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Tuesday, 16 September 2014

गायत्री मन्त्र श्रंखला :- (दुर्गा गायत्री)
विधि :-
१. माला :- लाल चन्दन / रुद्राक्ष

२. माला का रंग :- लाल

३. आसन :- कम्बल / या ऊष्मा का कुचालक कोई भी कपडा

४. आसन का रंग :- लाल

५. जप समय :- सामान्य साधकों हेतु तीन संध्याएं विहित हैं जिसमे प्रथम ( सुबह ४:०० बजे से ०७:३० तक एवं ) द्वितीय संध्या ( पूर्वान्ह एवं अपरान्ह संधिकाल ११:०० से दोपहर १:३० बजे तक ) तृतीय संध्या ( सायंकाल ०४:३० से ०७:३० तक )

६. जप संख्या :- ३ लाख

७. न्यूनतम जप संख्या :- ३ माला प्रतिदिन

८. जप प्रारम्भ करने का दिन :- कोई भी लग्न काल या फिर सोमवार या शुक्रवार

९. मुख की दिशा :- पूर्व या उत्तर



दुर्गा गायत्री मन्त्र :- ॐ दुं दुर्गायै विद्महे दुष्टविदारिण्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात


Saturday, 30 August 2014

गायत्री मन्त्र - Gayatri Mantra


गायत्री मन्त्र


विधि :-

१. माला :- तुलसी / चन्दन

२. माला का रंग :- सफ़ेद

३. आसन :- सुखासन

४. आसन का रंग :- सफ़ेद किन्तु ऐसा जो कि ऊष्मा का कुचालक हो ( जैसे कि रेशमी / कम्बल / कुश घास का / उपलब्धतानुसार

५. जप समय :- सामान्य साधकों हेतु तीन संध्याएं विहित हैं जिसमे प्रथम ( सुबह ४:०० बजे से ०७:३० तक एवं ) द्वितीय संध्या ( पूर्वान्ह एवं अपरान्ह संधिकाल ११:०० से दोपहर १:३० बजे तक ) तृतीय संध्या ( सायंकाल ०४:३० से ०७:३० तक )

६. जप संख्या :- ३ लाख

७. न्यूनतम जप संख्या :- ३ माला प्रतिदिन

८. जप प्रारम्भ करने का दिन :- कोई भी लग्न काल या फिर सोमवार,शुक्रवार या रविवार

९. मुख की दिशा :- सुबह पूर्व एवं सायंकाल पश्चिम





गायत्री मंत्र:- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ।

ॐ = प्रणव
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला
स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला
तत = वह
सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल
वरेण्यं = सबसे उत्तम
भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाला
देवस्य = प्रभु
धीमहि = आत्म चिंतन के योग्य
धियो = बुद्धि
यो = जो
नः = हमारी
प्रचोदयात् = हमें शक्ति दें

Friday, 22 August 2014


गायत्री उपासना की विधि



गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है । हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकाण्डों के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है । तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है । शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहिए ।

उपासना विधि-विधान :-

(१) ब्रह्म सन्ध्या :- जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है । इसके अंतर्गत पाँच कृत्य करने होते हैं ।

पवित्रीकरण :- बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढँक लें एवं मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें ।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।

आचमन :- वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए ।

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ।

शिखा स्पर्श एवं वंदन :- शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । 

निम्न मंत्र का उच्चारण करें :-

ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

प्राणायाम :- श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है । श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं । प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए ।

ॐ भूः 
ॐ भुवः 
ॐ स्वः 
ॐ महः
ॐ जनः 
ॐ तपः 
ॐ सत्यम्
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । 
ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ ।

न्यास :- इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।

ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु । (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु । (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु । (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु । (समस्त शरीर पर)

आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान् के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं ।

देवपूजन :- गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री है । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है ।

ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि ।
गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥

ॐ श्री गायत्र्यै नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि ।

गुरु :- गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें :-

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः ।
गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।

माँ गायत्री व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें ।

जल का अर्थ है - नम्रता-सहृदयता ।

अक्षत का अर्थ है - समयदान अंशदान ।

पुष्प का अर्थ है - प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास ।

धूप-दीप का अर्थ है - सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य-परमार्थ ।

नैवेद्य का अर्थ है - स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश ।

ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं । कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है ।

जप :- गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पंद्रह मिनट नियमित रूप से किया जाए । अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम । होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । जप प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है ।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाय एवं भावना की जाय कि हम निरन्तर पवित्र हो रहे हैं । दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है ।

ध्यान :- जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में गायत्री माता के अंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है ।

सूर्यार्घ्यदान :- विसर्जन-जप समाप्ति के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में र्अघ्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है :-

ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते ।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
ॐ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः॥

भावना यह करें कि जल आत्म सत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट् ब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-सम्पदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है ।

इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए । जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए । सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है । मौन-मानसिक जप चौबीस घण्टे किया जा सकता है । माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें ।

Wednesday, 20 August 2014

गायत्री मन्त्र श्रंखला - भूमिका 




मन्त्र :-

१. मन्त्र क्या हैं ?


सबसे पहला सवाल तो यही उठता है जनमानस के मष्तिष्क में - जिसका साधारण सा जवाब है कुछ लयबद्ध शब्द या शब्दों का समूह जिनके निरंतर उच्चारण से एक निश्चित दैवी शक्ति का प्रादुर्भाव होता है मन्त्र कहलाते हैं ।


२. मन्त्र काम कैसे करते हैं ?


इसका जवाब हालाँकि ऊपर वाले उत्तर में ही सन्निहित है - भौतिक जगत के एक साधारण से उदाहरण से इस बहुत भली भांति समझा जा सकता है - जैसे एक विद्युत पंखे का जब स्विच ऑन किया जाता तो उसकी पंखुरियाँ एक निश्चित आवृत्ति में घूमने लग जाती हैं और एक निश्चित गति और निश्चित दबाव से हवा को लक्ष्य की ओर प्रक्षेपित करने लग जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप हमे बंद कमरे में भी हवा का आनंद प्राप्त होता है - अब इसमें यह नहीं कहा जा सकता की हवा उपलब्ध ना होते हुए भी हवा उत्पन्न हुयी - हवा विद्यमान थी लेकिन उसे एक निश्चित दिशा और गति विद्युत पंखे ने दी -! ठीक इसी प्रकार दैवी शक्तियां इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में विद्यमान हैं जरुरत है उन्हें एक निश्चित गति से लक्ष्य की तरफ आकर्षित करके आनंदलाभ लेने का - जब हम निरंतर मन्त्र जप करने लगते हैं तब दैवी शक्तियां हमारी तरफ आकर्षित होकर हमारे चारों तरफ एक वातावरण निर्मित करने लग जाती हैं -!


३. मन्त्रों की भाषा गूढ़ एवं संस्कृत में क्यों है ?


चूँकि सभी मन्त्रों का प्रादुर्भाव आर्ययुगीन सभ्यता में हुआ और उसी समय देवत्व के सिद्धांत भी प्रतिपादित हुए साथ ही आर्यों की भाषा भी संस्कृत ही थी अस्तु सभी मन्त्र-वेद ऋचाएं-स्तुतियाँ उनकी भाषा में ही रची गयीं इसी वजह से मन्त्र संस्कृत भाषा में हैं ।


मन्त्रों की भाषा वास्तव में गूढ़ नहीं है - यह हमारी अपनी प्रचलित भाषा से भिन्न है - जैसे कि यदि हम किसी देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करते हैं तो वह क्षेत्रीय भाषा हमे सरल और उपयोगी प्रतीत होती है लेकिन वहीँ दूसरे क्षेत्र की भाषा हमे गूढ़ या कठिन प्रतीत होती है अतएव स्पष्ट है की मन्त्रों की भाषा गूढ़ नहीं अपितु हमारी अल्पग्यता इन्हे हमारे लिए गूढ़ बना देती है ।


४. मन्त्रों में निश्चित आवृत्ति का क्या अर्थ है ?


मन्त्रों में निश्चित आवृत्ति का अर्थ बहुत साधारण भी है और बहुत क्लिष्ट भी - साधारणतया इसे इस प्रकार समझा जा सकता है - जैसे यदि आपका लक्ष्य व्यक्ति आपसे १०० मीटर की दुरी पर स्थित है और आपसे कहा जाये कि आप उसे अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए उसे आवाज दो - आपको पता है की आपकी आवाज को प्रक्षेपित करने की सामर्थ्य मात्र १० मीटर है तो इस स्थिति में आप क्या करेंगे ? वह लक्ष्य तो कभी आपको सुन नहीं पायेगा - इसके लिए दो ही तरीके होंगे या तो आप अपनी आवाज प्रक्षेपित करने की सामर्थ्य बढ़ाएं या फिर किसी अन्य कृत्रिम विधि का प्रयोग करें - भौतिक जगत में इस दुरी को पूरा करने के लिए टेलीफोन का उपयोग हुआ और आध्यात्मिक जगत में टेलीपैथी या ध्यान पद्धति का - अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करके मंत्रो का एक निश्चित लय और निश्चित संख्या में जाप करना ही आवृत्ति कहलाता है ।


५. मन्त्रों का जाप करने का क्रम या विधान क्या है ?


मन्त्रों का जाप करने के दो विधान होते हैं :-

अ. मानसिक जाप - जिन मन्त्रों का जाप मानसिक रूप से किया जाये
ब. उपांशु जाप - ऐसे मन्त्र जिनके जाप में होंठ हिलते हुए दिखें किन्तु आवाज बाहर सुनाई ना दे
स. वाचक जाप - ऐसे मन्त्र जो जोरदार आवाज से पढ़े जाएँ

मानसिक जाप में मन्त्रों का जाप मन ही मन किया जाता है इस प्रकार के जाप में स्थान-काल का कोई भेद नहीं होता शुचिता-अशुचिता का भी भेद वांछनीय नहीं है ।

उच्चरित जाप में सभी मानदंड अपेक्षित होते हैं जैसे कि - स्वच्छता - सत्यभाषण - विनियोग -पुश्चरण - जप क्रम - जप संख्या अनुसरण - माला एवं अन्य विहित विधान ।

गायत्री का अर्थ :- गायत्री का भाव निहित अर्थ है तेजपुंज / तेजोमय - सामान्य तौर पर गायत्री मन्त्र का यदि अर्थ और सम्बन्ध देखा जाये तो जो ज्ञात होता है वह यह की - गायत्री मन्त्र सूर्यदेव के सविता रूप का प्रतिनिधित्व करता है - जो परम तेजपूर्ण एवं देव-देवी शक्तिओं को भी प्रेरित करने वाला है - इस मन्त्र या साधना का वास्तविक उद्देश्य ही है कि इस झूठे जगत व्यवहार या मायारूपी जगत के अंधकार से परम तेजोमय संसार की ओर जाने का रास्ता मिले हमे - ठीक इसी प्रकार विभिन्न देवी देवताओं के गायत्री मन्त्र भी हैं - जो की सामान्य मन्त्रों से हजारों गुना अधिक प्रभाव प्रदान करने वाले होते हैं - हर बार एक ही बात कहूँगा मैं कि पवित्रता - भावनात्मक जुड़ाव और समर्पण मृत मन्त्र को भी आपके लिए जीवंत बना देता है लेकिन ज्वलंत मन्त्र भी कई बार राख से ज्यादा नहीं होते -!

गायत्री मन्त्र :-

गायत्री मंत्र:- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री मंत्र का अर्थ :- सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।

धार्मिक दृष्टि से वेदमाता गायत्री आदिशक्ति है। ज्ञान शक्ति रूप माता गायत्री का स्मरण सांसारिक जीवन की हर परेशानियों से बाहर आने और मनोरथ पूरे करने के लक्ष्य से बहुत महत्व रखता है। यही कारण है कि गायत्री के ध्यान और उपासना के लिए गायत्री मंत्र का जप बहुत ही प्रभावी माना गया है। मंत्र, श्लोक या स्त्रोत के जप का शुभ फल तभी संभव है, जब उनके लिए नियत समय, नियम और मर्यादा का पालन किया जाए। गायत्री मंत्र जप के लिए भी ऐसा ही निश्चित समय और नियम शास्त्रों में नियत हैं।
गायत्री मंत्र जप और संध्या का महत्व सूर्योदय से पहले है। इसलिए सूर्य उदय होने से पहले उठकर जब तक आसमान में तारे दिखाई दे, संध्याकर्म के साथ गायत्री मंत्र का जप करें।

इसी तरह शाम के समय सूर्य अस्त होने से पहले संध्या कर्म और गायत्री मंत्र का जप शुरू करें और तारे दिखाई देने तक करें।

धार्मिक दृष्टि से सुबह के समय खड़े होकर किया गया संध्याकर्म और गायत्री जप रात के पाप और दोषों को दूर करते हैं।

वहीं शाम को बैठकर किया गया संध्या कर्म और गायत्री जप दिन में हुए दोष और पाप नष्ट करते हैं।

यथासंभव गायत्री मंत्र का जप किसी नदी या तीर्थ के किनारे, घर के बाहर एकान्त जगह या शांत वन में बहुत प्रभावी होता है।




Friday, 14 March 2014

ब्रह्मा गायत्री मन्त्र - Brahma Gayatri Mantra



ब्रह्मा गायत्री मन्त्र - Brahma Gayatri Mantra








।। ॐ वेदात्मने विद्महे, हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।।

Ganesh Gayatri Mantra 2 - गणेश गायत्री मन्त्र २

Ganesh Gayatri Mantra 2 - गणेश गायत्री मन्त्र २






।। ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।।

Wednesday, 12 March 2014

Ganesh Gayatri Mantra - गणेश गायत्री मंत्र

Ganesh Gayatri Mantra - गणेश गायत्री मंत्र







।। ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।।