Showing posts with label Tone Totke Aur Deshi Nuskhe - टोने टोटके और देशी नुस्खे. Show all posts
Showing posts with label Tone Totke Aur Deshi Nuskhe - टोने टोटके और देशी नुस्खे. Show all posts

Wednesday, 26 March 2014

मंत्र - यन्त्र और तंत्र - Mantra - Yantra aur Tantra

मंत्र - यन्त्र और तंत्र एक विवेचन 





भारतीय संस्कृति या कहें कि आर्य सभ्यता मन्त्र - यन्त्र और तंत्र का सबसे समृद्ध भंडार है - हमारी संस्कृति में यदि देखा जाए तो प्रारम्भ काल से ही अनजान को जानने के प्रति जिज्ञासा का भाव रहा है - यदि बहुत ध्यान से विश्लेषण किया जाये तो हम पाते हैं कि यह समृद्ध भंडार मुख्यतः संस्कृत भाषा में ही उपलब्ध है - सर्वप्रथम मन्त्रों कि उत्पत्ति हुयी !


वस्तुतः मन्त्रों को यदि गहन दृष्टि से देखा जाये तो वास्तव में ये एक निश्चित आवृत्ति कि विशेष प्रार्थना होते हैं जिनमे मुख्यतः प्रणव - बीज मंत्र - इच्छा / आग्रह - प्रणव - समर्पण इत्यादि सम्मिलित होते हैं -!


कई बार मन्त्रों में प्रणव और बीज मन्त्रों का आभाव पाया जाता है ऐसे मंत्र सिर्फ तात्कालिक प्रभावयुक्त होते हैं इन मन्त्रों कि ऊर्जा सार्वभौमिक और सर्वकालिक नहीं होती है -!


चूँकि किसी भी विधा के निर्माण में समय - देश और भाषा का पूर्ण प्रभाव होता है ऐसे दशा में चूँकि मन्त्रों का निर्माण वैदिक काल में हुआ और वैदिक काल आर्य संस्कृति से सम्बद्ध है एवं आर्यों कि मुख्य भाषा संस्कृत थी इसलिए सभी मन्त्रों कि भाषा संस्कृत ही है -!


इसके बाद लोक भाषाओँ में भी मन्त्रों का निर्माण हुआ क्योंकि संस्कृत थोड़ी क्लिष्ट भाषा कि श्रेणी मे आती है और इसके अलावा स्थानीय - या लोक संस्कृतियों में बहुधा शिक्षा का स्तर कम होने के कारण उनके लिए संस्कृत मन्त्रों का पठन - पाठन एवं उच्चारण असम्भवप्राय था -!


जैसा कि मैं पहले ही ऊपर कह चूका हूँ कि " मन्त्रों का मुख्य विषय या उद्देश्य अपनी इच्छा या प्रार्थना को एक विशेष लयबद्ध तरीके से अपने इष्ट के सामने रखने की प्रणाली है "


यदि सामान्य अपवादों को छोड़ दिया जाये तो इंसान आदिकाल से ही अनजान शक्तियों के प्रति संशकित रहा है एवं यही कारन रहा है कि वह उनको प्रसन्न करने या रखने के लिए विविध प्रणालियों का प्रणेता भी रहा है -! इसी क्रम में यदि देखा जाये तो हर प्रकार के मन्त्रों का आविर्भाव हुआ और वे प्रचलन में आते गए -!


चूँकि वैदिक काल में साधनाओं और पठन - पाठन का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व सिर्फ ब्राह्मण समाज का ही रहा है एवं अन्य सभी समुदायों को उनके लिए बनाये गए स्तरों में बाँध दिया गया - समय गुजरता रहा समाज के लिए जो स्तर कार्य या कार्य विषेशज्ञता के आधार पर बनाया गया था उसका आधार जातिगत होता गया - एवं कुछ समुदायों के द्वारा इस पर एकाधिकार बनाये रखने के लिए कठोर नियमों कि प्रणाली बना गयी एवं निर्धारित कर दिया कि जाती विशेष के लोग इन कार्यों को नहीं करेंगे -!


इंसान मानसिकता होती है कि अपनी मर्जी से वह जैल कि कालकोठरी में भी सुख का अनुभव करता है लेकिन यदि जबर्दस्ती उसे बैठने को कहा जाये तो वह बागी हो जाता है -!


यही वजह रही कि जब उस काल में वेदिक पठन - पाठन एवं धार्मिक कृत्यों पर रोक लगा दी गयी तो प्रतिबंधित जन समुदाय का मन बागी हो उठा और उन्हों ने अपने लिए कथित उच्च वर्ग से अलग देवी देवताओं एवं प्रणालियों कि संरचना कर ली एवं कहीं मानसिक तो कहीं अनुष्ठानिक रूप से वे उसमे संलग्न होने लगे -!


विचारधाराएं और शाखाएं हमेशा विरोधी प्रवृत्तियों को इंगित करती हैं इतर शाखा / मार्ग तभी निर्मित होते है जबकि सामान्य मतों या मान्यताओं में भेद या विरोध परिलक्षित होने लग जाता है -!


आज यदि देखा जाये तो साधनात्मक क्षेत्र में बहुत से मार्ग और शाखाएं नजर आते हैं लेकिन वास्तव में प्रारम्भ में ऐसा नहीं था - इसके अलावा कोई भी साधना या आराधना हमेशा मानसिक संतुष्टि को इंगित करती है - एवं कभी भी दो मानों के बीच शत प्रतिशत समानता सम्भव नहीं हो सकती इसी के परिणामस्वरूप अनेक मार्गों का प्रचलन हुआ जिसमे से स्थानीय या लोक संस्कृतियों कि अपनी अलग धाराएं भी दृश्यमान हुयीं !


जैसे कि :-


वैदिक मंत्र
शाबर मंत्र
जैन मंत्र इत्यादि

१. वैदिक मंत्र :- वैदिक मन्त्र पूर्ण रूपेण संस्कृत भाषा में निर्मित किये गए थे एवं साहित्यनुसार इनके प्रणेता महान ऋषि - साधक एवं समय - समय पर उनके मूल देवी देवताओं के श्री मुख से भी इनकी उत्पत्ति कही जाती है - बहुत से स्तोत्रों को खुद भगवान् शिव ने माता पारवती के साथ हुए संवादों में उनकी जिज्ञासा के परिणाम स्वरुप प्रकट किया -!


२. शाबर मंत्र :- शाबर मन्त्रों के बारे में मान्यता है कि इन मन्त्रों के प्रथम अविष्कारक जंगल में रहने वाले शबर जाती के लोगों द्वारा हुआ - वस्तुतः इन का भी मूल रूप और भावना वही है जो कि वैदिक मन्त्रों में होती है लेकिन या स्थानीय संस्कृति का हिस्सा थे - लेकिन समयकाल में इनका भंडार भी बहुत समृद्ध हुआ एवं अनेक महान ऋषि और मनीषियों ने इनके विस्तार में खूब योगदान दिया वस्तुतः इनके मूल उद्गम का कारण संस्कृत भाषा कि क्लिष्टता और जातिगत प्रतिबन्ध ही थे -!


३. जैन मंत्र :- जैन संप्रदाय वास्तव में प्रारम्भ में मन्त्रों का पक्षधर नहीं था एवं जैन समुदाय में कठिन नियमों तथा परिश्रम पूर्वक साधनाओं में बल दिया जाता था लेकिन जैसा कि इंसान कि मनोवृत्ति होती है कि वह उपलब्ध तकनीकों के आधार पर सरल रास्ते का चयन करना चाहता है न्यूनतम निवेश और उच्चतम प्राप्ति सम्भव हो सके इसलिए समयांतराल में जैन धर्म में भी मन्त्रों का प्रचलन होने लगा - !


इन समस्त शाखाओं के प्रचलन में आने की एक और भी बड़ी वजह थी कि वैदिक मन्त्रों को भगवन शिव के द्वारा कीलित कर दिया जाना एवं बिना गुरु के वैदिक साधनाओं को संपन्न करने कि बाध्यता जैसा कि एक जगह पर भगवान् शिव का एक कथन उद्धृत है " जो भी व्यक्ति बिना गुरु कि आज्ञा के वैदिक मन्त्रों का पठन - पाठन एवं जाप करता वह अपने बल - बुद्धि और आयु का नाश कर बैठता है एवं वह अवश्य ही दंड का भागी है "


सही मार्गदर्शन और उपयुक्त गुरुओं कि अनुपलब्धता भी एक बहुत बड़ा कारक रही है -!


मंत्र :- मंत्र वास्तव में एक या एक से अधिक परम शक्तियों के बीज मन्त्रों को सम्मिलित करते हुए अपनी इच्छा व्यक्त करने हुए निर्धारित लय के साथ एक निर्धारित आवृत्ति हैं जिसमे ध्वनि के माध्यम से अपने इष्ट से अपना संपर्क जोड़ने कि एवं अपनी बात स्वीकार करवाने कि भावना निहित होती है -!


यन्त्र :- यन्त्र एक चित्रात्मक विधा है जिसमे अपने इष्ट के लिए निहित पूर्वनिर्धारित तरीके से एक चित्र का निर्माण करके एवं मन्त्रों के उच्चारण के साथ यंत्र में प्राणप्रतिष्ठा करके उनकी साधना या अभिहित समस्या के समाधान के मार्ग पर अग्रसर होने कि भावना निहित होती है - तंत्र की संकल्पना वस्तुतः यहीं से प्रारम्भ होती है


तंत्र :- तंत्र उपरोक्त वर्णित दोनों विधाओं का संग्रह है जिसमे मन्त्र एवं यन्त्र का एक समुचित समावेश होता है - लेकिन कई बार देखने को मिलता है कि इसमें किसी एक उपरोक्त विधा ( मंत्र एवं यन्त्र ) में से किसी एक का प्रयोग नहीं भी हो सकता है लेकिन किसी एक अनुष्ठान के लिए प्रयुक्त समस्त सामग्री में कुछ सामग्री मंत्र प्रभाव युक्त होती ही होती है यदि कोई भी व्यक्ति इस बात से इंकार करता है कि उसने तंत्र में मंत्र और यंत्रों का प्रयोग नहीं किया है तो यह तय है कि वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर सच बताना नहीं चाहता है -!


इसमें बहुत से माध्यमों का प्रयोग किया जाता है जिसमे वनस्पतियां - चित्रात्मक अभिवक्तियां एवं मन्त्रों तथा अनेक प्रकार के कर्मकांडों का प्रयोग होता है -!

Monday, 10 March 2014

तांत्रिक नारियल - Tantrik Nariyal



                                                       तांत्रिक नारियल - Tantrik Nariyal




तांत्रिक नारियल को पूजा वाला नारियल या लघु नारियल के नाम से भी जाना जाता है - इसका प्रयोग व्यवसायिक जीवन में आने वाली समस्यायों और पारिवारिक जीवन में अनपेक्षित समस्यायों के निवारणार्थ किया जाता है - यह बाज़ार में आसानी से उपलब्ध है और इसे खरीदकर प्रयोग में लाया जा सकता है -!




विधि :-

१. एक तांत्रिक / पूजा वाला / लघु / शगुन नारियल लें

२. अपने सामने काले रंग के आसन में स्थापित करें

३. नारियल में सिंदूर लगाएं

४. अपनी वर्त्तमान समस्यायों को दोहराएँ और उनसे निवारण कि प्रार्थना करें

५. यदि वर्त्तमान में कोई समस्या नहीं है तो प्रार्थना करें कि भविष्य सुखद और समस्या रहित हो

६. माला रुद्राक्ष कि प्रयोग होगी

७. आसन भी काला प्रयोग होगा

८. प्रयास करें कि कपडे भी आप उसी रंग के प्रयोग करें जिस रंग का आसन होगा

९. अनुष्ठान का समय होगा ५ दिन

१०. मंत्र जाप एक माला प्रतिदिन




मंत्र :- ॐ पंचमुखी हनुमंत मम कार्य सिद्धये नमः




अनुष्ठान समापन के पश्चात् नारियल को पूजा स्थल / या वह स्थल जहाँ आपको समस्याएं हो रही हैं - (घर में / कार्यालय में ) रखें




जय माता महाकाली

काली हल्दी - Black Turmeric



काली हल्दी 






काली हल्दी बहुत ही प्रभावी एवं तांत्रिकों कि पसंद कि वस्तु है - और यह मुख्यतः कामाख्या सिद्ध पीठ क्षेत्र के अंतर्गत पायी जाती है - सामान्यतया इसके बारे में कहा जाता है कि यह स्वतः सिद्ध वस्तु है किन्तु विशेष प्रयोजन या परिश्थितियों में इसे सिद्ध भी किया जा सकता है -!




काली हल्दी का प्रयोग विषेश प्रकार के या कठिन तांत्रिक प्रयोंगों को समाप्त करने या उनसे मुक्ति पाने के लिए किया जाता है या फिर ऐसी समस्याएं जिनके बार में अनुमान लगाना कठिन होता है और जो समस्याएं पूजा या अन्य कई प्रकार के अभिचार करने के बाद भी हल नहीं हो पा रही हों - वहाँ पर काली हल्दी का प्रयोग रामबाण का काम करता है -!




विधि :-

१. काली हल्दी को सिन्दूर में लपेटकर अपने सामने आसन में रख लें

२. आसन का रंग काला होगा

३. माला काला हकीक कि प्रयोग होगी

४. अनुष्ठान का दिन मंगलवार - Tusday / शनिवार - Saturday रहेगा

५. अनुष्ठान ५ दिन का होगा

६. अनुष्ठान के दिन में प्रतिदिन ३ माला जप करना है

७. आसन देने के पश्चात् सामने बैठकर अपनी समस्यायों का चिंतन करना है और उसका वर्णन करने के पश्चात् उनसे निवारण के लिए प्रार्थना करनी है

८. यदि सामान्य अनुष्ठान है ( किसी समस्या के लिए नहीं ) तो प्रार्थना करनी है कि आपको हमेशा इन जनि अंजनी व्याधियों से भविष्य में सुरक्षा मिले




मंत्र :- ॐ महाकाल बटुक भैरवाय नमः




अनुष्ठान समापन के पश्चात् पूजा गृह / किसी शुद्ध स्थान / या व्यवसायिक धन पेटी में जगह दें -!




जय माता महाकाली

दक्षिणावर्ती शंख - Dakshinavarti Shankh

दक्षिणावर्ती शंख - Dakshinavarti Shankh






दक्षिणावर्ती शंख




दक्षिणावर्ती शंख भी तंत्र जगत में अपना एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है - पारिवारिक सुःख /शांति के लिए एवं आर्थिक समृद्धि के लिए लोग प्रायः इसे अपने पास रखते हैं और ऐसा देखा भी गया है कि जिसके पास भी यह शंख होता है उस पर भी आर्थिक समस्याएं नहीं आती आती हैं -!




किन्तु दक्षिणावर्ती शंख को भी यदि निम्न विधि से सिद्ध कर लिया जाये तो इसकी महता और गुणों में चार चाँद लग जाते हैं -!




आप सबके हितार्थ मैं इसकी एक विधि यहाँ दे रहा हूँ और आशा करता हूँ कि इसके माध्यम से आप सब लोगों को लाभ प्राप्त होगा !




विधि :-

१. शंख को शुद्ध पानी से धो लें

२. फिर पुनः ताजे , शुद्ध एवं बिना उबले हुए गाय के दूध से धोएं

३. पुनः गंगाजल से धो लें ( यदि गंगाजल न हो तो स्वच्छ पानी में फूल एवं फूलों कि पत्तियां थोडा सा कपूर , इत्र , सफ़ेद चन्दन , केवड़ा इत्यादि मिलकर उस सुवासित / सुगन्धित जल से धोएं )

४. कपडे के आसन पर शंख को स्थान दे

५. आसन प्रदान करने के पश्चात् यदि किसी विशेष समस्या के निवारणार्थ कर रहे हों तो उस समस्या का चिंतन करें और प्रार्थना करें कि आपको उस समस्या से मुक्ति मिले

६. यदि सामान्य प्रयोजन से इसे सिद्ध करना चाहते हैं कि भविष्य में आपका जीवन खुशहाल रहे तो इस सन्दर्भ में प्रार्थना करें -!

७. मंत्र जाप के लिए कमलगट्टे कि या क्रिस्टल कि माला का प्रयोग करें

८. साधना का प्रारम्भ गुरुवार - Thursday को करें

मंत्र :- ॐ कनक धारा महा लक्ष्मी मम कार्य कुरु कुरु नमः

९. मंत्र जाप ३ माला प्रतिदिन

१०. मंत्र जाप का समय ३ दिन




समस्त विधान के पश्चात् इसे आप अपने पूजा स्थल / व्यवसायिक धन पेटी / किसी शुद्ध जगह पर रखें




जय माता महाकाली

बिल्ली कि नाल / जेर - Billi Ki Naal / Jer - CAT's NAVAL CHORD


बिल्ली कि नाल / जेर






बिल्ली कि नाल या जेर प्राप्त करना बहुत ही मुश्किल काम है कुछ भाग्यशाली व्यक्तियों को ही यह प्राप्त हो पाती है - क्योंकि प्रसव के तुरंत बाद बिल्ली अपनी नाल को खुद ही खा जाती है किन्तु यदि यदि यह आपको प्राप्त हुयी है तो आप कुछ भाग्यशाली लोगों में से एक हैं और इसे आप निमोक्त विधि से अपने लिए सिद्ध और उपयोगी बना सकते हैं !

सिद्ध करने कि विधि :-

१. माला कमलगट्टे कि होनी चाहिए

२. आसन लाल रंग का प्रयोग होगा

३. मंत्र जप संख्या प्रतिदिन - १०८

४. मंत्र जप के दिन - ५

५. मंत्र जाप प्रारम्भ करने का दिन :- गुरुवार - Thrusday

विधि :- लाल रंग के आसान में ही बिल्ली कि नाल / जेर सिन्दूर में लपेटकर रखें और मंत्र जाप करें

मंत्र :- ॐ श्रीं उलूक मम कार्य कुरु कुरु नमः 



सम्पूर्ण विधि को पूर्ण करने के पश्चात् लकड़ी के डिब्बे में बंद करके इसे अपने ड्रावर / तिजोरी / गल्ला बॉक्स में रख लें

ध्यान रखें कि डिब्बा पूरी तरह से सिन्दूर से भरा हुआ होना चाहिए और सिर्फ इतनी जगह खली हो कि जिसमे आप नाल / जेर रख सके और फिर उस डिब्बे को बंद करके रख ले !

जिसके पास बिल्ली कि नाल / जेर होती है उसे भी कभी धनाभाव नहीं देखना पड़ता और कहते हैं कि उसकी आने वाली पीढ़ियां भी यदि धन को खुले हाथों से खर्च करती रहें तब भी आभाव नहीं होता - लेकिन इस प्रकार के कार्यों या सिद्धियों से प्राप्त धन एवं प्रस्थिति का कभी भी गलत कामों में उपयोग नहीं करना चाहिए - जितना भी सम्भव हो सके उतना जन कल्याण और अन्य शुभ कार्यों में योगदान दें तो आप पाएंगे कि ये साडी शक्तियां दिनोदिन बढ़ती ही जाएँगी और आपके साथ साथ अनेकानेक लोगों के जीवन में भी खुशियां भर जाएँगी -!

जय माता महाकाली

Saturday, 8 March 2014

सियार सिंघी - सियार सिंगी - Siyar Singhi - Shiyar Singi


सियार सिंघी - सियार सिंगी - Siyar Singhi - Shiyar Singi









सियार सिंगी बहुत ही चमत्कारी वस्तु होती है - इसे घर में रखने से सकारात्मक उर्जा का अनुभव होता है ! सियार सिंगी बालो के एक गुच्छे कि तरह होती है !

असल में सियार के सींग नहीं होते परन्तु कुछ सियारों के नाक के ऊपर बालो का एक गुच्छा बन जाता है - धीरे धीरे वह कड़ा और बड़ा हो जाता है और सींग जैसा बन जाता है इसे सियार सिगी कहते है और यह हजारों में से किसी एक के नाक पर होता है ! 
इसमें वशीकरण की अद्भुत शक्ति होती है - यदि इसे सिद्ध कर लिया जाए तो यह शक्ति हजारों गुना बढ़ जाती है ! इसके द्वारा आप किसी से भी अपना मनोवांछित काम करवा सकते है ! इसे सिद्ध करने की अनेकों विधियाँ है - पर यदि इसे होली या दीपावली के दिन निम्न विधि से सिद्ध किया जाए तो इसका चमत्कार बड़ी जल्दी नज़र आता है !

आपके सबके लिए एक आसान और प्रमाणिक विधि जो बहुत प्रयासों के बाद मिल सकी है उसका उल्लेख मैं यहाँ कर रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ कि यह आप लोगों के लिए उपयोगी होगी और माता महाकाली कि कृपा से आप लोग इसका लाभ ले पाएंगे ! यह विधि दीपावली से दस दिन पहले शुरू की जाती है मतलब दसवां दिन दीपावली होना चाहिये !

|| मन्त्र ||


ॐ चामुण्डाये नमः

|| विधि ||

दीपावली से दस दिन पहले एक सियार सिंगी का एक जोड़ा लें

२. उसे लाल कपडे पर स्थापित करे

३. लाल आसन बिछा कर लाल वस्त्र धारण कर बैठ जाएँ

४. सरसों के तेल का दीपक जलाएँ

५. सियार सिंगी पर गंगा जल छिड़कें

६. चावल चढ़ाएँ और

७. पांच लौंग साबुत और पांच चोटी इलायची चढ़ाये

उपरोक्त मंत्र २१०० बार जप करे ! जप समाप्ति के बाद अग्नि में २१ आहुति गुग्गल की दे ! ऐसा रोज दीपावली तक करे !

दीपावली वाली रात पूजा के बाद इस नीचे लिखे मन्त्र का सियार सिंगी के सामने ११०० बार जाप करे !



दीपावली वाली रात पूजा के बाद इस नीचे लिखे मन्त्र का सियार सिंगी के सामने ११०० बार जाप करे !

|| मंत्र ||


रंगली पीढ़ी रंगले पावे

जित्थे पुकारा ओथे आवे

नाले अंग नाल अंग मिलावे

नाले घर दा घर खिलावे !!





इस मन्त्र को जपने के बाद सियार सिंगी को किसी चांदी या ताम्बे की डिब्बी में मीठा सिन्दूर डाल कर उसमें पांच लौंग पांच इलायची और एक कपूर का छोटा सा टुकड़ा डाल कर रख ले !

|| प्रयोग विधि ||

जब किसी पर प्रयोग करना हो तो इस डिब्बी को खोल कर सियार सिंगी के सामने दोनों मन्त्रों का एक एक माला जाप करे और उस व्यक्ति का नाम बोल कर चामुंडा मां से उसे अपने अनुकूल करने की प्रार्थना करे और डब्बी को अपनी जेब में रखकर चले जाएँ - आपका कार्य सिद्ध हो जायेगा !

मित्रगण अभी तक बहुत से लोग मुझसे ये पूछ रहे थे कि सियारसिंगी / गीदड़ सिंगी में असली या नकली की पहचान कैसे करें ?

सच कहूँ तो मुझे भी पता नहीं था - लेकिन अब कुछ जानकारी है जिसके आधार पर आप लोग असली और नकली की पहचान कर सकते हैं। परन्तु उसके लिए कुछ समय की जरुरत होती है -!
१. सियारसिंगी के बाल बढ़ते हैं।
 
२. कुछ लोगों के अनुसार यदि दो सियारसिंगी का जोड़ा साथ रखा जाता है तो उनकी संख्या धीरे-धीरे करके बढ़ने लगती है।
 
३. कुछ मामलों में सियारसिंगी का आकार भी बढ़ता है - लेकिन इसे बालों का बढ़ना ही कहा जाना बेहतर होगा।


Hattha Jodi - Hatha Jodi - हत्था जोड़ी - हाथा जोड़ी

Hattha Jodi - Hatha Jodi - हत्था जोड़ी - हाथा जोड़ी 






हत्था जोड़ी एक प्राकृतिक वनस्पति है जो कि मध्य प्रदेश के कुछ भागों में स्वतः उत्पन्न होती है - वस्तुतः यह उस वनस्पति कि जड़ होती है जिसका आकार मानव हाथ के पंजो जैसा होता है - और देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि कोई मानव हाथ मुट्ठी बांधे हुए हो -!


मध्य प्रदेश कि वनवासी जातियां अक्सर इसे बेचती हुयी दिख जाती हैं - हत्था जोड़ी बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावकारी वस्तु है यह :-
मुकदमा
शत्रु संघर्ष
दरिद्रता
आदि के निवारण में बहुत प्रभावी है इसके जैसी चमत्कारी वस्तु आज तक देखने में नही आई


इसमें वशीकरण को भी अदुभूत शक्ति है -!


भूत - प्रेत आदि का भय नही रहता यदि इसे तांत्रिक विधि से सिध्द कर दिया जाए तो साधक निष्चित रूप से चामुण्डा देवी का कृपा पात्र हो जाता है यह जिसके पास होती है उसे हर कार्य में सफलता मिलती है धन संपत्ति देने वाली यह बहुत चमत्कारी साबित हुई है तांत्रिक वस्तुओं में यह महत्वपूर्ण है -!

हत्था जोड़ी में अद्भुत प्रभाव निहित रहता है, यह साक्षात चामुंडा देवी का प्रतिरूप है-!


यह जिसके पास भी होगी वह अद्भुत रुप से प्रभावशाली होगा


सम्मोहन, वशीकरण, अनुकूलन, सुरक्षा में अत्यंत गुणकारी होता है, हत्था जोड़ी.
हमारे तंत्र शास्त्र तथा तन्त्र का प्रयोग करने वालो के लिये एक महत्वपूर्ण वनौषधि के नाम से जानी जाती है।



इसके पत्ते हरे रंग के होते है साथ ही यह भी देखा जाता है इन पत्तो के नीचे के हिस्से मे सफ़ेद रंग की परत होती है और इस सफ़ेद हिस्से पर बाल जैसे मुलायम रोंये होते है।


इसके ऊपर गुलाब की तरह का फ़ूल आता है कही कही पर फ़ूल मे नीला रंग भी दिखाई देता है।

यह प्राय: पंसारियो के पास या राशि रत्न बेचने वालो के पास से प्राप्त कि जा सकती है इसे तांत्रिक सामान बेचने वाले भी अपने पास रखते है। 

१. हत्थाजोडी को कर जोडी हस्ताजूडी के नाम से भी जाना जाता है 

२. उर्दू मे इसे’बखूर इ मरियम’ कहा जाता है 

३. ईरान मे इसे चबुक उशनान के नाम से जाना जाता है 

४. लैटिन मे इसे सायक्लेमेन परसीकम कहा जाता है।

इसकी उपज किसी भी पेड की छाया मे तथा नम जमीन मे होती है इसकी जड गोल होती है और रंग काला होता है इसी जड मे हत्था जोडी बनती है।

यदि आप खूब मेहनत और लगन से काम करके धनोपार्जन करते हैं फिर भी आपको आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो आपको अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए इससे सम्बंधित उपाय करने चाहिए।

इसके लिए किसी भी शनिवार अथवा मंगलवार के दिन हत्था जोड़ी घर लाएं। इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर घर में किसी सुरक्षित स्थान में अथवा तिजोरी में रख दें। इससे आय में वृद्घि होगी एवं धन का व्यय कम होगा।

तिजोरी में सिन्दूर युक्त हत्था जोड़ी रखने से आर्थिक लाभ में वृद्धि होने लगती है.


हत्था जोड़ी के कुछ प्रयोग :-


१. प्रसव की सुगमता के लिये ग्रामीण इलाको मे इसे चन्दन के साथ घिस कर प्रसूता की नाभि पर चुपड देते है इससे बच्चा आराम से हो जाता है।

२. गर्भपात करवाने के लिये भी इसे प्रयोग मे लाया जाता है लेकिन इसके आगे के लक्षण बहुत खराब होते है जैसे हिस्टीरिया का मरीज हो जाना

३. जब कभी पेशाब रुक जाती है तो इसे पानी के साथ घिसकर पेडू पर लगाने से पेशाब खुल जाता है.

४. पेट मे कब्ज रहने पर इसको पानी के साथ घिस कर पेट पर चुपडने से कब्जी दूर होने लगती है.

५. मासिक धर्म के लिये इसके चूर्ण की पोटली बनाकर योनि मे रखने से शुद्ध और साफ़ मासिक धर्म होने लगता है लेकिन इस कार्य के लिये किसी योग्य डाक्टर या वैद्य की सहायता लेनी जरूरी होती है.

६. हत्थाजोडी का चूर्ण पीलिया के बहुत उपयोगी है पीलिया के मरीज को हत्थाजोडी के चूर्ण को शहद के साथ चटाने से लाभ मिलता है - लेकिन इसका चूर्ण शहद के साथ खिलाने के बाद रोगी को कपडा ओढ़ा देना जरूरी होता है जिससे पीलिया का पानी पसीने के रूप में निकलने लगेगा - कुछ समय बाद पसीने को तौलिया से साफ़ कर लेना चाहिये इससे यह समूल रोग नष्ट करने मे सहायक होती है.

७. पारा शोधन कि प्रक्रिया में भी हत्थाजोडी को प्रयोग मे लाते है - हत्थाजोडी के चूर्ण को पारे के साथ खरल करते है धीरे धीरे पारा बंधने लगता है - मनचाही शक्ल मे पारे को बनाकर गलगल नीबू के रस मे रख दिया जाता है कुछ समय मे पारा कठोर हो जाता है लेकिन पारा और हत्था जोडी असली हो तभी यह सम्भव है अन्यथा कुछ हासिल नहीं होता -!

८. हत्थाजोडी को सिन्दूर मे लगाकर दाहिनी भुजा मे बांधने से कहा जाता है कि वशीकरण होता है

९. बिल्ली की आंवर / जेर हत्थाजोडी और सियारसिंगी को सिन्दूर मे मिलाकर एक साथ रखने से कहा जाता है कि भाग्य मे उन्नति होती है

१०. यदि बच्चा रोता अधिक है और जल्दी-जल्दी बीमार हो जाता है तो शाम के समय, हत्थाजोडी के साथ रखे लौंग-इलायची को लेकर धूप देना चाहिए।

यह क्रिया शनिवार के दिन अधिक लाभकारी होती है।

११. किसी भी व्यक्ति से वार्ता करने में साथ रखे तो वो बात मानेगा.

१२. जिसको भी वश में करना हो, उसका नाम लेकर जाप करें तो इसके प्रभाव से वह व्यक्ति वशीभूत होगा.

१३. त्रि - धातु के तावीज में गले में धारण करने से बलशाली से बलशाली व्यक्ति भी डरता है. सभी कार्यों में निरंतर निर्भय होता है.

१४. प्रयोग के बाद चांदी की डिबिया में सिन्दूर के साथ ही तिजोरी में रख दें.


हत्थाजोडी को सिद्ध करने के तरीके :-

1- क्क हत्थाजोडी मम् सर्व कार्य सिद्ध कुरू-कुरू स्वाहा

:- मंत्र से पीपल के पते पर अपना नाम लिखकर हत्थाजोड़ी को पत्ते पर रखें। रुद्राक्ष - माला से रोजाना तीन माला पांच दिन तक जाप करें। इसे सिद्ध-अभिमंत्रित होने पर पूजा-स्थल पर रखें। साधक के सभी कार्य करने हेतु जागृत हो जाती है।

२. ॐ ऐं हीं क्ली चामुण्डायै विच्चे स्वाहा 

मंत्र जप संख्या २१००० + २१०० मन्त्रों से हवन + २१० मन्त्रों से तर्पण + २१ मन्त्रों से मार्जन

यदि हवन करना किसी वजह से सम्भव न हो तो उतनी संख्या में जप किया जा सकता है लेकिन यदि सम्भव हो तो हवन करना ही ज्यादा उपयोगी होगा 

:- इस मंत्र द्वारा सिद्ध की गई हाथाजोडी जीवन के विभिन्न क्षेत्रो में साधक को सफलता प्रदान करती है। जिस घर में विधिवत सिद्ध की गई असली हाथाजोडी की पूजा होती है, वह साघक सभी प्रकार से सुरक्षित और श्री सम्पन्न रहता है।



रवि पुष्य नक्षत्र में पंचामृत से स्नान कराकर विधिवत पूजन कर निम्नलिखित मंत्र का १२५०० जप कर के इसको सिद्ध कर लें. रक्त आसन उत्तरभिमुख बैठ कर लाल चन्दन की माला से जप करें.

३. हाथा जोड़ी बहु महिमा धारी कामण गारी खरी पीयारी
राजा प्रजा मोहन गारी सेवत फल नर नारी
केशर कपूर से मैं करी पूजा दुश्मन के बल को तुं भुजा
मन इछंत मांगूं ते देवे-कहण कथन मेरा ही रवे
जोड़ी मात दुहाई रख जे मेरी बात सवाई
मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फुरो मन्त्र इश्वारोवाचा

विधि : रवि पुष्य नक्षत्र में पंचामृत से स्नान कराकर विधिवत पूजन कर उपरोक्त मंत्र का १२५०० जप कर के इसको सिद्ध कर लें.


1. रक्त आसन उत्तरभिमुख बैठ कर लाल चन्दन की माला से जप करें


2. लाल फूल चढाएं


3. लाल वस्त्र पहने


4. सामने चक्रेश्वरी व भैरव की मूर्ती या चित्र स्थापन करें. व उनकी पूजा करें


5. भैरव की पूजा तेल और सिन्दूर व लाल फूल से करनी है


6. चक्रेश्वरी की अष्ट प्रकार से पूजा करनी है

ऋद्धि : ऊं ह्रीं अर्हं णमों सव्वोसवाण.

मन्त्र : ऊं नमो नामिऊण विसहर विस प्रणाशन रोग शोक दोष ग्रह कप्प्दुमच्चा यई सुहनाम गहण सकल सुह दे ऊं नमः स्वाहा.



(उपरोक्त तीसरे क्रम के मंत्र के अतिरिक्त ऊपर दिए गए ऋद्धि और मंत्र से भी पूजा करें. इस प्रकार साधना करने के पश्चात एक चांदी की डिबिया में शुद्ध सिन्दूर के साथ कृष्णपक्ष के पहले दिन ही सुबह इसको उल्टा करके (यानि पंजे नीचे की तरफ ) रख दें. फिर शुक्लपक्ष के पहले दिन सुबह सीधा करके (यानी पंजे ऊपर) रख दें. इस तरह तीन कृष्णपक्ष व तीन ही शुक्लपक्ष उल्टा सीधा करके रखते रहें. आखिर के शुक्लपक्ष में वो उल्टा ही रहेगा फिर हमेशा के लिये उसे उल्टा ही रखना है. उस चांदी की डिबिया को अपनी तिजोरी में रख दें. परन्तु कभी भी कोई औरत उस डिबिया को भूल से भी खोल कर न देखे. नहीं तो प्रभाव समाप्त हो जायेगा. यह बहुत ही सुंदर लक्ष्मी वर्धक प्रयोग है)



होली, दीपावली एवं नवरात्र को मंत्र जाप से ये प्रयोग ज्यादा शक्ति एवं प्रभाव देते हैं !

हत्था जोड़ी को स्टील की डिब्बी में लौंग, इलायची व सिन्दूर के साथ ही रखना चाहिए।

हालाँकि हत्था जोड़ी बहुत ही सस्ती वनौषधि है किन्तु प्रायः यह ईरान से भारत मंगाने पर खर्चा अधिक और मंगाने पर प्रतिबन्ध होने कि वजह से लोग दाब घास की जड को कृत्रिम रूप से हत्थाजोडी का रूप देकर सिन्दूर मे लगाकर बेचते है

कुछ लोग मरे हुये चूजों के पंजो को भी मोड कर सिन्दूर आदि मे लगाकर बेचते हैं

अतः निश्चित सफलता और उचित परिणाम के लिए विश्वशनीय व्यक्ति या प्रतिष्ठान से ही इसे प्राप्त करें जिससे कि प्रयोग एवं सफलता संदिग्ध न हो -!



जय माता महाकाली