वह व्यक्ति मनोभाव समझ गया बुधुवा के और फिर मंद-मंद मुस्कराते हुए कह उठा "तो बुधुआ तुम्हारा परम उद्देश्य यही है कि तुम टीले वाले भूत को दंड देकर सदा-सदा के लिए अपने गांव को उससे मुक्त करा देना चाहते हो ना ? लेकिन यह बहुत आसान नहीं है क्योंकि उस भूत के साथ बहुत सी अन्य शक्तियां भी हैं जो उसकी मदद करती हैं जिस कारण उस पर पार पाना बहुत आसान नहीं होगा।"

"कोई तो रास्ता होगा" भावावेश में बुधुआ बीच में ही बोल पड़ा।

"है रास्ता - तो है, लेकिन तुम वह सब कर भी पाओगे या नहीं यह देखना होगा।" उस व्यक्ति ने उत्तर दिया।

"मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ और कितना भी मुश्किल हो तब भी जब तक साँस है तब तक प्रयास करूँगा मैं।" बुधुआ ने उत्तर दिया।

"फिर ठीक है बुधुआ! मैं तुम्हे एक रास्ता बताऊंगा लेकिन याद रखना वह इतना आसान काम नहीं है, अगर थोड़ा सा भी डरे या कमजोर पड़े तो तुम्हे भी अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ सकता है जिसका उत्तरदायित्व तुम्हारा स्वयं का ही होगा।"

 बुधुआ तो जाने कब से इसी दिन और अवसर की प्रतीक्षा में भटक रहा था इसलिए उसने तुरंत सारी शर्तें एक ही झटके में स्वीकार कर लीं और झट से बोला "मुझे सब मंजूर है, आप मुझे बस रास्ता बताइये यदि मेरे साथ कोई घटना या दुर्घटना भी होती है तो सामने उपस्थित देवी को साक्षी मानकर मैं वचन देता हूँ कि उसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व मेरा स्वयं का ही होगा।"

 उस व्यक्ति ने स्वीकारोक्ति की मुद्रा में सर हिलाया और बुधुआ को अपने नजदीक बुलाकर उसके कान में कोई चीज कही - और उसे सुनते ही बुधुआ जड़ता की सी स्थिति में पहुंच गया अगर कुछ विशेष था तो वह कि कुछ पलों के बाद तेज स्पंदन पुरे शरीर में मानों विद्द्युत प्रवाह सा हो रहा हो उसके शरीर में फिर पुनः जड़ता और कुछ पलों बाद फिर से वही विद्द्युत प्रवाहवत स्पंदन पुनः जड़ता, यह क्रम कोई लगभग आध घंटे चलता रहा उसके उपरांत मानों बुधुआ किसी और ही लोक से उतरा हो ऐसा प्रतीत हो रहा था।

पुराना बचपने का भाव और चंचलता मानो स्थिर हो गयी थी उसकी जगह ले ली थी एक तेजस्विता ने और गंभीरता ने लिया, बुधुआ धीरे से झुका और उस व्यक्ति के चरणों में शीश धर दिया उसने और देववाणी में कोई स्तुति सी करने लगा।

 शायद उस व्यक्ति का काम और प्रयोजन दोनों ही पुरे हो चुके थे इसलिए ही शायद हवा में कपूर की तरह वह विलुप्त हो गया लेकिन भाव में बुधुआ अभी अभी स्तोत्र पढ़ रहा था जिसके परिणाम में ऊपर निर्वात में बहुत सी आकृतियां बन और बिगड़ रही थीं, शायद यही नियति है और यही संसार !

स्तुति समाप्त हुयी, बुधुआ ने सर ऊपर उठाया तो उस व्यक्ति का कहीं अता-पता ना था, एक गंभीर सी मुस्कान बुधुआ अधरों में मचल उठी और उसने सामने स्थापित मूर्ति की तरफ चंद कदम बढ़ाये फिर वहीँ दंडवत की मुद्रा में लेट गया, फिर से कोई नयी स्तुति फिजां में गूंज उठी।

अब बारी थी मंद-मंद मुस्कराने की उसकी जो मूर्ति के अंदर विराजमान थी और मूर्ति ही क्यों जो इस सम्पूर्ण जगत के हर जर्रे में विद्यमान है और उसी की लीला थी कि जो बुधुआ कुछ घंटों पहले तक पहाड़ी गंवार लड़का था वह अब किसी विद्वान की तरह स्तुतियों पर स्तुतियां बरसा रहा था, जगतजननी खुद का ही बिछाया खेल देख-देखकर प्रफुल्लित हो रही थी।

नजारा बदल गया था, जगतजननी ने मोहरे को स्वयं चलने की नियति बख्श दी थी, उसकी इतनी कृपा के बाद भला फिर कोई और क्या चाहे ?

अब तो बुधुआ सारा दिन उसी के चरणों में पड़ा रहे, उस बियावान में वह मायाविनी भी एक सेवक पाकर प्रसन्न थी खुद ही पढ़ाती थी और फिर खुद ही उससे सुन सुनकर स्वयं प्रसन्न होती थी लेकिन अभी भी मूल प्रकृति तो बाकी ही थी।

बुधुआ बिक गया भरे हाट और बिककर भी ना जाने कितने स्वामियों से भी अधिक ऐश्वर्य हो गया उसका जिसे पाने को कौन नहीं तरसता भला चाहे वह योगी-जती-सन्यासी कोई भी क्यों ना हो ?

बुधुआ और जगतजननी दोनों मोह में ऐसे उलझे कि बुधुआ अपना असली उद्देश्य मानों भूल ही बैठा, दोनों (माता और पुत्र) बस यही दुनिया रह गयी शेष और यह सब चलते बरसों बीत गए।

एक दिन बुधुआ को समाचार मिला कि उसकी जन्मदात्री माँ अब शायद अपनी अंतिम सांसे ही गिन रही है - भागा-भागा आया और चंद पलों को भी मोहलत ना दी बेदर्द समय ने और एक आत्मा फिर निकल पड़ी अगली यात्रा पर।

जगत मानदंड पुरे करके बुधुआ फिर जगतजननी के प्रेम में खो जाता इससे पहले ही उसे राह दिखाने वाला व्यक्ति बुधुआ को फिर मिला !

उसे देखते ही बुधुआ की आँखों में अश्रुधारा बह निकली, श्रद्धा और भाव के आवेग में वह उस व्यक्ति के पास पहुंचा और उसके चरणों में सर रखकर फफक-फफक कर रो पड़ा और ऐसा रोया कि मानों सारे बंध स्वयं बह निकले और कोई भी पर्दा बाकी ना रहा - कहते हैं कि इष्ट और गुरु को समर्पित के लिए जीव के पास यदि कोई बहुमूल्य वस्तु है तो वह हैं सिर्फ और सिर्फ आंसू।


आंसू दे दिए जिसने गुरु और इष्ट को फिर कुछ देना बाकी नहीं रहता, यह जगत कभी धन की बात करता है तो कभी संपत्ति की कोई झूठे प्रेम के दिखावे से उन्हें अपना बनाना चाहता है तो कोई दुनिया भर के नियमों की बेड़ियों से।

लेकिन भला वह कभी रिक्त रहा है जिसने भाव दिया हो ?

भाव का ऐसा आवेग कि मानों जल-थल सब एक हो गए, बुधुआ का चेहरा लाल भभुका हो गया ऊपर नजर उठाकर देखता है तो क्या देखता है कि जिसके चरणों में पड़ा रो रहा है वह खुद देव है हाथों में मुद्गर,कटा हुआ सर, डमरू और चौथा हाथ अभय मुद्रा में सुन्दर वेश बाल रूप - केश लहरा रहे हैं साथ में स्वान खड़ा है और छवि ऐसी कि देखने के बाद कुछ और देखने की चाह शेष ना रहे।

बटुक लाल ने अभय मुद्रा वाला हाथ सर पर रख दिया बुधुआ के और धीर वाणी में बोले "बुधुआ अब कर्ज चुकाने का समय आ चुका है, भक्ति और प्रेम तो तुमने उत्तम कोटि की पा ही ली है बस अब अंतिम वस्तु तुम्हें देने जा रहा हूँ और उस वस्तु का प्रयोग तुम्हे अपने बुध्दि और विवेक से प्रयोग करना होगा जिससे रक्षा का भाव अधिक रहे एवं विनाश अत्यल्प हो।"

बुधुआ ने स्वीकारोक्ति में अपनी गर्दन हिला दी

बटुक लाल ने अपने हाथ का थोडा सा दबाव दिया बुधुआ के सर पर और फिर एक अद्भुत सी घटना हुयी, कुछ क्षणों तक बुधुआ का शरीर जड़ सा हुआ और प्रतीत हो रहा था कि जैसे बहुरंगी सूर्य रश्मियाँ किसी अज्ञात उद्गम से उत्पन्न होकर बुधुआ के शरीर में समाहित होती जा रही हैं

लेकिन प्रथम घटना की तरह इस बार कोई स्पंदन नहीं हो रहा उसके शरीर में बस वे सभी रश्मियाँ मानों उस जड़ शरीर के लिए निर्मित की हुयी हों निर्माता ने

थोड़े समय के उपरांत बुधुआ का शरीर जड़ता से उबरा तब बटुक लाल ने उसे आगामी संघर्ष के कुछ नियमों और बाध्यताओं के बारे में समझाया:

“बुधुआ जैसे ही तुम संघर्ष के लिए मैदान में उतरोगे, स्वयं का संतुलन बनाये रखना बिना वजह की बातों या भ्रमजाल से उत्तेजित होकर कोई कदम मत उठाना क्योंकि उत्तेजना में किया गया हर कार्य तुम्हे तुम्हारी पराजय के नजदीक लेकर जायेगा,

‘बुधुवा युद्ध में जब शत्रु मायावी हो तो तुम्हारी नजरें और महसूस करने की शक्ति बहुत एकाग्र रखने की जरुरत होगी, तुम्हारी एकाग्रता ख़त्म तो समझो तुम भी ख़त्म,

‘जब शत्रु पर प्रहार करना हो तो याद रखना सदैव शत्रु प्रयुक्त हथियार से विपरीत प्रकृति का हथियार प्रयोग करना और यह सदा जीत की तरफ तुम्हारा कदम होगा,

‘इस युद्ध में हम सब तुम्हे तुम्हारे चतुर्दिक नजर तो आयेंगे किन्तु हममे से कोई भी तुम्हारी प्रत्यक्ष सहायता नहीं करेगा”

बुधुआ थोडा सा सजग हुआ और अनायास ही उसके अधरों से एक प्रश्न स्फुटित हो उठा “आप सब मेरे हैं और आप ही के मार्गदर्शन की वजह से मैं इस धर्मयुद्ध में उतरूंगा किन्तु आप सब मात्र दर्शक होंगे, ऐसा क्यों?”

बटुक लाल ने मनभावनी मुस्कान के साथ उत्तर दिया “बुधुवा इसमें एक राज है – हमारे जितने तुम अपने हो उतना ही वह भी अपना है”

“अर्थात वह भी माँ का और आपका प्रिय है ? यदि ऐसा है तो फिर युद्ध किस बात का ? मैं स्वयं ही इस युद्ध का तिरस्कार करता हूँ!”

“नहीं बुधुआ यह युद्ध अब तिरस्कृत नहीं हो सकता क्योंकि यह युद्ध अब मात्र युद्ध नहीं रहा बल्कि यह तुम्हारी नियति बन चुका और सभी परा-अपरा शक्तियां इस युद्ध का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं”

“क्या यह युद्ध इतना बड़ा और निर्णायक होगा कि इस युद्ध के लिए मुझसे भी ज्यादा व्यग्र अन्य सभी परा-अपरा शक्तियां हैं? आखिर क्या है इस सबका रहस्य ? कृपा करके इस दास को अवगत करावें” बुधुआ ने व्यग्रता पूर्वक पूछा

“बुधुआ इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें अवश्य मिलेगा किन्तु इस युद्ध के पश्चात्, यदि अभी यह प्रसंग चल निकला तो फिर यह युद्ध नहीं हो सकेगा, जो कि जगत जननी स्वयं भी नहीं चाहती” बटुक लाल ने प्रत्युत्तर में कहा

“ठीक है, जैसी आप सबकी इच्छा! मैं तो मोहरा मात्र हूँ सबकी कर्ता और कारण तो वही जगतजननी है” ऐसा कह बुधुआ ने जगतजननी की इच्छा पालन हेतु स्वयं को तत्पर किया

बटुक लाल ने बुधुआ को कुछ और आवश्यक चीजें धीमी आवाज में बतायीं एवं युद्ध हेतु आगामी शुक्रवार के दिन को निर्धारित करना तय हुआ जिसके लिए आवश्यक क्रिया-कलाप बुधुआ को बता दिए गए

बुधुआ ने जिस प्रकार से उसे कहा गया था ठीक उसी प्रकार से सभी कर्म सम्पादित किये एवं अंत में जब चुनौती भोग की बलि उसने टीले वाले भूत को प्रदान की तो उसे सहर्ष उसने स्वीकार किया एवं प्रत्युत्तर में एक सतरंगी माला हवा में लहराई एवं बुधुआ के गले की शोभा बनी जो उस भूत की तरफ से थी एवं जिसका गुण था कि आगामी शुक्रवार तक यदि नियति में बुधुआ की म्रत्यु भी लिखी हो तो वह भी नहीं हो सकती थी भले ही इसके लिए स्वयं धर्मराज स्वयं ही चेष्टा क्यों ना करें?

समय अपनी धुरी पर खिसकता रहा और आज शुक्रवार भी आ गया, ब्रह्ममुहूर्त से ही बुधुआ जगतजननी के चरणों में पड़ा रहा और निर्देशित विधि-विधान संपन्न करता रहा कुछ ही समय में द्वंद का समय हुआ चाहता है अस्तु बुधुआ अपने निर्धारित स्थल की तरफ चल पड़ा लेकिन उससे पहले उसने जगतजननी से अंतिम प्रार्थना की “हे माँ जीत-हार सब तेरी भ्रकुटी की हिलने मात्र से घटित होती हैं, तुम्हारी इच्छा और आदेश की पूर्ति हेतु मैं इस द्वंद का वरण करूँगा किन्तु तुम उसी का साथ देना माँ जो सतमार्गी हो” ऐसा कहकर माँ का बांकुरा निकल पड़ा धर्मयुद्ध के लिए

 निर्धारित स्थल पर पहुंचकर प्रथम बुधुआ ने सुरक्षा त्रिचक्रों का निर्माण किया इसके उपरांत अन्य निर्देशित एवं आवश्यक कार्य पुरे किये तत्पश्चात उसने उस टीले वाले भूत का युद्ध हेतु आवाहन किया – आवाहन पूर्ण होते ही ऐसा प्रतीत हुआ कि टीले से अग्नि शिखाएं निकलकर सम्पूर्ण वातावरण को दहका देंगी और हुआ भी वही आस-पास जो भी वृक्ष, झाड़-झंकाड़ थे वे पलमात्र में स्वाहा हो गए, अब अगर उस परिक्षेत्र में कुछ शेष बचा था तो वह था ज्वालामुखी की तरह दहकता हुआ टीला और उससे कुछ दुरी पर त्रिचक्रों के घेरे में बुधुआ

बुधुआ ने त्रिचक्रों की सुरक्षा में अपनी आँखें बंद कीं और मायाजगत में छलांग लगा दी ताकि वह उस वस्तु को खोज सके जो उसे सत्य का दर्शन करा सके, मायाजगत में प्रवेश करते ही उसे सन्देश मिला कि “टीले वाला भूत प्रथम तीन वार करेगा जो सिर्फ डराने के उद्देश्य से होंगे उनसे प्राण हानि नहीं हो सकती किन्तु यदि किसी ने डरकर या आवेश में आकर कोई प्रतिकार किया तो वह म्रत्यु का ग्रास होगा”
अगला संदेश “टीले वाला भूत सभी वार शत्रु के वाम भाग में स्थित होकर करेगा यदि शत्रु वार के उपरांत अपनी दिशा बदल दे तो कोई भी क्षति नहीं होगी”

तीसरा संदेश “यदि एक प्रहर तक कोई इससे स्वयं को बचा ले तो फिर उसी के हाथों इस भूत का अंत होगा”

बुधुआ को लगभग सभी आवश्यक संदेश प्राप्त हो चुके थे अस्तु उसने आँखें खोलीं और त्रिचक्रों पर दृष्टि जमाई, अंतिम चक्र दहक रहा था अर्थात भूत अब अपना तीसरा प्रहार करने की तैयारी में था जबकि बुधुआ ने दोनों प्रहारों को बिना किसी आवेश और हानि के तिरस्कृत कर दिया था

देखते ही देखते टीले का भाग किसी पहाड़ की तरह ऊपर उठने लगा, गर्द और गुबार पुरे आसमान को अपनी गिरफ्त में ले बैठा था, चारों तरफ अंधकार का साम्राज्य हो गया और फिर अचानक मिट्टी और धुल का ढेर  ऊपर आसमान से बुधुआ की तरफ लपका, ऐसा प्रतीत होता था कि मानों सैकड़ों गाज एक साथ एकत्र होकर धरती के विनाश की कथा लिखने निकल पड़ी हों, वह धुल मिट्टी बुधुआ का स्पर्श करती कि इससे पहले ही किसी अदृश्य, अभेद्य दीवार से टकराकर सब रेत के महल की तरह भरभराकर गिर गया
टीले वाले भूत का तीसरा प्रहार भी निष्फल रहा एवं बुधुआ अपने घेरे में निश्चल!

धुएं का गुबार उठा फिर जैसे एक-एक करके कड़ियाँ जुडती हैं वैसे ही वह धुवां जुड़ने लगा और उससे जो आकृति निर्मित हुयी वह अद्वितीय थी एक गोरा-चिट्टा योद्धा खड़ा था सामने जिसे देखकर स्वतः ही श्रद्धा एवं प्रेम से पूरित हो जाये व्यक्ति का मन
बुधुआ ने उसे देखा और मानसिक प्रणाम प्रेषित किया जिसे उस योद्धा ने उसी सम्मान से ग्रहण कर प्रतिवादन किया

उस योद्धा ने द्वंद युद्ध की मांग की बुधुआ से जिसके प्रत्युत्तर में बुधुआ ने भी मानसिक पुरुष की उत्पत्ति की एवं उसे योद्धा के समक्ष प्रस्तुत किया

द्वंद युद्ध आरंभ हुआ दोनों में से कोई भी हारने को तैयार ना था या फिर मानों प्रकृति ठहर गयी थी और वह स्वयं निर्णय होने देने के पक्ष में नहीं थी क्योंकि जैसे ही योद्धा प्रहार करता मानसिक पुरुष अपना दायाँ भाग उसके समक्ष कर देता एवं जैसे ही मानसिक पुरुष प्रहार करता योद्धा अपना वामांग उसके समक्ष कर देता

एक प्रहर बीतने में थोडा ही समय शेष होगा तभी योद्धा ने भयंकर मायाजाल की रचना कर दी मानसिक पुरुष विखंडित होता इससे पहले ही योद्धा के कई बहुरूप हुए एवं मानसिक पुरुष चारों तरफ से घिर गया,

‘एक घातक मुष्टि प्रहार मानसिक पुरुष के ब्रह्मांड वाले भाग पर पड़ा तो मानों सारा नभक्षेत्र विक्षोभित हो उठा एवं त्रिचक्रों के अन्दर बैठे बुधुआ के नासा छिद्रों से रक्त प्रवाह आरंभ हो गया, मानसिक पुरुष क्षीण पड़ने लगा तब तक एक और घातक पद प्रहार योद्धा ने मानसिक पुरुष के ह्रदय क्षेत्र पर किया उस प्रहार का वेग इतना तीव्र था कि मानसिक पुरुष सम्पूर्ण वेग से त्रिचक्रों को भेदता हुआ बुधुआ से आ टकराया एवं बुधुआ सारे त्रिचक्रों को वेधता हुआ बहुत दूर जा गिरा इस घटना चक्र में अंतिम शब्द जो बुधुआ के ओठों से निकले वह थे “हे माँ, छल हुआ”

योद्धा आगे बढा, एवं अन्य पद प्रहार बुधुआ के कटिं प्रदेश में किया जिस प्रहार की तीव्रता से बुधुआ का पूरा शरीर किसी धनुष की तरह दोहरा हुआ तदुपरांत दूर एक अन्यत्र टीले से जा टकराया, योद्धा अब भी नहीं रुका – आज वर्चस्व की लड़ाई थी!

नजदीक पहुंचकर योद्धा ने चित एवं मृत प्राय बुधुआ के ह्रदय क्षेत्र में पुनः पद प्रहार करने की योजना बनायीं एवं उसका पद बुधुआ के मूल शरीर के ह्रदय क्षेत्र को स्पर्श करता कि इससे पहले ही योद्धा स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह कई मीटर ऊपर उछला और वापस सर के बाल जमीन से टकराया

कोई और होता तो इस तीव्र और गति की घटना से उसका सर किसी तरबूज की तरह खिल उठा होता लेकिन योद्धा था कुशल खिलाडी जितनी तेजी से वह जमीन से टकराया उसी तेजी के साथ पुनः जमीन पर खड़ा हुआ लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने गयी और उसने देखा तो उसके होठों से एक ही शब्द निकला “हे माँ, ये कैसा छल?”

अगली कोई घटना घटती या शब्द निकलता उससे पहले ही रौद्र रूपा माँ कालिका का खड़ग आगे लपका, लेकिन यह क्या ? खड़ग प्रहार व्यर्थ गया !

खड़ग प्रहार व्यर्थ गया यह देख जगत जननी त्रिशूल का संधान करती इससे पूर्व ही योद्धा दंडवत हुआ एवं विनती की “हे जगत की पालक एवं संहारक, भला मुझसे बड़ा भाग्यशाली और कौन होगा इस त्रैलोक्य में ? जिसके हेतु स्वयं तुम्हे आना पड़ा! किन्तु ऐसी कौन सी भूल हुयी मुझसे कि मेरे जैसे तुच्छ को मारने के लिए तुम्हे स्वयं ही आना पड़ा, जबकि तुमने तो कहा था कि जब तक मैं मर्यादाओं की इति नहीं करूँगा तब तक मुझे कोई भी मार ना सकेगा ?’

माँ ने उत्तर दिया “तुमने मर्यादाओं की इति की है चन्द्र! तुमने स्वयं मुझ पर पद प्रहार किया है”

“यह जो शरीर (बुधुआ के शरीर की तरफ इशारा करके कहा) जमीन पर धूल-धूसरित पड़ा है इसके ह्रदय मंदिर में मैं सर्वदा विराजती हूँ, तुमने इस मंदिर को पददलित करने का अपराध किया है,

‘तुम्हारा समय पूरा हुआ चन्द्र”

यह सुन योद्धा उठ खड़ा हुआ और पूर्ण सम्मान के साथ जगतजननी के समक्ष सीना तानकर बोला “मार दे माँ और ले चल मुझे अपने साथ, अब कोई और ख्वाहिश नहीं रही”

त्रिशूल का लपलपाता हुआ फल योद्धा के सीने के आर पार हुआ!

युद्ध का अंत हुआ और गाँव से टीले वाले भूत के आतंक का अंत, बुधुआ और माँ आज भी वहीँ उसी मंदिर में विराजते हैं और कभी कभी आने जाने वालों को किसी अदृश्य आवाज में स्तुतियाँ सुनाई देती हैं।
माता महाकाली शरणम् 

Tuesday, 29 May 2018

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा भाग-10 ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा भाग 10




हमारे बड़े हो जाने पर भी वह पूर्व की ही भांति हमारे यहाँ आता जाता था, वह हमारे पिता का बड़ा दुलारा था और हमारे पिता अपने इष्ट की ही भांति गदाधर की भक्ति करते थे ।
मुहल्ले के कई लोग प्रायः पिताजी से कहा करते थे कि तुम्हारे घर की लड़कियां अब बड़ी हो गईं हैं इसलिए गदाधर का हमेशा आना जाना उचित नहीं है ।

इस पर पिताजी कह दिया करते थे कि इसकी चिंता तुम मत करो, मैं गदाधर को भी अच्छी तरह से जानता हूँ और अपने घर की कन्यायों को भी भली प्रकार जानता हूँ ।

गदाधर हमारे यहाँ आकर विभिन्न पौराणिक कथाएं कहता, भजन गाता और हंसी मजाक करते हुए सबको हंसाता रहता था ।

और इस प्रकार हम उसकी बातों और भक्ति चर्चा का आनंद लेते हुए अपने काम निबटाती रहती थीं, उसके पास रहने से समय का पता ही नहीं चलता था ।

यदि किसी दिन वह नहीं आता था तो हममे से कोई जाकर उसकी खोज खबर ले आती थी कि वह सकुशल है ।

गदाधर बचपन से ही देवी-देवताओं की बहुत सुन्दर मूर्तियाँ एवं चित्र बनाता था और मूर्ति निर्माण के उपरांत उनकी पूजा-अर्चना किया करता था ।

इस प्रकार बाल सुलभ लीलाएं और मस्ती करते हुए तीन साल और बीत गए, और गदाधर अब सत्रहवें वर्ष में प्रवेश कर चुका था उधर रामकुमार जी के अथक परिश्रम से उनकी पाठशाला बहुत अच्छी चल निकली और उसमे उन्हें आय भी बहुत अच्छी होने लगी थी इस बीच वे वर्ष में एक बार कामारपुकुर आकर कुछ दिन वहां बिताते थे।

गदाधर को विद्यार्जन में उदासीन देखकर उन्हें बड़ी चिंता होती थी, १८५३ में जब वे कामारपुकुर आये तो इस विषय में रामेश्वर और चंद्रा देवी से बात करने के बाद गदाधर को भी साथ ले जाना निर्धारित हुआ वैसे भी रामकुमार वहां अकेले ही रहते थे और इस वजह से उन्हें घर के काम करते हुए पाठ शाळा चलाने में काफी परेशानी होती थी।

अतः यही सोचकर यह निर्णय लिया गया कि गदाधर के साथ रहने से रामकुमार को भी थोड़ी राहत मिलेगी एवं रामकुमार के साथ रहने कि वजह से गदाधर का विद्याध्ययन भी सुचारू हो सकेगा, इस विषय में जब गदाधर कि राय मांगी गयी तो वह तुरंत राजी हो गया उसकी भी प्रायः यही सोच थी कि इसी बहाने पिता तुल्य भाई की कुछ सहायता करने का सौभाग्य प्राप्त होगा, अस्तु शीघ्र ही गदाधर और रामकुमार दोनों अपने कुलदेवता और माता की वंदना करके कलकत्ते के लिए प्रस्थान कर गए. इधर गदाधर के जाते ही कामारपुकुर का हाल और आनंद की हाट उजाड़ पड़ गयी अब सभी उसके चाहने वाले उसकी गुजरी हुयी बातों का स्मरण करते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ने लगे।

इधर गदाधर ने यहाँ भी अपने बालगोपालों की टीम बना ली हालाँकि उसका मन पढाई में नहीं लगा, रामकुमार जी ने जो पाठशाला जिस मुहल्ले में खोल रखी थी वहीं पर उन्होंने कुछ घरों में पूजा-पाठ के कार्यों को करने की जिम्मेदारी भी उठा रखी थी परन्तु अधिक काम की वजह से पूजादि के कार्यों के लिए समय बहुत ही कम निकल पाता था जिसकी वजह से रामकुमार जी ने वह जिम्मेदारी गदाधर को सौंप दी।

गदाधर ने अपने मधुर व्यवहार और देवभक्ति आदि की वजह से सभी यजमानों को अति प्रिय होता चला गया।

किन्तु शिक्षा में उदासीन रहने की वजह से एक दिन रामकुमार ने थोडा कड़े शब्दों में गदाधर को कहा जिसके जवाब में बड़ी शालीनता पूर्वक गदाधर ने जवाब दिया “मुझे दालरोटी की चिंता करने और कमाने वाली विद्या नहीं चाहिए, मैं तो उस विद्या की तलाश में हूँ जिससे ह्रदय का ज्ञान उदय हो और जिससे प्राणी मात्र कृतार्थ हो जाता है।

जीवन मंथर गति से चलता रहा और रामकुमार की आर्थिक स्थिति पुनः गिरने लगी और विद्यालय में छात्रों की संख्या गिरने लगी, अनेक प्रयास करने पर भी सुधार होने की कोई गुंजाईश नजर नहीं आ रही थी अतः उनके मन में अब विचार आने लगा था कि शायद इस विद्यालय को अब बंद करना होगा।

जानबाजार और रानी रासमणि:

कलकत्ते में इधर तो राकुमार अपनी आय और गृहस्थी की चिंता में घुले जा रहे थे और उधर गदाधर के जीवन के उत्तर भाग की भूमिका दखिनेश्वर के रूप में निर्मित होने जा रही थी जिसकी नींव कुछ इस तरह तय हो रही थी।

कलकत्ता के दक्षिण भाग में जान बाजार नमक मुहल्ले में रानी रासमणि का निवास अर्थात महल था वहां के राजा रामचंद्र दास जो धीवर जाति के थे अपने पीछे चौवालिस वर्षीय रानी रासमणि और चार कन्याओं को छोड़ स्वर्ग सिधार गए थे और इस प्रकार से अपार संपत्ति और राज के प्रबंध की सम्पूर्ण जिम्मेदारी उनके कन्धों पर आ गयी थी।

वहीँ पास में ही अंग्रेजी फ़ौज की छावनी थी जिसमें अंग्रेज सिपाही रहते थे, और जैसा कि सर्वविदित है अंग्रेजों की नीति येन-केन प्रकारेण बहाने बनाकर उन बहानों की आड़ में राज्यों को हड़पने का कुचक्र चलता ही रहता था और शायद इसी भावना से या फिर संयोगवश एक दिन कुछ सिपाहियों ने मदिरा पान कर रखा था एवं रानी के दरबानों से व्यर्थ ही उलझ कर पूरा का पूरा जत्था राजमहल के अन्दर प्रवेश कर गया, इसकी भनक मिलते ही रानी रासमणि हथियारों से सुसज्जित होकर निकलीं तब तक जान बाजार में बात फ़ैल गयी और वहां के स्थानीय लोग भी एकत्र हो गया, सभी ने मिलकर उन सिपाहियों को अच्छी खबर ली।

रानी रासमणि माँ काली के चरणों में अत्यधिक प्रीत रखती थीं और इस बात का ज्ञान इसी हो जाता है कि उनकी राजकीय मुहर में "कालीपद अभिलाषी – रानी रासमणि दासी" खुदा हुआ था, ठाकुर कहा करते थे "तेजस्विनी रानी की सी भक्ति प्रायः देखने में नहीं आती – लोक कल्याण का कोई भी कार्य हो और यदि वह रानी के हाथों पूरा होना हो तो रानी रासमणि उसे पूरा करके ही मानती थी।"

क्रमशः 

माता महाकाली शरणम् 

Wednesday, 1 February 2017

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 9

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा


गदाधर का १२वें वर्ष में प्रवेश हुआ और उसी समय बड़े भाई रामकुमार की पत्नी का प्रसूति काल नजदीक आया और वह एक सुन्दर पुत्र को जन्म देकर इस क्षणभंगुर दुनिया से चली गयीं.

रामकुमार की पत्नी के स्वर्गवास के साथ ही पारिवारिक उथल-पुथल फिर आरंभ हुयी और पुनः आर्थिक दशा दयनीय होने लगी और अब तो कर्ज भी दिनोंदिन बढ़ने लगा आर्थिक स्थिति सुधारने के उद्देश्य से रामकुमार जी ने इष्ट मित्रों से विचार-विमर्श करके अन्यत्र जाकर कोई कार्य करने का निश्चय किया और फिर कुछ समय पश्चात् ही वे कामारपुकुर छोड़कर कलकत्ता चले गए जहाँ झामापुकुर मोहल्ले में एक पाठशाला खोली .

मुहल्ले के लोगों और स्त्रियों की आँखों का तारा हो गया था गदाधर और कुछ स्वतंत्र भी जबसे रामकुमार कलकत्ता जाकर बस गए थे, मुहल्ले में ही वैश्यों की बस्ती में दुर्गादास पाइन नाम के एक बहुत धनाढ्य सज्जन रहते थे जिनका गदाधर पर बहुत स्नेह था किन्तु उनके यहाँ पर्दा प्रथा बहुत गहरी थी और इस प्रथा का पालन वे बहुत ईमानदारी से करते थे यहाँ तक कि गदाधर को भी स्त्रियों के बीच जाने की अनुमति नहीं थी और इस सम्बन्ध में वे अक्सर कहा करते थे “ मेरे घर की स्त्रियाँ कभी किसी की नजर में नहीं पड़ सकती हैं”

और चूँकि सीतानाथ पाइन जैसे अन्य लोगों के घर में इतनी बाध्यकारी पर्दा प्रथा नहीं थी इसलिए वे इन्हें अपने से निम्न कोटि का समझते थे .

एक दिन प्रसंगवश किसी सज्जन से दुर्गादास इसी सम्बन्ध में चर्चा करते हुए बड़े गौरवपूर्ण स्वर में अपने घर की पर्दा प्रथा की चर्चा कर रहे थे उसी समय वहां गदाधर पहुँच गया और सब सुनकर बोला “ क्या पर्दा स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा कर सकता है “?

“अच्छी शिक्षा और देवभक्ति ही किसी व्यक्ति के अंतर में सद्गुण और पवित्रता उत्पन्न कर सकता है, यदि मैं चाहूँ तो आपके घर के परदे के अन्दर से भी आपकी घर की स्त्रियों को देख लूँ और उनकी सारी बातें जान लूँ”.

दुर्गादास ने बड़े गर्व से कहा “ अच्छा तू कैसे देखता है जरा मैं भी तो जानूं “?

“समय आयेगा तब बताऊंगा” ऐसा कहकर मुस्कराते हुए गदाधर अपने रास्ते चला गया.

बाद में एक दिन संध्या समय स्त्री वेश धारे और बगल में टोकरी दबाये दुर्गादास के दरवाजे जा खड़ा हुआ और दुर्गादास से बोला “मैं पास के गांव से दूसरी औरतों के साथ सूत बेचने बाजार आई थी, वे लोग मुझे छोड़कर चली गयीं और मैं अकेली रह गयी इसलिए रात बिताने की जगह देख रही हूँ, अगर रात भर सर छुपाने की जगह मिल जाये तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी”

दुर्गादास ने उससे कुछ बातें और गाँव का नाम आदि पूछकर अनुमति दे दी और बोला कि “अन्दर जाओ और औरतों से पूछकर वे जहाँ कहें वहां रह जाना”

बड़ी कृतज्ञता से गदाधर ने हाथ जोड़े और अन्दर जनाने खाने की तरफ चल दिया और ठीक उसी प्रकार सारा किस्सा बताकर उनसे तरह-तरह की बातें कीं, उसके बातचीत करने के तरीके और संभाषण ने लगभग सबका मन मोह लिया इसके पश्चात् उस घर की महिलाओं ने एक कोठरी में उसके सोने और जलपान की व्यवस्था कर दी.

चुपके से गदाधर ने मौका निकालकर सब देख लिया,

इधर चंद्रा देवी बहुत परेशान होने लगीं जब बहुत देर रात गए भी गदाधर घर नहीं पहुंचा ।

तो बहुत बेचैन हो गयीं और रामेश्वर को उसे ढूंढ लाने को कहा, रामेश्वर ने उसे हर उस संभावित जगह ढूंढा जहाँ भी उसका आना जाना था ।

सीतानाथ जी के घर भी जब गदाधर ना मिला तो बस ऐसे ही रामेश्वर ने दुर्गादास जी के घर के पास से गुजरते हुए गदाधर-गदाधर की आवाज लगायी, उधर बड़े भाई की आवाज सुनकर और यह भांपकर कि रात बहुत अधिक हो गयी है गदाधर भीतर से ही "आता हूँ भैया" कहता हुआ बाहर भागा ।

दुर्गादास जी को समझते देर नहीं लगी कि गदाधर ने उन्हें मुर्ख बना दिया, यह सोच उन्हें प्रथम तो बड़ा क्रोध आया परंतु फिर उसकी मधुर बातें और स्त्रियों की तरह की भाव-भंगिमाएं आदि के बारे में याद हुआ तो अनायास उनकी हंसी निकल पड़ी ।

शीघ्र ही यह बात सारे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गयी और सब कहने लगे कि गदाधर ने दुर्गादास जी के घमण्ड को चूर कर दिया, किन्तु दुर्गादास ने उसके बाद गदाधर को कभी भी उनके घर आने जाने की छूट दे दी ।

वैश्य मुहल्ले की सभी स्त्रियों को गदाधर से बड़ा स्नेह था और जब भी कभी ईश् भजन आदि के समय उसे भाव समाधि लग जाती थी तब सभी स्त्रियां उसकी पूजा श्री गौरांग या श्रीकृष्ण के भाव से करती थीं ।

उन लोगों ने उसके अभिनय के लिए एक सोने की मुरली एवं स्त्री-पुरुषों के उपयोग संबंधी विविध सामग्रियों का संग्रह भी कर रखा था ।

श्रीरामकृष्णलीलामृत नामक पुस्तक में एक प्रसंग वर्णित है कि 1893 में स्वामी सारदानंद जी आदि कामारपुकुर गए थे वहां उन्हें सीतानाथ पाइन जी की पुत्री रुक्मिणी देवी के दर्शन एवं उनसे बात करने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ , रुक्मिणी देवी जो उस समय 60 वर्ष के आस पास हो चुकी थीं उन्होंने कुछ इस प्रकार गदाधर के बाल्यकाल की घटना का चित्रण किया ।

"हमारा मकान यहाँ से उत्तर की ओर बिलकुल समीप ही है जो अब टुटा-फूटा सा ढांचा दिख रहा है किंतु जब उस समय मेरी आयु सत्रह या अट्ठारह वर्ष की थी उस समय हमारा मकान किसी धनवान की हवेली के समान ही हुआ करता था, और हमारे घर सब मिलाकर कुटुंब की सत्रह या अठारह बहनें हो जाती थीं ।

और हम सब लगभग हमउम्र ही हुआ करते थे, बचपन से ही गदाधर हम सबके साथ ही खेला करता था और सब उससे बड़ा प्रेम मानते थे ।

क्रमशः ....... 

माता महाकाली शरणम् 


Tuesday, 29 November 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 8




उपनयन संस्कार:

गदाधर का अब नौवां वर्ष समाप्त होने को आया था यह सोच अग्रज रामकुमार ने उसका उपनयन संस्कार करने का सुनिश्चित किया और रामकुमार के इस विचार से सभी को बहुत प्रसन्नता हुयी किन्तु सबसे अधिक प्रसन्नता धनी को हो रही थी क्योंकि इस संस्कार में गदाधर उससे प्रथम भिक्षा ग्रहण करने वाला था ( पूर्व समय में ही एक समय धनी ने गदाधर से विनती की थी कि उपनयन संस्कार में वह उससे भिक्षा ग्रहण करे) अस्तु इसी विश्वास के कारण बड़े प्रयत्न से और मेहनत से जोड़े गए थोड़े से पैसों के साथ उस दिन का इंतजार करने लगी जबकि गदाधर को वह प्रथम भिक्षा देगी .

इस सम्बन्ध में गदाधर ने रामकुमार जी को बता दिया लेकिन कुल में पूर्व में कभी ऐसा नहीं हुआ था और दुसरे धनी नीची जात की थी इसलिए सामाजिक समस्या भी थी. इसी उहापोह में उपनयन संस्कार का समय नजदीक आ गया किन्तु गदाधर की जिद की वजह से लग रहा था कि संस्कार को कहीं स्थगित ना कर देना पड़े.

उसी समय जब इस बात का पता धर्मदास लाहा जी को पता चली तो उन्होंने रामकुमार को बुलाकर इस सम्बन्ध में बातचीत की और कहा “ तुम्हारे कुल में पूर्व में ऐसा कुछ नहीं हुआ यह बात तो ठीक है लेकिन किन्ही-किन्ही कुलीन ब्राह्मण परिवारों में पूर्व में भी ऐसी चीजें हो चुकी हैं”

धर्मदास जी कि बात सुनकर रामकुमार को संतुष्टि हुयी और अंततः संस्कार संपन्न हुआ और धनी को गदाधर की भिक्षा माता होने का गौरव प्राप्त हुआ .

महाशिवरात्रि:

उपनयन संस्कार संपन्न हो जाने के उपरांत गदाधर को संध्या एवं देवपूजन का अधिकार प्राप्त हुआ अस्तु अब वह अपना अधिकाधिक समय पूजन और ध्यानादि में लगाने लगा, स्वपिता के समान उसे भी देव-दर्शन हों और दिव्य स्वप्नादि दिखें इस हेतु उसने मन लगाकर देवताओं की भक्ति और सेवा पुरे मनोयोग से आरंभ कर दी.

उसी वर्ष महाशिवरात्रि के दिन गदाधर ने व्रत रखा था और पूर्ण मनोयोग से महादेव की पूजा-अर्चना पूर्ण की थी, उसके साथ उसके तमाम सखा और अन्य बालकों ने भी उपवास किया था और सबने निर्धारित किया था कि रात्रि में सीतानाथ पाइन के घर में आयोजित होने वाले शिवमहिमा के नाटक को देखकर जागरण किया जायेगा.

पूजा इत्यादि संपन्न करके गदाधर बैठा ही था कि उसके साथियों ने आकर उससे कहा “ गदाधर ! जिस लड़के द्वारा शिवजी का अभिनय किया जाना था रात्रि जागरण के नाटक में वह लड़का अचानक ही अस्वस्थ हो गया है अतः आज रात्रि में शिव जी का खेल तुझे ही करना पड़ेगा.

गदाधर ने उत्तर दिया “मेरी पूजा में विघ्न पड़ जायेगा इसलिए मैं इस खेल में भाग नहीं ले सकता”

सभी साथी उस पर बार-बार दबाव बनाने लगे एवं विभिन्न प्रकार से उसे मनाने लगे और कहने लगे कि “जब तू शिवजी के वेश में आएगा और उनके नाम का अभिनय करेगा तो तेरे विचारों में और मष्तिष्क में शिव व्याप्त हो जायेंगे और तु शिवमय हो जायेगा, यह भला किसी पूजा से कम है क्या “?

यदि तूने आज अभिनय नहीं किया तो शिवमहिमा के खेल का क्रम टूट जायेगा और फिर सोच सबको कितनी निराशा होगी इस बात से”

उन सब लोगों के बहुविधि आग्रह और तर्कों के सामने गदाधर राजी हो गया . और अंततोगत्वा रात्रि का वह समय भी आ गया जब गदाधर जटा-जूट बांधकर और पुरे शरीर पर भस्म रमाये हुए महादेव का वेश धारण करके सभा में आया.

उसे देखकर कोई भी व्यक्ति यह कह ही नहीं सकता था कि यह स्वयं महादेव नहीं बल्कि कोई अन्य बालक उनके वेश में है.

मनोहारी वेश देखकर ऐसा लगता है मानो शिव स्वयं ही आज सभा में उतर आये हैं, अभी खेल का मंचन आरंभ भी नहीं हो सका था कि गदाधर उस वेश में इतना तन्मय हो गया कि उसे भाव समाधि लग गयी और नाटक धरा का धरा रह गया .

लोगों का सारा का सारा ध्यान गदाधर पर ही लग गया और उसे जल्दी से उठाकर ले जाया गया और होश में लाने की कोशिश आरंभ की जाने लगी लेकिन बहुत प्रयासों के बाद ही उसे होश में लाया जा सका .

उस दिन के बाद तो यह नियमित ही होने लगा और जब भी वह किसी देव या देवी स्तुति-ध्यान करता तो उसे भाव समाधि लग जाती, पहले-पहल तो सभी इस बात को लेकर बहुत चिंतिंत रहते थे कि इस तरह की घटनाओं से गदाधर को स्वास्थ्य संबंधी समस्या ना होने लगे किंतु शनैः शनैः यह एक सामान्य क्रम बन गया और लोग भी आश्वस्त हो गए कि शारीरिक और स्वास्थ्य संबंधी हानि नहीं हो रही है

क्रमशः ......... 

माता महाकाली शरणम् 
 

Tuesday, 1 November 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 7

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हालाँकि गदाधर की उम्र अभी उस स्तर की नहीं थी जहाँ बहुत भावावेग और म्रत्यु और जीवन के लिए सोचने का अधिक माद्दा होता लेकिन फिर भी पिता की म्रत्यु ने उसे इतना परिपक्व और गंभीर कर दिया कि वह अब अपने दुःख को प्रकट करने की बजाय अधिकाधिक यह कोशिश करता कि माँ को दुःख का आभास ना होने दे .

पिता की म्रत्यु ने गदाधर को एकाकी और आत्मकेंद्रित कर दिया था इस छोटी अवस्था में में भी पितृ वियोग ने उसे हिलाकर रख दिया था लेकिन उस बालक ने अपनी भावनाओं को बाहर नहीं आने दिया लेकिन इस वियोग ने उसे निकट के श्मशान और एकाकी जगहों का मुसाफिर बना डाला था .

कहते हैं कि समान रूप से दुखी व्यक्ति आपस में एक दुसरे की अधिक परवाह करने लगते हैं शायद इसी वजह गदाधर के मन में माँ के लिए अधिकाधिक प्रेम उमड़ने लगा था और उसकी यह कोशिश रहती थी कि उससे अब कोई ऐसा काम ना हो जिससे माँ को कोई ठेस लगे और अब पुनः गदाधर पाठशाला जाने लगा था लेकिन पाठशाला में मन कहाँ लगता वह तो भजन-पुराण और देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण में ही रमा रहता था .

गाँव में लाहा बाबु की धर्मशाला थी थी जहाँ वे सभी संत और भक्त रुका करते थे जो जगन्नाथ पुरी की तरफ जाया करते थे और गाँव में भिक्षाटन करके भोजन आदि का बंदोबस्त करते थे, गाँव में पुराण आदि की कथाओं में गदाधर सुना करता था कि “संसार अनित्य है” और यह भी उसने सुना था कि इसी बात के ज्ञान की वजह से साधू-संत और वैरागी लोग नित्य संसार से विरक्त रहकर ईश्वर की सेवा और गुणगान में अपना समय व्यतीत करते हैं और ऐसे साधुओं की संगत से जीव का कल्याण होता है .

इसी ज्ञान के वशीभूत हो वह प्रायः धर्मशाला में आया जाया करता था और देखता था कि वे किस प्रकार धुनी में अग्नि प्रज्ज्वलित करके भगवत चिंतन में निमग्न हो जाते थे, साथ ही भिक्षाटन में जो भी सामग्री प्राप्त होती थी उसे अपने इष्ट को समर्पित करने के उपरांत प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं ना धन की चिंता ना किसी की परवाह यदि कभी अस्वस्थ भी होते हैं तो उसे भी इष्ट की इच्छा मान अपने इष्ट को समर्पित कर देते हैं यह सब बातें गदाधर के बाल मन पर गहरी उतरती जा रही थीं और अपनी इन्ही भावनाओं के वशीभूत हो बालक गदाधर उन साधू-वैरागियों की सेवा में तत्पर रहने लगा उनके लिए लकड़ी-पानी की व्यवस्था करना और उनके स्थान की साफ-सफाई आदि भी करने लगा उन साधू-वैरागियों को भी इस मनोहारी बालक से स्नेह महसूस होने लगता था और अपने स्नेह वश वे बालक को अनेक प्रकार के दोहे, भजन, उपदेश और कथाएं सुनाते थे साथ ही अपने प्रसाद में से उसे प्रसाद खाने को भी देते थे .

गदाधर जब आठवें वर्ष में प्रवेश हुआ तब उस धर्मशाला में कुछ साधू बहुत दिन तक ठहरे, गदाधर उनका बहुत प्रेमपात्र बन गया था पहले तो आरंभ में किसी को इस बात का ज्ञान ना था किन्तु जब वह निरंतर दिन में कई-कई बार धर्मशाला जाने लगा तब यह बात सबको पता चली, प्रायः वह धर्मशाला से ही प्रसाद पाकर आता था और घर में जब माँ उसे खाने को कहती तो वह बोलता कि “ मुझे भूख नहीं है”.

पहले तो इस बात को संतो की कृपा समझकर चंद्रा देवी ने कोई खास ध्यान नहीं दिया किन्तु जब कई बार वह सन्यासियों कि तरह विभूति रमाये तो किसी दिन तिलक लगाये और कभी सन्यासियों की तरह लंगोटी पहने और अंचला ओढ़कर आता और माँ से कहता कि “देखो मुझे साधुओं ने कैसे सजा दिया है” तो इन बातों से चंद्रा देवी का मन घबरा गया और उन्हें डर सताने लगा कि किसी दिन ये साधू-सन्यासी उनके बेटे को बरगलाकर ले ना जाएँ और इसी क्रम में एक दिन जैसे ही गदाधर घर आया वे उसे गले लगाकर रोनें लगीं और कहने लगीं “बेटा संभलकर रहना नहीं तो किसी दिन वो साधू-सन्यासी तुझे बरगलाकर अपने साथ ले जायेंगे”.

गदाधर ने अपनी माँ को समझाया लेकिन चंद्रा देवी के मन का डर किसी भांति कम होने का नाम नहीं ले रहा था ऐसा देखकर गदाधर ने माँ से कह दिया कि अब वह उन सन्यासियों के पास नहीं जायेगा और यही बात गदाधर ने सन्यासियों से भी कह दी कि उनकी माँ नहीं चाहतीं कि वह सन्यासियों से कोई मेल-जोल रखें.

यह सब जानकर सन्यासी गदाधर के घर आये और चंद्रा देवी को आश्वासन दिया कि “ किसी बालक को बहला-फुसलाकर ले जाने का कोई विचार कभी उनके मन में नहीं आया और वैसे भी किसी अल्पवयस्क बालक को उनके अविभावकों की अनुमति के बिना यदि ले जाया जाये तो यह घोर अपराध की श्रेणी में आता है, अतः इस विषय पर उन्हें निश्चिंत रहना चाहिए . यह सुनकर चंद्रा देवी का संदेह समाप्त हो गया और उन्होंने गदाधर को उन साधु-सन्यासियों के पास आने-जाने की अनुमति दे दी .


विशालाक्षी देवी:

कामारपुकुर से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दुरी पर आनुड गाँव पड़ता है जहाँ विशालाक्षी देवी का मंदिर स्थित है, जिसके बारे में मान्यता है कि वह मंदिर जाग्रत अवस्था में है और वहां पर सभी की इच्छाएं पूर्ण होती हैं वहीँ जाने की तैयारी में सभी महिलाएं व्यस्त थीं.

उनको जाते देखकर गदाधर बोला कि मैं भी चलूँगा, प्रथम तो महिलाओं ने ले जाने से मना कर दिया और कह दिया कि इतनी छोटी उमर में इतनी दूर तक पैदल कैसे चलेगा, पर गदाधर ना माना और अंततोगत्वा महिलाओं ने उसे साथ जाने की अनुमति दे दी, इस बात से गदाधर को अपार हर्ष हुआ और वह आनंदीभुत होकर सबके साथ देवी-देवताओं के भजन गाते हुए चलने लगा.

थोड़ी दूर इसी तरह चलने के बाद गदाधर को भावावेश हो गया, अचानक से आवाज रुक गयी, आँखों से आसुओं की धारा बहने लगी, और वह चेतना शून्य होकर पृथ्वी पर गिर गया, इस प्रकार की घटना से सभी महिलाएं बहुत ही अधिक घबरा गयीं और कोई शरीर पर हवा करने लगी तो कोई पास के जलाशय से जल लाकर चेहरे पर डालने लगीं तो कोई देवी से अनेक प्रकार कि मन्नतें मांगने लगीं किन्तु गदाधर के होश थे कि आने को तैयार ही ना थे.

तभी तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल किसी महिला ने सुझाया कि संभवतः गदाधर पर देवी विशालाक्षी की सवारी आई है बस फिर क्या था सभी महिलाओं ने भक्ति पूर्वक प्रार्थना और भक्ति गीतों कि झड़ी लगा दी इसके तुरंत बाद आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि गदाधर पूर्णतया स्वस्थ होकर उठ बैठा और उसके शरीर में कमजोरी या अस्वस्थता का कोई लक्षण तक ना था यह देख सभी औरतों को पूरा विश्वास हो गया कि गदाधर पर देवी का ही आवेश हुआ था, तत्पश्चात सभी महिलाएं गदाधर को लेकर मंदिर गयीं और पूजा अर्चना के बाद जब वापस आयीं तो सम्पूर्ण वृत्तांत चंद्रा देवी को यथावत कह सुनाया और यह सब सुनकर चंद्रा देवी को बहुत चिंता हुयी उन्होंने गदाधर की नजर उतारी और माता विशालाक्षी से गदाधर के मंगल की बहुविधि प्रार्थना और कामना की .


क्रमशः 

माता महाकाली शरणम् 

Tuesday, 30 August 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 6




यह सुनकर वह स्त्री गदाधर को बांह पकड़कर चंद्रा देवी के पास ले गयी और हँसते हुए सारा वृत्तांत कह सुनाया और यह सुनकर चंद्रा देवी ने मुस्कुराते हुए अति मधुर वचनों से गदाधर को समझाया “ ऐसा करने से तुझे कुछ भी ना होगा किन्तु स्त्रियों का मत है कि यदि स्नान करते हुए उन्हें कोई पुरुष देखता है तो इसे स्त्रियों का अपमान समझा जाता है – उन सबको तो तु मेरी ही तरह अपनी माँ और काकी कहता है तब क्या उनका अपमान मेरा अपमान नहीं हुआ और मेरा गदा ऐसा काम कैसे कर सकता है जिससे अन्य स्त्रियों अथवा मेरा अपमान हो”?

और यह बात गदाधर के बाल मन में बैठ गयी एवं इसके उपरांत फिर गदाधर ने पुनः वैसा कार्य नहीं किया .

पाठशाला में गदाधर की शिक्षा-दीक्षा बहुत बढ़िया चल रही थी और अपनी कुशाग्र बुद्धि से वह सब कुछ आसानी से समझ लेता था किन्तु गणित विषय से उसे घृणा सी थी और गिनती एवं अन्य गणितीय विषय उसकी समझ से परे थे साथ ही नूतन बातें और विषय उसे बहुत रुचिकर लगते थे वह प्रायः कुम्हारों को मूर्तियाँ बनाते हुए बड़ी तन्मयता से देखता था और घर आकर वैसी ही मूर्तियाँ बनाने की चेष्टा करता और उन्हें सुन्दरता के साथ बना भी लेता था .

ज्यों-ज्यों गदाधर बड़ा हो रहा था उसका मन भक्ति और आध्यात्म की ओर झुकाव हो रहा था उसे भगवत कथाओं और पुराणों आदि की कथा सुनने में विशेष आनंद आता था .

गदाधर बचपन से ही निडर और साहसी था एक बार की बात है उसकी बुआ रामशीला घर आई हुयी थीं और प्रचलित किवदंतियों के अनुसार वह पूरा ही परिवार शीतला माता का अनन्य भक्त था और रामशीला पर शीतला माता का संचार भी हुआ करता था और उस दिन उनके शरीर में शीतला देवी का संचार हुआ और उस दशा में उनका हट-पैर पटकना और बडबडाना देखकर घर के सारे लोग परेशान थे किन्तु गदाधर पास जाकर उनका निरीक्षण कर रहा था बाद में चंद्रा देवी से कहने लगा “बुआ के शरीर में जो देवी आई थी वही मेरे भी शरीर में आये तो फिर बहुत मजा आए”

भूरसुबो के माणिकराजा खुदीराम जी की धर्म परायणता से उन पर बहुत श्रद्धा रखते थे और उन्हें बारम्बार अपने यहाँ बुलाया करते थे, गदाधर जब छठवें वर्ष में पहुंचा तब खुदीराम जी उसे लेकर उनके वहां गए थे वहां गदाधर का मेलजोल और बर्ताव देखकर कोई यह कह ही नहीं सकता था कि यह बालक इस घर में प्रथम बार आया है और अपरिचित है.

माणिकराजा के भाई रामजय बालक को देखकर मुग्ध से हो गए थे और उन्होंने खुदीराम जी से कहा “तुम्हारा यह पुत्र बिल्कुल भी साधारण व्यक्ति नहीं है यह कोई देव अंश प्रतीत होता है, जब भी इस तरफ आया करो इसे साथ में जरुर लाया करो इसे देखकर मन बहुत आनंदित होता है”

माणिकराजा को भी शायद चैन नहीं मिल रहा था अस्तु जब काफी दिन तक खुदीराम जी का उनकी तरफ जाना नहीं हो सका तो उन्होंने ने खुद ही एक महिला को खुदीराम जी के घर भेज दिया कि वह गदाधर को अपने साथ ले आवे .

पिता कि अनुमति लेकर गदाधर उस महिला के साथ माणिक राजा के यहाँ पहुँच गया और पूरा दिन वहीँ रहकर साँझ अलंकार और मिठाई की भेंट लेकर कामारपुकुर वापस आया .

गदाधर अब सातवें वर्ष में प्रवेश कर चुका था और अपनी सरल,विनोदी और मिलनसारिता की वजह से सभी अडोस-पड़ोस के लोगों को खास तौर पर स्त्रियों का चहेता हो गया था, पड़ोस की स्त्रियों के घर में यदि कोई विशेष भोजन या मिष्ठान आदि बनता तो वे उसमे से गदाधर का हिस्सा अलग करके रख लेती थीं और समय मिलते ही जाकर उसे बड़े वात्सल्य भाव से खिलाकर स्वयं तृप्त महसूस करती थीं .

इसी प्रकार उसके मित्र भी यदि उनके घर में कुछ विशेष बनता था तो अपने भाग में से गदाधर के लिए बचाकर रख लेते थे और मिलते ही उसे बड़े चाव से खिलाते थे .

सबका चहेता होने की वजह से गदाधर का स्वास्थ्य आरम्भ से ही बहुत उत्तम और सुगठित था किन्तु उसकी स्वाभाविक एकाग्रचित्तता और किसी विषय में पूर्ण रूप से डूब जाने की प्रवृत्ति की वजह से इतना तन्मय हो जाता था कि उसे अपने शरीर की सुधि भी ना रह जाती थी .

एक बार गदाधर खेतों के मेड़ों से गुजर रहा था और आसमान में काले बादल जैसे उमड़ने लगे थे साथ ही धवल बगुले मानों किलोल कर रहे थे और इस भावात्मक प्रतिबिम्ब में गदाधर इतना डूब गया कि उसे मूर्छा आ गयी और वह वहीँ मेड पर गिर गया बहुत शुश्रूषा के बाद होश आया तो घर वालों को ये डर सताने लगा कि कहीं यह मूर्छा स्थायी बीमारी बनकर ना रह जाये अस्तु तरह-तरह के औषधि और शांति प्रयोग कराये जाने लगे .

जबकि गदाधर का कहना था कि “मुझे आयी मूर्छा किसी रोग वश नहीं थी बल्कि मुझे उस समय अत्यधिक आनंद की अनुभूति हो रही थी और मेरा मन उस दृश्य में स्थिर हो गया था”

1843 के शारदीय दुर्गा पूजन का समय आ पहुंचा था, खुदीराम जी के भांजे राम चाँद जी प्रायः वर्ष भर मेदिनीपुर में रहते थे लेकिन दुर्गोत्सव के समय अपने पैतृक गांव सेलामपुर में बड़े धूम-धाम से मनाया करते थे और उत्सव में खुदीराम जी भी पहुँचते थे और इस बार भी उन्हें निमंत्रण मिला था .

खुदीराम जी की आयु लगभग अब ६८ वर्ष पहुँच चुकी थी और इस वर्ष में लगातार संग्रहणी की वजह से उन्हें बहुत समस्या और कमजोरी का सामना करना पड़ रहा था और इसी वजह से वे कशमकश में थे कि उन्हें उत्सव में सम्मिलित होना चाहिए या नहीं फिर यह सोचकर कि अब तो जीवन का वह भाग शुरू हो चुका है जब आज है तो कल देखने को मिलेगा या नहीं इसी विचार से उन्होंने उत्सव में सम्मिलित होने का मन बना लिया .

सेलामपुर पहुँचते ही उनका संग्रहणी रोग पुनः उभर गया और वे शिथिल होने लगे हालाँकि राम चाँद ने यथा उपयुक्त उपचार आरम्भ करवा दिया किन्तु रोग था कि शांत होने की जगह और उफान पर लग्ने लगा और इसी तरह अष्टमी तक के दिन बीते लेकिन नवमी के दिन उनका रोग इतना बढ़ गया कि सभी लोगों ने पूरी रात आँखों ही आँखों में काट दी और खुदीराम जी के मुख से आवाज निकलनी भी बंद हो गयी – सबको इस बात का आभास हो चला था कि बस अब अंतिम काल है और किसी भी समय आत्मा परमात्मा से मिलन के लिए निकल सकती है, खुदीराम जी की यह हालत देखकर राम चाँद की आँखे छलछला आयीं और ह्रदय में हुक सी उठ रही थी भावावेश में वे बोल उठे “मामा आप तो सदैव रघुवीर-रघुवीर जपा करते हो फिर आज क्या हुआ जो ऐसे पड़े हो और रघुवीर को भी नहीं भज रहे हो” रघुवीर सुनते ही खुदीराम जी में प्राणों का मानो संचार हुआ और धीमे कांपते हुए स्वर में पूछा “कौन राम चाँद ? प्रतिमा विसर्जन हो गया क्या ?

अच्छा ठीक है अगर सब कार्य सम्पूर्ण हुआ तो मुझे जरा सहारा देकर एक बार उठाकर बिठाओ तो !”

और यह सुनकर जब सभी ने मिलकर उन्हें उठाकर बिठाया तो बड़े गंभीर स्वर में उन्होंने तीन बार ‘रघुवीर’ उच्चारण किया और बस दीपक बुझ गया, दुल्हन अपने पिया से मिलने कि बेकरारी में सब कुछ छोड़ छाड़ कर विदा हुयी .

खुदीराम जी के सिधारते ही चंद्रा देवी का मन विरक्ति भाव से भर उठा लेकिन छलिनी माया भला किसी को ऐसे बख्शती है क्या ?

कुछ ही दिनों में गदाधर की चंचलताओं और चार वर्षीय सर्वमंगला के रूप में मोहपाश फिर फ़ैल गया .

रामकुमार परिवार के ज्येष्ठ पुत्र थे और अब परिवार की समस्त जिम्मेदारी उनके ही कन्धों पर आ गयी थी .


क्रमशः ..............................



माता महाकाली शरणम्

Friday, 26 August 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 5






इस अचानक घटित घटना ने धनी को बड़े विस्मय में डाल दिया और भय भी हुआ अस्तु उसने तुरंत दीपक कि बत्ती बढाई जिससे प्रकाश अधिक हो और दृष्टि स्पष्ट हो जब प्रकाश की मात्रा बढ़ गयी तो धनी देखती है कि बालक नाल सहित धान सिझाने वाले चूल्हे के पास पड़ा है और बालक के सम्पूर्ण शरीर पर राख ही राख है .

जल्दी से धनी ने बालक को उठाकर जब पोछा तो देखा कि बालक का रूप अति मनभावन और डील-डौल किसी छः महीने के बालक जैसा है, धनी को फिर आश्चर्य हुआ और उसने पड़ोस कि अन्य महिलाओं को बुलाकर सारा वृत्तांत उन्हें कह सुनाया .

बालक के जन्म के उपरांत खुदीराम जी ने विज्ञ पंडितों से बालक की कुंडली बनवाई (शकाब्द १९५७ (दिनांक १७ फरवरी १८३६) फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि बुधवार को आधी घडी रात्रि शेष) में बालक का जन्म हुआ था जिसके लिए भ्रगु संहिता में उद्धृत पाया जाता है .

धर्म स्थानाधिपे तुंगे धर्मस्थे तुंगखेचरे

गुरुणा दृष्टिसंयोगे लग्नेशे धर्मसंस्थिते

केन्द्रस्थानगते सौम्ये गुरौ चैव तु कोणभे

स्थिरलग्ने यदा जन्म संप्रदायप्रभुर्हि सः

धर्मविन्माननीयस्तु पुण्यकर्मरतः सदा

देवमंदिरवासी च बहुशिष्यसमन्वितः

महापुरुषसंज्ञोअयम नारायणांशसंभवः

सर्वत्र जन्पुज्यश्च भविष्यति न शंसयः

यह सब ज्ञात होने पर खुदीराम जी को अति हर्ष हुआ और उन्हें निश्चित हुआ कि यह पुत्र निश्चय ही गदाधर कि असीम कृपा का परिणाम है अस्तु उन्होंने बालक का नाम गदाधर ही रखा .

यह सर्व विदित है एवं पुराणों में भी उद्धृत है कि जब भी इस धरा पर किसी देवांश या अवतार का आगमन हुआ है तो भरपूर दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं और उन्हें यह विदित भी होता है कि यह बालक कोई सामान्य व्यक्ति या आत्मा नहीं किन्तु छलिया माया तदुपरांत भी उन्हें छलने से नहीं चूकती और वह स्मरण-विस्मरण के सागर में गोते लगाते रहते हैं, यही हाल खुदीराम जी का और उनकी धर्मपत्नी का भी था .

जब यह सुचना खुदीराम जी के भांजे रामचाँद जो कि मेदिनीपुर में रहते थे ज्ञात हुआ तो उन्होंने मामा कि निर्धन स्थिति का ख्याल करते हुए एक अति दुधारू प्रकृति कि गाय मामा के घर भिजवा दी जिससे बालक का उचित पालन-पोषण हो सके .

इधर बालक गदाधर ज्यों-ज्यों बड़ा होता जा रहा था उसकी आकर्षण शक्ति का उत्तरोत्तर विकास हो रहा था जिससे मोहल्ले का कोई भी जीव और स्त्रियाँ का प्रिय भाजन बनता जा रहा था .

अब मोहल्ले कि प्रायः सभी स्त्रियाँ किसी ना किसी बहाने से चंद्रा देवी के पुत्र के मुख कमल को देखने हेतु किसी ना किसी बहाने से आ जाती थीं और फिर कुछ समय पश्चात् तृप्त होकर वापस जाती थीं .

समय बीतता रहा और बालक पांच माह का हुआ और अब अन्नप्राशन कि रस्म का समय हुआ धनाभाव होने की वजह से खुदीराम जी ने निर्णय लिया कि अन्नप्राशन के समय शास्त्रोक्त विधि से सम्पूर्ण कृत्य निर्वहन करके श्री रघुवीर जी के प्रसाद से संस्कार पूर्ण करके दो या चार निकटस्थ आत्मीय जनों को भोज आदि करवा देंगे किन्तु गाँव के ब्राह्मणों ने कहा कि अन्नप्राशन के दिन सभी द्विजों के भोजन का आयोजन किया जाये यह बड़े धर्मसंकट की घड़ी थी इतना धन और व्यवस्था कोई हंसी-खेल थोड़ी था, यह बात जब गाँव के जमीदार धर्मदास लाहा को पता चली तो उन्होंने सारा कार्यभार स्वयं वहन कर लिया और सभी को भोजन करवाकर समस्त कार्य सम्पन्न करवाया .

गदाधर ज्यों-ज्यों बड़ा होने लगा अपनी बाल-सुलभ लीलाओं और चंचलता से सबका प्रिय होने लगा जबकि चंद्रा देवी अब अपने पुत्र कि कल्याण कामना से और भी अधिक धार्मिक क्रियाओं और मान-मनौतियों में संलग्न रहने लगीं .

एक दिन कि घटना है जबकि गदाधर सात या आठ महीने का होगा तब प्रातः काल चंद्रा देवी पुत्र को दूध पिलाकर सुला दिया और घर-गृहस्थी की दिनचर्या में संलग्न हुयीं और थोड़ी देर उपरांत जब वापस लौट कर देखती हैं तो अचरज कि सीमा नहीं थी, जिस बिस्तर पर गदाधर को सुला गयी थीं वहां पर गदाधर की जगह कोई अन्य विशालकाय देव पुरुष लेटा हुआ है और यह देख चंद्रा देवी बहुत डर गयीं और भागी-भागी पति के पास पहुंची और उन्हें सारा वृत्तांत कह सुनाया, यह सुनकर जब खुदीराम जी पत्नी के साथ वहां पहुंचे तो देखते हैं कि गदाधर ज्यों का त्यों बिस्तर पर सोया पड़ा है .

खुदीराम जी ने पत्नी को बहुत समझाया लेकिन उनका डर शांत नहीं हुआ तब खुदीराम जी ने कहा कि तुम किसी पंडित को बुलाकर शांति कर्म करवाने की सलाह दी जिससे इस तरह की घटनाएँ ना हों .

इसके बाद शांति कर्म करवाकर भी पुत्र मंगल की कामना से चंद्रा देवी ने ज्ञात सभी देवी-देवताओं के समक्ष पुत्र मंगल की कामना से ढेरों मान मनव्वल कीं.

समय अपनी गति से चलता रहा और १८३९ में चंद्रा देवी ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम सर्व मंगला रखा गया इसके अतिरिक्त कोई अन्य उल्लेखनीय वृत्तांत इस काल में घटित नहीं हुआ .

जब गदाधर कि उम्र प्रायः ५ या ६ साल के आस-पास हो गयी तब उसकी अलौकिक बुद्धि और विषय ग्रहण क्षमता के प्रमाण परिलक्षित होने लगे बालक जो भी सुनता वह तुरंत ही कंठस्थ कर लेता था और पूछने पर यथावत कह सुनाता था साथ ही बाल सुलभ चंचलता एवं उपद्रव के गुण भी गदाधर में सामान्य बालकों की अपेक्षा कुछ अधिक ही परिलक्षित होते थे .

साथ ही खुदीराम जी ने गदाधर को अब अक्षर ज्ञान और गिनती आदि से परिचय करवाना आरम्भ कर दिया था किन्तु गदाधर को गिनती एवं पहाड़ों में रूचि ना के बराबर ही थी, खुदीराम जी यह सोचकर उसे पहाड़े रटाना बंद कर देते थे कि आगे चलकर सीख लेगा .

जब गदाधर के उपद्रव बहुत अधिक बढ़ने लगे तब खुदीराम जी ने उसे पाठशाळा में भर्ती करवाने का निर्णय लिया, गदाधर को भी यह बहुत रुचिकर लगता था क्योंकि घर से निकलकर अब उसे अनेक मित्र मिल गए थे जिनके साथ खेलने का अवसर मिल रहा था .

गदाधर जिस पाठ शाला में पढने जाता था वह धर्मदास लाहा बाबु के घर के सामने ही थी और उसका समस्त व्यय लाहा बाबु ही वहन करते थे पाठ शाला दिन में दो बार संचालित होती थी एक बार सुबह और दूसरी बार दिन के तीसरे प्रहर में .

गदाधर के उपद्रवों और शैतानियों का आनंद सभी लेते थे और उसके उपद्रवों पर खुदीराम जी उसे बहुत प्रेमपूर्वक समझाते थे किन्तु गदाधर के अन्दर इस उम्र में ही जिस तार्किकता का विकास हो रहा था और वह किसी बात की तह तक के सवाल पूछता था यह बात कई बार खुदीराम जी को परेशान करती थी क्योंकि उसके प्रश्नों के उत्तर यदि उसे संतोषजनक नहीं मिलते थे तब वह मनमाना आचरण करता था और खुदीराम जी प्रायः सोच में रहते थे कि तार्किकता वैसे तो अच्छी चीज है लेकिन सामान्य जीवन में बहुत बार बातें तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं तब भी उनका पालन समाज और देश-काल के अनुसार व्यक्ति को करना पड़ता है .

प्रायः गदाधर पाठशाला से गायब रहकर किसी भजन या नाटक आयोजन में चला जाता था किन्तु यदि उससे कारण पूछा जाता था तो वह कभी असत्य नहीं बोलता था और सारी बात यथावत बता देता था .

तार्किकता और बातों कि तह तक जाने के सन्दर्भ में एक घटना उल्लेखनीय है जिसका विवरण दिया जा रहा है:

गदाधर के घर के नजदीक ही हाल्दारपुकुर नाम का एक वृहद तालाब था जिसमें गाँव के सभी नर-नारी स्नान किया करते थे इसमें दो घाट बने हुए थे, जिसमे से एक में पुरुष नहाते थे और दुसरे में स्त्रियों के नहाने की व्यवस्था थी किन्तु छोटे बालक किसी भी घाट पर नहाने लगते थे और इसी क्रम में गदाधर अपने मित्रों के साथ एक दिन स्त्रियों के घाट पर स्नान कर रहा था और सभी एक-दुसरे पर पानी उछाल रहे थे और उनकी इन हरकतों से स्त्रियों को असुविधा महसूस हो रही थी और इसी वजह से किसी स्त्री ने क्रोध में आकर कहा “क्यों रे छोकरों तुम्हे पुरुषों के घाट पर नहाना चाहिए था, तुम लोग यहाँ स्त्रियों के घाट पर क्यों उपद्रव मचा रहे हो ?

क्या तुम्हे ज्ञात नहीं कि स्त्रियों को निर्वस्त्र नहीं देखना चाहिए” ?

इस पर गदाधर ने तपाक से पूछा “ क्यों नहीं देखना चाहिए स्त्रियों को विवस्त्र “?

अब उस स्त्री के पास इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था और अपने निरुत्तर होने कि वजह से उसका क्रोध भी और अधिक बढ़ गया इस दशा में गदाधर ने अंदाजा लगाया कि अब निश्चय ही ये स्त्रियाँ घर जाकर शिकायत करेंगी और जब अपने मित्रों को यह बताया तो वे सब डर के मारे भाग खड़े हुए किन्तु गदाधर ने कुछ और ही विचार कर तीन दिवस तक लगातार स्त्रियों के घाट पर जाता और एक पेड़ की ओट से सभी स्त्रियों को नहाते हुए देखा करता और फिर अगले दिन उसी महिला से जो प्रथम गदाधर पर क्रुद्ध हुयी थी इस प्रकार कहा :

“काकी मैंने परसों चार स्त्रियों को नहाते हुए देखा और फिर कल भी स्त्रियों को नहाते हुए देखा एवं आज पुनः कई स्त्रियों को नहाते हुए देखा किन्तु मुझे कुछ भी ना हुआ, स्त्रियों को कुछ हुआ होगा क्या”?



यह सुनकर वह स्त्री गदाधर को बांह पकड़कर चंद्रा देवी के पास ले गयी और हँसते हुए सारा वृत्तांत कह सुनाया और यह सुनकर चंद्रा देवी ने मुस्कुराते हुए अति मधुर वचनों से गदाधर को समझाया “ ऐसा करने से तुझे कुछ भी ना होगा किन्तु स्त्रियों का मत है कि यदि स्नान करते हुए उन्हें कोई पुरुष देखता है तो इसे स्त्रियों का अपमान समझा जाता है – उन सबको तो तु मेरी ही तरह अपनी माँ और काकी कहता है तब क्या उनका अपमान मेरा अपमान नहीं हुआ और मेरा गदा ऐसा काम कैसे कर सकता है जिससे अन्य स्त्रियों अथवा मेरा अपमान हो”?




क्रमशः ..............................



माता महाकाली शरणम्

Wednesday, 3 August 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 4



इस स्वप्न के पश्चात् अचानक उनकी नींद खुल गयी लेकिन बहुत देर तक मतिभ्रम सी उनकी हालत रही वे यही निश्चित नहीं कर पा रहे थे कि वे हैं कहाँ बहुत देर पश्चात् बोध होने पर उनका मन गदगद हो उठा और भोरकालीन स्वप्न को सत्य की नाईं समझ उनका रोम-रोम पुलकित हो उठा ।

इसके पश्चात् कुछ समय वहीँ गया में बिताकर वे पुनः कामारपुकुर के लिए लौट पड़े ।

एक महापुरुष के अवतार की नींव पड़ चुकी थी और समय के गर्त से चिंगारियां प्रज्ज्वलित हो चुकी थीं इतनी महान घटना घटित होने वाली थी अस्तु कुछ आभास और परिवर्तन चंद्रा देवी में भी परिलक्षित होने ही थे ।

आइये थोडा विवेचन करें और जानने की कोशिश करें कि उनके जीवन में किस प्रकार के अनुभव हुए ।

खुदीराम जब वापस आये तो उन्हें घटित घटनाओं का ब्यौरा देते हुए वे कहती हैं कि " जब तुम गया गए थे तो एक रात मुझे अद्भुत स्वप्न दिखा, जिसमे एक दिव्य पुरुष मेरी शय्या पर सुप्त दिखा मुझे - सत्य कहती हूँ ऐसा दिव्य रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा था - इतने में मेरी नींद खुल गयी - नींद खुलने के बाद देखती हूँ तो अभी भी वह शय्या पर ही सोया हुआ है -देखकर मुझे बड़ा डर लगा।

सोचा कि कोई दुष्ट व्यक्ति समय पाकर शायद घर में घुस आया होगा ऐसा विचारकर जब मैंने दीपक जलाया और प्रकाश में देखा तो कहीं कुछ नहीं जबकि अँधेरे में दप-दप करता हुआ दिख रहा था - किवाड़ भी बंद हैं - कुण्डी भी लगी हुयी थी - उसके बाद रात भर फिर मुझे नींद नहीं आयी"

"सबेरा होते ही धनी लुहारिन और धर्मदास की बेटी प्रसन्न को बुलवाकर और उन्हें रात की बात बताई और पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है ?

यह सुनकर वे दोनों हँसने लगीं और कहने लगीं कि- तुम बुढ़ापे में पागल हो गयी हो - स्वप्न की बात से कैसा डर ?
किसी और को मत बोलना वरना लोग क्या कहेंगे ?
बदनामी होगी सो अलग "।

लोक लाज के बारे में सोचकर फिर यह बात मैंने किसी और से नहीं कही ।

और फिर एक दिन धनी के साथ कुछ बात करने के लिए मैं अपने घर के सामने के शिव मंदिर के सामने खड़ी थी कि क्या देखती हूँ " महादेव की मूर्ति से एक दिव्य ज्योति निकल रही है और वह पुरे मंदिर में भर गयी इसके बाद तरंगें सी बनकर मेरी तरफ भागी चली आ रही हैं । ऐसा महसूस होते ही मैंने धनी को दिखाना ही चाहा कि वे तरंगे मुझ तक पहुँच गयीं और मेरे शरीर में प्रवेश कर गयीं । इस बात से मुझे इतना भय हुआ कि मैं वहीँ मूर्च्छा खा गयी ।
तब धनी ने पानी के छींटे मार मार मुझे होश दिलाया - फिर जब मूर्च्छा समाप्त होते ही मैंने उसे सारी बात बताई तो उसे बड़ा अचरज हुआ और उसने कहा कि तुझे वात या वायुविकार हो गया है जिस वजह से बहकी-बहकी बात कर रही है । चल आराम कर ।

पर सत्य कहती हूँ कि उस दिन से मुझे लग रहा है कि मुझमे गर्भ ठहर गया है जैसे ही वह ज्योति मुझमे समायी ।

यह शंका मैंने धनी और प्रसन्न को भी जताई तो उन्होंने बहुत बुरा-भला कहा मुझे और कहा कि तू सचमुच बीमार हो गयी है तुझे वहम के अलावा और कोई बात नहीं ।

सच कहो रामकुमार के पिता " मुझे वायुरोग हो गया है क्या "?

लेकिन मुझे तो यही लग रहा है कि जैसे मुझे गर्भ ठहर गया है ।

यह सुन खुदीराम जी को अपने स्वप्न का स्मरण हो आया जो उन्होंने गया प्रवास के दौरान देखा था तब उन्होंने कहा " नहीं चंद्रा तुम्हे भ्रम नहीं हुआ है - तुम पर सच में देवता की कृपा हुयी है - परंतु अब आगे से यदि तुम्हे कुछ ऐसा दिखे या आभास हो तो मेरे अतिरिक्त किसी से भी मत कहना "।

यह सब सुन चंद्रा देवी बहुत पुलकित हुयीं और उन्हें विश्वास हुआ कि उन्हें वायु रोग नहीं हुआ है । लगभग तीन या चार मास बाद निश्चित हो गया कि पैंतालीस वर्ष की अवस्था में वे सचमुच गर्भवती हुयी हैं ।

इस बारे में जानकारों का कथन था कि उस समय काल में चंद्रा देवी का रूप दिव्य आभा लिए हुए दिखता था और ऐसा लगता था कि प्रकाश रश्मियाँ सी फूटी पड़ती हैं उनकी देह से - कुछ लोग तो यहाँ तक कहती थीं कि " बुढ़ापे में गर्भ धारण होने पर शरीर में इतना तेज आना दुर्भाग्य की निशानी है और निश्चित ही प्रसव काल में यह मृत्यु का ग्रास बनेगी"

गर्भावस्था के काल में उन्हें अब नित नए आभास और दिव्य दर्शन होने लगे थे - देवी देवताओं में और भी उनकी प्रीत बढ़ने लगी थी उन्हें सभी देवता पुत्रवत् प्रतीत होते थे ।

इसके बारे में वे प्रायः खुदीराम जी से चर्चा करतीं कभी भय का प्रदर्शन भी करतीं और खुदीराम जी उन्हें नाना प्रकार के समझाते और सांत्वना देते रहते थे ।

एक दिन उन्होंने बताया कि उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कि " कोई देवता हंस पर बैठकर आ रहा था - उसे देखकर मुझे थोडा भय प्रतीत हुआ किंतु धुप थी और उसकी वजह से उसका पूरा चेहरा लाल हुआ पड़ा था इसलिए मुझे दया भी आई और मैं उसे पुकारकर बुलाने लगी कि वो हंस वाले देवता - देख तो धुप की गर्मी से तेरा पूरा चेहरा लाल हो गया है । आ जा - घर में कुछ भीगा हुआ चावल है - अगर खाना हो तो ला दूँ उसे खाकर थोडा सुस्ता ले फिर चले जाना ।

यह सुनकर वह हंसने लगा और हवा में ही अचानक लुप्त हो गया ।

ऐसे एक या दो नहीं हर रोज ही अलग अलग देखती हूँ - भला किन किन का वर्णन करूँ क्योंकि मैं तो उनके नाम भी नहीं जानती और पहले कभी देखा भी नहीं है ।"
इस प्रकार लीलाओं के चलते और दिव्य अनुभूतियों के साथ वह घडी आ ही पहुंची जब एक दिव्य महापुरुष का जन्म हुआ और एक नया युग आरम्भ हुआ जो कि भक्ति और समर्पण के मामले में अद्वितीय है आज तक ।

तत्कालीन निर्मित जन्म कुंडली के आधार पर शकाब्द 1757 (17 फरवरी 1836) फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि दिन बुधवार को आधी घडी रात) -पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रथम चरण (कुम्भ लग्न के प्रथम नवमांश सूर्योदय से इष्टकाल 51 घटिका 28 पल ) में इस महापुरुष का जन्म हुआ ।


जन्मोपरांत की एक अन्य कथा का विवरण कहीं-कहीं प्राप्त होता है जो अग्र प्रकार है :


चंद्रा देवी को प्रसव पीड़ा हो रही थी और धनी लुहारिन उनके साथ थी - बच्चे के जन्म के उपरांत जैसे ही बच्चे की नाल काटने की तैयारी की तो यह देखकर हतप्रभ रह गयीं कि जिस स्थान पर बच्चे को रखा हुआ था वहां बच्चा है ही नहीं !





क्रमशः ..............................





माता महाकाली शरणम्

Monday, 23 May 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 3



खुदीराम जी का अपने भांजे रामचाँद से बहुत लगाव था यदि उन्हें किसी वजह से हाल समाचार ना मिले तो वे तुरंत उसकी खैर-खबर लेने मेदिनीपुर चले जाते थे। 

इसी प्रकार एक बार बहुत दिनों तक कोई हाल-खबर ना मिलने पर वे मेदिनीपुर जाने को तत्पर हुए किन्तु रास्ते में एक जगह हरे-भरे बेल पत्रों के पेड़ देखे जिनमे नए पत्ते निकले - फाल्गुन के महीने में पत्तों के झड़ जाने की वजह से बेल पत्र मिलने मुश्किल से हो जाते थे -अस्तु वे पास के गांव से एक टोकरी और अंगौछा खरीद कर पूरी टोकरी भर कर बेल पत्र तोड़कर घर आ गए - घर आकर स्नानादि कर आनंद और भक्ति भाव से पूजन आदि कर जब भोजन के लिए बैठे तब अवसर पाकर चंद्रा देवी ने पूछा "आप तो मेदिनीपुर जाने को कह कर गए थे - फिर वहां नहीं गए "?

तब भी आश्चर्य हुआ कि - देव पूजा का साधन देख वे मेदिनीपुर जाने की बात भूल ही गए।

अगले दिन वे पुनः मेदिनीपुर के लिए रवाना हुए।

देरे गांव छोड़े हुए उन्हें लगभग छः बरस हो चुके थे और अब तक पुत्र की उम्र १५ बरस और पुत्री कात्यायनी १० बरस की हो चुकी थीं और तब के सामाजिक पर्यावरण और मान्यताओं के हिसाब से यह उम्र विवाह योग्य हो गयी थी।

तब आनुङ गांव के केनाराम बंदोपाध्याय से कात्यायनी का विवाह किया और केनाराम जी की बहन से रामकुमार का विवाह सम्पन्न किया।

विवाह के समय रामकुमार व्याकरण और साहित्यशास्त्र का अध्ययन कार्य कर रहे थे। आगामी तीन या चार वर्षोपरांत रामकुमार का अध्ययन कार्य पूरा हुआ और अब वे भी द्रव्योपार्जन करने में समर्थ हुए।

परिवार की आर्थिक स्थिति अब बहुत बेहतर हो चली थी अस्तु खुदीराम जी अपना अधिकाधिक समय ईश आराधना में व्यतीत करने लगे।

खुदीराम जी की इच्छा हुयी कि अब तीर्थ यात्रा की जाए - ऐसा सोचकर वे रामेश्वरम की यात्रा पर चले गए - वहां से बाणलिंग लेकर आये और अपने पूजा स्थल में स्थापित किया।

लगभग डेढ़ या दो बरस के उपरांत उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी जिसके बारे में उनका मानना था कि रामेश्वरम की कृपा से पुत्र उत्पन्न हुआ है इसीलिए उन्होंने उस पुत्र का नाम रामेश्वर रखा।

सात या आठ वर्ष बीत गए अब हालात बहुत बेहतर थे - कहते हैं रामकुमार की जिह्वा पर माँ सरस्वती निवास करती थीं - वे जिसके बारे में जो भी कह देते थे वह हो जाता था - एक बार की बात है :

एक परिवार कहीं से गंगा स्नान करने हेतु पधारा था और रामकुमार भी उसी समय स्नान करने के लिए आये हुए थे - उस स्त्री पर दृष्टि पड़ते ही वे जान गए कि यह कल मर जाएगी और यह बात जब उन्होंने उस औरत के पति को बता दी - तो सब इस बात के लिए उनका परिहास करने लगे - क्योंकि स्त्री पूर्णतया स्वस्थ थी - उसे कोई बीमारी तक ना थी - उस दिन बात आई-गयी हो गयी लेकिन अगले दिन वह स्त्री सचमुच में मर गयी।

तब से सभी लोगों को भरोसा हो गया कि रामकुमार जी की जिव्हा पर सरस्वती वास करती हैं और उनका कहा हुआ कभी झूठ नहीं हो सकता - उन्हें यह भी ज्ञात था कि प्रसव काल में उनकी पत्नी का देहांत हो जायेगा और वैसा ही हुआ।

इसके बाद १८३५ के आस-पास खुदीराम जी को पुनः तीर्थयात्रा की इच्छा हुयी अब उनकी उम्र भी लगभग ६० बरस की हो चुकी थी।
फिर भी उन्होंने इस बार पैदल ही गया तीर्थ जाने का निश्चय किया और गया यात्रा की ।

कुछ जगह (श्री नरहर रामचन्द्र परांजपे कृत "श्रीरामकृष्णलीलामृत") में उद्धृत है कि " ह्रदय का कथन है कि खुदीराम जी अपनी पुत्री कात्यायनी की अस्वस्थता का समाचार सुन जब वहां पहुंचे तो देखते हैं कि कात्यायनी अवसादियों की तरह हाथ-पैर पटकती हैं और उल्टा-सीधा बकती है - यह देख वे समझ जाते हैं कि यह प्रेतग्रस्त हो गयी है - और ऐसे में वे अपने इष्ट का ध्यान कर कहते हैं "तू भूत हो या फिर कोई और - मेरी पुत्री को छोड़ के चला जा " तब उस आत्मा ने कहा "तुम यदि गया जाकर पिंडदान करो तो मुझे मुक्ति मिल जायगी" और इस प्रकार खुदीराम जी गया की यात्रा के लिए चले जाते हैं"

गया यात्रा के दौरान जब वे गया पहुंचे और उन्होंने पिंडदान किया तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे कि सभी पितृ खूब प्रसन्न हैं और उनके द्वारा दिए गए पिंडों को ग्रहण कर रहे हैं ।

रात्रि में जब वे सोये तो उन्हें ऐसा आभास हुआ कि जैसे वे किसी मंदिर में हों और उनके सभी पितृ पूर्वज इत्यादि चारों तरफ उपस्थित हैं एक दिव्य सिंहासन के चारों ओर खूब दिव्य लोग उपस्थित हैं । इसके पश्चात् एक दिव्य प्रकाश से सम्पूर्ण जगह दैदीप्यमान हो गयी एवम् सिंहासन पर विराजमान दिव्य पुरुष की सभी जन स्तुति कर रहे हैं ।

तभी उन्हें प्रतीत हुआ कि उस दिव्य पुरुष ने जिसके अधरों पर सुन्दर मनमोहक सी मुस्कान खेल रही है हँसते हँसते खुदीराम जी को अपने पास बुला रहे हैं । खुदीराम इस आमंत्रण पर मंत्रमुग्ध यंत्रचालित से उस दिव्य पुरुष के सम्मुख पहुँच जाते हैं एवं भाव विभोर हो दंडवत हो नाना विधि स्तुति करने लगते हैं तभी उन्हें उस दिव्य पुरुष की गंभीर आकाश वाणी सी आवाज सुनाई देती है "खुदीराम तुम्हारी भक्ति से मैं बहुत संतुष्ट हूँ - मैं तेरे घर में पुत्र रूप में अवतार लेकर तुम्हारी सेवा ग्रहण करूँगा - तुम यहाँ से जाकर मेरे अवतार लेने की प्रतीक्षा करना"!

क्रमशः ..............................


माता महाकाली शरणम् 

Wednesday, 18 May 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 2


खुदीराम जी इष्ट श्रीराम जी के साथ ही साथ माता शीतला की भी आराधना बड़े मनोयोग से करते थे - और प्रायः उन्हें महसूस होता था कि जब वे सुबह डलिया लेकर फूल चुनने जाते हैं तब शीतला माँ किसी बच्ची की तरह उनके साथ झूमते हुए जाती है और फूलों की क्याँरियों के बीच भी किलोल करती है।


१८१४ के आस पास वहां के जमीदार रामानंद राय जो कि बहुत ही घमंडी और लालची प्रकृति का व्यक्ति था। उसी गांव के किसी व्यक्ति पर झूठी नालिश कर दी - उसे भी पता था कि सब जानते हैं यह मुकदमा झूठा है किन्तु यदि कोई ऐसा व्यक्ति गवाही दे दे जिसकी बात पर किसी को शंशय ना हो तो यह मुकदमा जीता जा सकता है। इस काम के लिए उसे खुदीराम जी से उपयुक्त और कोई व्यक्ति नजर नहीं आया - उसने खुदीराम जी को अपने पक्ष में गवाही देने के लिए कहा -!


खुदीराम जी को भला ये कैसे गवारा होता कि उनके झूठी गवाही देने के कारण किसी को बेघर होना पड़ जाये अतः उन्होंने गवाही देने से मना कर दिया।


इस बात ने जमीदार को इतना रुष्ट कर दिया कि उसने खुदीराम जी पर ही नालिश (मुकदमा) कर दिया और उसने वह मुकदमा जीत भी लिया - देखते ही देखते पूरा परिवार रास्ते पर आ गया - घर और जमीने सब कुर्क हो गयीं और उन पर उस लालची जमीदार का आधिपत्य हो गया इस घटना के समय खुदीराम जी की अवस्था ४० वर्ष हो चुकी थी।


हालाँकि इस घटना के विरोध में मानसिक रूप से तो पूरा गांव ही खुदीराम जी के पक्ष में था किन्तु खुले रूप से जमीदार का विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी और इस भौतिक जगत में भौतिक समर्थन के बिना जीवन यापन असंभव है।


अब खुदीराम जी के पास गांव छोड़कर चले जाने के अतिरिक्त और कोई उपाय ना था और इस घटना की चर्चा आस-पास के क्षेत्र में थी दबी जुबान से सभी जमीदार को कोस रहे थे।


उसी समय खुदीराम जी के मित्र सुखलाल गोस्वामी (जो कि कामारपुकुर में रहते थे) ने खुदीराम जी को अपने यहाँ रहने को आमंत्रित किया - हालाँकि सामान्य दशा होती तो शायद खुदीराम जी इस प्रस्ताव को कभी स्वीकार ना करते किन्तु बेघर होने की दशा में परिवार के लिए एक छत की आवश्यकता तो थी ही कम से कम। इसी वजह से साभार उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और अपने इष्ट एवं माता शीतला सहित देरे गांव को छोड़कर कामारपुकुर गांव में रहने लगे - सुखलाल जी बहुत मानते थे खुदीराम जी को उन्हें भी बहुत ख़ुशी हुयी कि उनका मित्र उनके पास ही रहेगा - जीवन यापन हेतु डेढ़ बीघे जमीन भी उन्होंने खुदीराम जी के नाम लिख दी।


किसी प्रकार से जीवन आगे बढ़ने लगा कभी खाकर तो कभी भूखे रहकर लेकिन फिर भी उफ़ नहीं की सब कुछ श्रीराम जी की कृपा मानकर स्वीकार कर लिया।


पहले शुरुवात में बहुधा चंद्रमणि जी यदि खुदीराम जी से कहतीं कि घर में खाने को कुछ नहीं है इत्यादि तो खुदीराम जी बोल देते "यदि श्रीराम जी की यही इच्छा है कि वे आज उपवास पर रहें तो भला उन्हें क्या समस्या ? वे भी इष्ट के साथ उपवास कर लेंगे"


धीरे-धीरे चंद्रमणि जी भी अभ्यस्त होती गयीं और सब कुछ श्रीराम जी के ऊपर ही छोड़ दिया कि वे जैसा चाहेंगे वही उचित होगा।


इसी क्रम में एक बार वे कहीं पास के गांव में गए थे वापस आते समय एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने लगे और उनकी आँख लग गयी तो क्या देखते हैं कि उनके इष्ट - उनके स्वामी भगवान राम बालवेश में उनके समक्ष खड़े हुए उन्हें निहार रहे हैं और ऊँगली से इशारा करते हुए कहते हैं " बाबा मैं इस जगह कब से अकेला पड़ा हूँ - भूखा और प्यासा - मुझे ले चलो अपने घर - आपकी सेवा ग्रहण करने की और आपके हाथों भोग ग्रहण करने की बड़ी इच्छा है मेरी "


भगवान की ऐसी लीला देखकर झटके से उनकी आँख खुल गयी - नेत्रों से अश्रुप्रवाह होने लगा - हृदय में राम ही राम का सुमिरण चल पड़ा।


मन ही मन इस स्वप्न के बारे में विचार करने लगे कि कैसा अद्भुत स्वप्न था - तभी उनकी नजर सामने गयी तो उसी प्रकार का स्थल सामने था जैसा श्री राम जी ने बालरूप में स्वप्न में इंगित किया था - झट से उठ खड़े हुए और पास जाकर देखा तो एक सुन्दर और मनमोहक शालिग्राम शिला पड़ी हुयी है और उस शिला के नजदीक ही एक भुजंग फन उठाये विराजमान है।


जैसे ही खुदीराम जी की आँखें उस भुजंग से मिलीं वह भुजंग स्वतः ही आगे बढ़ लोप हो गया - खुदीराम जी ने झट वह शिला उठाई - भाव आ गया और भावावेश में ही अश्रुजल से अभिषेक होने लगा - खुदीराम जी समझ गए यह रघुवीर शिला है। उस शिला को लेकर वे घर आ गए और विधिवत उसकी स्थापना कर सदा ही उसकी पूजा करने लगे।


शनैः शनैः दुर्दिन समाप्त होने लगे और अब जो खेत उन्हें सुखलाल जी के द्वारा प्रदान किये गए थे उनमे इतना धान्य उत्पन्न होने लगा था कि भोजन की समस्या समाप्त होने लगी थी।


अब इस समस्त रचना में कहीं-कहीं उल्लिखित पात्रों एवं अन्य परिवारीजनों का एक संक्षिप्त सा विवरण लेते हैं।


जैसे कि पूर्व में ही चर्चा कर चुके हैं कि खुदीराम जी की एक बहन भी थीं जिनका ना रामशीला था - उनका विवाह छिलिमपुर के भागवत बंदोपाध्याय जी के साथ हुआ था उनके एक पुत्र जिसका नाम रामचाँद तथा एक पुत्री थी जिसका नाम हेमांगनी था।


रामचाँद मेदिनीपुर में वकालत के पेशे में थे और उनका अत्यधिक प्रेम अपने मामाओं के साथ था तथा उनकी अच्छी कमाई थी। दुर्दिनों के समय में वे खुदीराम जी को 15 रुपये प्रतिमास तथा निधि और कनाई राम को दस-दस रुपये प्रतिमास देने लगे थे।


हेमांगिनी का विवाह शिहड़ गांव के निवासी श्रीकृष्ण चंद्र मुखर्जी के साथ हुआ था तथा इन्हे चार पुत्रों की प्राप्ति हुयी थी
  1. राघव 
  2. रामरतन 
  3. हृदयराम 
  4. राजाराम 

जिनमे से हृदयराम का उल्लेख बारम्बार होगा - ठाकुर के प्रारंभिक दिनों से लेकर लम्बे समय तक ह्रदय उनके साथ रहा। 

खुदीराम जी के भाई निधिराम के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है किन्तु कनाई राम दो पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुयी थी जिनके नाम क्रमशः :

  1. हलधारी (रामतारक)
  2. कालिदास 
थे।

क्रमशः....................

माता महाकाली शरणम् 
 

Wednesday, 3 February 2016

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा ( An Introduction of Swami Ramkrishna Paramhans and his life events epic)

स्वामी रामकृष्ण परमहंस परिचय एवं जीवन वृत्त महागाथा - 1




सभी गुरुजनों एवं प्रथम पूज्य गणपति जी को प्रणाम करते हुए अपने इस महालेख को अपनी जननी एवं सर्वस्व माता महाकाली के चरणों में भेंट करता हूँ और आशा करता हूँ कि उसकी प्रेरणा एवं शक्ति से अपनी इस लेखनी को पूरा कर पाउँगा ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार की लेखन छवि अपने मानस में बना रखी है - आगे माँ जैसा चाहेगी वैसा ही होगा।

यह भारत-भूमि तरह-तरह के रहस्यों और अवतारों से भरी पड़ी है जिसमे कभी राम आये तो कभी कृष्ण आये - यह भारत भूमि भक्त और भगवान की क्रीड़ा स्थली रही है हमेशा से ही -!

इसी धरती में भक्त शिरोमणि श्री रामकृष्ण परमहंस का भी जन्म और उस जन्म की घटना ने बंगाल को सदा-सर्वदा के इस धरती का सिरमौर बना दिया - आज तक अगर किसी भी हृदय में भक्ति भावना है और उसके समक्ष ठाकुर की चर्चा आरम्भ हो तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि इष्ट के प्रेम में सर्वस्व न्योछावर करने की चाह ना जाग उठे - आँखे ना भर आएं - रोंगटे ना खड़े हो जाएँ -!

मैंने तो अपने अब तक के जीवन काल में नहीं देखा इसके अतिरिक्त जिसके सामने भी मैंने कथा कही ठाकुर की - जहाँ भी सन्दर्भ दिया ठाकुर वहीँ भक्ति के ज्वालामुखी फूटे -!

बहुत दिनों से इस प्रकार के किसी लेख के बारे में सोच रहा था जो भक्ति जगत में लहरा उठे - हालांकि विषय नया नहीं है मुझसे पहले भी बहुत से लोग और लेखक इस विषय पर अति महत्वपूर्ण लेख और पुस्तकें लिख चुके हैं जिनके सामने इस लेख का कोई अस्तित्व ना हो शायद किन्तु यह उद्देश्य अस्तित्व का है भी नहीं - यह तो बस उद्दीपन लेख है जो आग जला दे बस - एक नशा सवार करवा दे - जिसके बिना फिर कहीं चैन ना मिले -!

ठाकुर के विषय पर बहुत सी पुस्तकें उपलब्ध हैं - जिनमे तरह-तरह से उनसे सम्बंधित तथ्य और जानकारियां उपलब्ध हैं लेकिन हमारे मित्रों और आज के समाज की निर्भरता अंतर्जाल पर इतनी बढ़ गयी है कि पुस्तक आदि पढ़ने का समय ही निकल नहीं पाता - ऐसे में बहुत से मित्र सारी चीजें इंटरनेट पर ढूंढने का प्रयास करते हैं - लेकिन कुछ चीजें ऐसी हैं जो आज भी इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि कहीं कॉपी राइट का मामला है तो कहीं मेहनत करने का जिसकी वजह से लोग लिख नहीं पाते -!

इसी वजह से इस प्रकार के लेखों की सुलभता भी नहीं हो सकी क्योंकि जब कहीं नहीं तो बेचारे कॉपी कैट भी असहाय हो गए -!

बहरहाल जो भी एक प्रयास मैं करना चाहता हूँ आप सबके बीच हो सकता है यह सार्थक रहे या फिर निरर्थक भी लेकिन इससे क्या ? मेरा धर्म है लिखना और धर्म का प्रचार-प्रसार करना और आप लोगों का धर्म उससे अपनी सारवस्तु ग्रहण करना -!

हम सब अपना धर्म पालेंगे -!

चूँकि ऊपर की चंद लाइन पढ़कर ही समझ में आ जाता है कि यह लेख स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी पर आधारित है जिन्हे मैं अपना मानसिक गुरु भी मानता हूँ। अस्तु इसमें मैं उनसे सम्बंधित कुछ प्राथमिक सूचनाएं दूंगा जो विभिन्न श्रोतों द्वारा (श्रवण-पठन-भ्रमण) आदि के द्वारा मुझे ज्ञात हुईं हैं। इस लेख को लिखने का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति पर कोई दबाव बनाना या किसी प्रकार के सिद्धांत का प्रतिपादन अथवा इष्ट निर्धारण आदि बिलकुल भी नहीं है।

इसका एकमात्र उद्देश्य है कि किस प्रकार से समर्पण एवं भक्ति पूर्वक तथा विश्वास से उन ऊंचाइयों को भी प्राप्त किया जा सकता है जिनके बारे में सोचकर भी लोगों डर लगता है - एक बहुत ही अनुभूत तथ्य कह रहा हूँ जो अब तक के अपने जीवन में अनुभव किया है मैंने :

"वे सभी लोग जो स्वयं को नास्तिक कहते हैं वे वास्तव में नास्तिक नहीं होते बल्कि वे अकर्मण्य होते हैं प्रयास करना उनके वश का नहीं होता"

बहरहाल अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं और उपलब्ध जानकारियों के एकत्रीकरण द्वारा ठाकुर के विषय में प्राथमिक जानकारियों का प्रस्तुतीकरण करते हैं :

परिवार एवं आर्थिक स्थिति :

बंगाल के हुगली जिले के देरे गांव में एक बहुत ही कुलीन-मध्यमवर्गीय कर्मकांडी परिवार निवास करता था जिसके मुखिया का नाम माणिक राम चट्टोपाध्याय था - सारे आस पास के क्षेत्र में बहुत सम्मान था इस परिवार का इनके कुल में परंपरागत रूप से श्रीरामचन्द्र जी की ही पूजा अर्चना होती थी अर्थात कुलिष्ट श्री रामचन्द्र जी थे।

माणिक राम को तीन पुत्र रत्न एवं एक कन्या की प्राप्ति हुयी जिनके नाम क्रमशः :
  1. खुदीराम बोस
  2. रामशीला
  3. निधिराम
  4. कनाई राम
जैसा कि तत्कालीन समाज में बाल विवाह का प्रचलन था अस्तु उसी क्रम में खुदीराम जी का भी विवाह संपन्न हुआ किन्तु प्रथम पत्नी का स्वर्गवास हुआ तो उनका द्वितीय विवाह साराटी मायापुर की चंद्रमणि जी से हुआ उनके दूसरे विवाह से पूर्व ही उनके पिता का स्वर्गवास हो चुका था अस्तु सम्प्पूर्ण परिवार के भरण-पोषण का दायित्व अब खुदीराम जी का ही था - !

पूरा परिवार पूर्ण कर्म-कांडी और तत्कालीन समाज के हिसाब से कट्टरवादी विचारों का था। इसी वजह से आस पास के गावों तक में उनका बहुत सम्मान था -!

उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जिस समय खुदीराम जी का दूसरा विवाह संपन्न हुआ उस समय खुदीराम जी की उम्र २४ एवं चंद्रमणि देवी की उम्र 8 बरस की थी।

विवाह के ५ या ६ वर्षोपरांत १८०५ में बड़े पुत्र श्री रामकुमार जी का जन्म हुआ उसके ५ वर्ष उपरांत १८१० में पुत्री कात्यायनी का जन्म हुआ एवं लगभग १६ वर्ष उपरांत १८२६ में रामेश्वर का जन्म हुआ।

माता महाकाली शरणम्


क्रमशः ................

Friday, 30 October 2015

Bama Khepa - Vama Kshepa - बामा खेपा - वामा क्षेपा ( बीरभूमि का संत ) Saint of Beerbhumi Bengal - Part 2

बामा खेपा या बामाचरण चट्टोपाध्याय भाग - २




बामा खेपा या बामाचरण चट्टोपाध्याय

नाम :- बामाचरण चट्टोपाध्याय

उपरोक्त नाम रखने का कारण :- चूँकि माँ तारा का एक नाम बामा भी है और माँ तारा के मंदिर में इनकी माता के धरना देने के बाद ही इनका जन्म हुआ था।
दूसरा कारण यह भी है कि कि शिवरात्रि की रात में चारों पहरों के नाम शिव जी अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं यथा :
  1. गंगानाथ
  2. अधराय
  3. बामदेव
  4. सद्योजात

प्रसिद्द नाम :- माँ तारा के पुत्र रूप में ख्याति प्राप्त
बामा खेपा / क्षेपा।
जन्म :- 5 मार्च 1837,
जन्म दिवस :- शिव रात्रि या शिव चतुर्दशी,
जन्म स्थल :- भारत के पश्चिम बंगाल में बीरभूम जिले की रामपुरहाट उप-डिवीजन के आटला गांव
स्थानीय जन्म कैलेंडर :- बंगला सन १२८८, १२ फाल्गुन, शिव रात्रि की रात्रि का तृतीय प्रहर
पिता का नाम :- सर्वानंद चट्टोपाध्याय
इष्ट :- माँ तारा
इष्ट सम्बोधन :- बड़ी माँ
गुरु :- योगी कैलाशपति
साधना स्थल :- तारापीठ महाश्मशान
पिता का व्यवसाय :- स्थानीय संगीत विधा (श्यामा संगीत गायक )
आर्थिक स्थिति :- दयनीय
जन्मदात्री माता :- भुवनेश्वरी देवी

भाई - बहन :-

जय काली
  1. बामाचरण
  2. दुर्गा
  3. द्रवमयी
  4. सुंदरी
  5. रामचरण
मृत्यु या महा समाधि :- 22 जून 1911,
महा समाधि दिवस :-आषाढ़ कृष्ण अष्टमी,
महा समाधि स्थल :- तारापीठ महा-शमशान में विद्यमान पञ्च मुंडी आसन
स्थानीय कैलेंडर :- बंगला सन १३१८, २ श्रवण

वहीँ रहने वाले साधकों के (मोक्षानंद बाबा, गोसाईं बाबा) पैर दबाते दबाते बामा को नींद आ गयी !

उसी बीच शमशान में एक बैरागी साधक गांजा पी रहे थे और गांजा पीकर अनजाने में उन्होंने उसकी राख को वहीँ एक जगह फेंक दिया। 

लेकिन उस राख में आग बाकी थी जिससे सुलगते - सुलगते वह आग तेज हुयी और हवा के झोंके से वह आग एक झोपडी में लग गई और देखते देखते सारे गाँव को झुलसा गयी।

गाँव वालों को यह लगा कि यह बामा की गलती है - और गाँव वाले उन्हें खोजने लगे।

उनके डर से बामा भक्त प्रहलाद की कहानी याद करते हुए खुद ही आग में कूद गए - कि गांव वालों की मार खाने से बढ़िया है की इसी आग में कूदकर अपने प्राण दे दिए जाएँ - साथ ही चिल्लाते भी रहे की मैंने आग नही लगायी है।

धीरे धीरे पूरा गाँव आग में झुलस गया लेकिन बामा आग से सकुशल निकल आए - और दौड़ते हुए अपनी माँ के पास अपने गाँव पहुँच गए -!

आर्थिक स्थिति पहले से ही ख़राब थी ना खाने का भरोसा ना जीवन का ऐसे में बामा की माँ ने उन्हें बहुत खरी खोटी सुनायी और इस बात ने बामा के हृदय को इतना आघात पहुँचाया की बामा ने घर छोड़ दिया।

उसके बाद फिर कभी लौटकर घर नहीं गए और तारापीठ के महाश्मशान में शरण ली -!

इस समय से ही बामा की वास्तविक साधनात्मक जीवन की शुरुवात होती है।

प्रतिदिन बामा जीवन कुण्ड में स्नान करते संतों के लिए गांजा इकठ्ठा करते और माता की साधना करते थे - उन्ही दिनों सेमल वृक्ष के नीचे बाबा कैलाशपति का आगमन निर्धारित हुआ।

जिसका कि बामा को बहुत बेसब्री से इन्तजार था - क्योंकि बाबा के कुछ कार्य उन्हें बहुत अच्छे लगते थे जैसे की खड़ाऊं पहनकर बिना पानी में डूबे नदी पार कर जाना और मुरझाये हुए तुलसी वृक्ष को हरा-भरा बना देना इत्यादि -!

एक बार रात्रि काल में बाबा ने बामा को गांजा तैयार करने के लिए बुलाया उस रात बामा जी को बहुत अजीब-अजीब से अनुभव हुए और बहुत डर लगा।

अनगिनत दैत्याकार आकृतियां बामा के आस-पास विचरने लगीं और यह सब बामा से बर्दाश्त नहीं हो पाया और वह बेहोश हो गए -!

जब पुनः उन्हें होश आया तब वे आकृतियां " जय गुरु जय तारा " कहकर अंतर्ध्यान हुयीं - और तब कहीं जाकर बामा ने गुरु को गांजा दिया -!

काली पूजा की रात में वामा का अभिषेक कैलाशपति बाबा द्वारा किया गया - सिद्ध मंत्र पा कर वामा खेपा बिल्कुल ही अलग-थलग हो गए।

वह हमेशा शीमल वृक्ष के नीचे बैठ कर जाप किया करते।

उनके आस-पास हमेशा अजीब अजीब आवाजें बिन बादल गर्जन होना - मरे बच्चो की कूदफांद - कान के पास गरम साँस का महसूस होना जैसी घटनाये होती रहती थीं जो बामा को और चंचल कर देती थी।

शिव चतुर्दशी के दिन गुरुदेव का आदेश पा कर बामा फ़िर अपने आसन पर बैठे और सिद्ध बीज मंत्र का जाप शुरू किया - सुबह से शाम हो गई पर बामा तब भी तन्मय हो कर देवी माँ तारा के ध्यान में लगे रहे।

रात बढ़ने लगी और घोर अन्धकार हो गया - वातावरण पूरा शांत था - रात में २ बजे के बाद वामा का शरीर कापने लगा और पूरा शमशान फूलो की महक से सुगन्धित हो उठा।

अचानक आकाश से नीले प्रकाश की ज्योति फुट पड़ी - चारो तरफ़ प्रकाश ही प्रकाश हो गया और प्रकाश के बीचों बीच तारा माँ ने बामा खेपा को दर्शन दिए -!

उस भव्य और सुंदर विग्रह को देख कर आनंद में बामा सब कुछ भूल गए।

इतनी कम उम्र में बामा को माँ का दर्शन होना सिर्फ़ भक्ति और विश्वास के कारण था - सबने शमशान में प्रकाश देखा पर माँ के दर्शन तो सिर्फ़ बामा खेपा को ही हुए।

तब से बामा देव जगत में पूज्य हो गए - तारापीठ के महंत मोक्षानंद पहले से ही बामा की महानता को जानते थे इसलिए ही उन्होंने बामा को अपना शिष्य बनाया था।

मोक्षानंद के मरने के बाद १८ वर्ष की उम्र में ही वामा चरण को तारापीठ का पीठाधीश बना दिया गया -!

कुछ अन्य घटनाएँ जो रोचक होने के साथ ही साथ साधकों एवं भक्तों के लिए प्रेरणाप्रद भी हैं उनका उल्लेख इस कथा श्रंखला के तीसरे भाग में :
 माता महाकाली शरणम्