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Thursday, 24 September 2015

षट योगिनी - Shat Yogini - Six Yogini

षट योगिनी - Shat Yogini - Six Yogini



जैसा कि यह प्रश्न थोड़ा सा घुमावदार था - एवं अध्यात्मिक तथा तंत्र दोनों जगत से सम्बन्ध रखता है - जिस प्रकार तंत्र जगत के क्षेत्र में वाम मार्ग में षट कर्म प्रचलित हैं और प्रत्येक वाममार्गी साधक के लिए इनका विशेष महत्व होता है ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत में योगिनी शब्द शब्द एक व्यापक महत्व रखता है - कोई भी शक्ति साधक योगिनी शक्ति और उनके प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता - वास्तव में प्रश्न यह उठता है तब कि ( योगिनियां हैं क्या और शक्ति साधना में इनका क्या लेना-देना है ) ?


तो यहाँ इस बात का विवेचन आवश्यक हो जाता है - जिस प्रकार शैव सम्प्रदाय के लिए शिव अथवा रूद्र की कल्पना या पूर्णता द्वादश ज्योतिर्लिंगों के बिना पूर्ण नहीं समझी जाती है उसी प्रकार शाक्त सम्प्रदाय के लिए भी योगिनी महत्वपूर्ण हैं - जब आवरणपूजा की बात आती है तब योगिनी पूजन परम कर्म बनता है।


योगिनियां वास्तव में आद्य शक्ति जगदम्बा की सहचरियों अथवा सखियों के रूप में गणित होती हैं - इनकी संख्या अनेक ग्रंथों एवं उद्धवरणों के आधार पर भिन्न-भिन्न कही जाती है - किन्तु सर्वमान्य संख्या चतुःषष्टि (६४ ) मानी जाती है -!


जिसमे से षट योगिनी के भेद अलग हैं जो प्राणशक्ति से सम्बंधित हैं जिसे हम कुण्डलिनी शक्ति के नाम से भी जानते हैं - कुण्डलिनी शक्ति में भी विभिन्न मतों और विद्वानों के आधार पर अलग-अलग चक्र भेद कहे जाते हैं - किन्तु सर्वमान्य चक्र 7 माने जाते हैं - जिन्हे गूढ़ार्थ में 6 ही माना गया है - मूलाधार से आज्ञाचक्र - सहस्रार नामक चक्र को गणना से अलग गया है - क्योंकि उसे ब्रह्म/शून्य/परम/समाधि तत्व से चिन्हित किया गया है और वहीँ पर शिव और शक्ति एकाकार हो जाते हैं -!


चूँकि विषय षट योगिनी से सम्बंधित है अस्तु मूल विषय पर आते हुए माँ की कृपा स्वरुप प्राप्त ज्ञान के आधार पर इसकी तालिका प्रस्तुत कर रहा हूँ - किसी भी दोष के लिए मुझ मंदबुद्धि को क्षमा प्रदान करें एवं यदि इसमें किसी सत्य अंश के उपस्थित होने की दशा में मेरी माँ महाकाली को धन्यवाद अवश्य दें -!


१. डाकिनी


वास :- मूलाधार चक्र
मूल शक्ति :- ब्राह्मी
आसन :- चतुर्दल कमल
सहचर :- ब्रह्मदेव
बीज :- लं


२ राकिनी


वास :- स्वाधिष्ठान चक्र
मूल शक्ति :- वैष्णवी
आसन :- छहदल कमल
सहचर :- विष्णु
बीज :- वं


३. लाकिनी


वास :- मणिपुर चक्र
मूल शक्ति :- रौद्री
आसन :- दशदल कमल
सहचर :- रूद्र
बीज :- रं


४. काकिनी


वास :- अनाहत चक्र
मूल शक्ति :- रौद्री
आसन :- द्वादशदल कमल
सहचर :- ईशान रूद्र
बीज :- यं


५. शाकिनी


वास :- विशुद्ध चक्र
मूल शक्ति :- पंचमुखी शक्ति
आसन :- सोलह दल कमल
सहचर :- पंचमुखी सदाशिव
बीज :- हं


६. हाकिनी


वास :- आज्ञा चक्र
मूल शक्ति :- बहुमुखी शक्ति
आसन :- द्विदल कमल
सहचर :- लिंगरूप शिव
बीज :- ॐ

Thursday, 8 May 2014

देवी मंदिर पचनेही - भद्रकाली - Devi Mandir Pachanehi - Pachnehi - Bhadrakali Mandir Pachnehi

देवी मंदिर पचनेही - भद्रकाली - Devi Mandir Pachanehi - Pachnehi - Bhadrakali Mandir Pachnehi


अपनी इस बार की यात्रा के दौरान मैं इस मंदिर में भी पहुंचा जहाँ के बारे में माना जाता है की यदि श्रद्धा पूर्वक कोई भी मन्नत मांगी जाये तो उसे पूरा होने में बिलकुल भी समय नहीं लगता - इस गांव में होने वाले किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले इस मंदिर पर उपस्थिति दर्ज़ करवाना आवश्यक माना जाता है - इस मंदिर में आने के बाद ही लोग किसी कार्य में आगे जाते हैं -!



वस्तुतः यह पूरा गांव मूल रूप से राजपूतों का है और यहाँ पर मूल रूप से राजपूतों की उपजाति वैश रहते हैं - जिनका मूल निवास उन्नाव जिले के डौंडिया खेरा में माना जाता है जहाँ अभी कुछ दिनों पहले केंद्रीय सरकार के द्वारा कुछ अफवाहों के आधार पर स्वर्ण खुदाई का बड़ा लम्बा ताम-झाम लगाया गया था -!


जैसा की लगभग बहुत से लोगों को मालूम होगा किवदंतियों के आधार पर वैश राजपूतों का वर्गीकरण निम्न प्रकार है -!


मूल जाति :- क्षत्रिय
उपजाति :- वैस / बैस
वंश :- वंश का आधार कई जगह पर भिन्न - भिन्न माना जाता है जैसा की मैंने जब कई जगहों पर इस बात का विश्लेषण किया तो कहीं मुझे - चंद्रवंशी और कई जगह सूर्यवंशी के उद्धवरण मिले - लेकिन सर्वमान्य तथ्य है की इनका सम्बन्ध सूर्यवंश से है और किवदंतियों के आधार पर ये भगवान श्रीराम के लघु भ्राता लक्ष्मण के वंशज माने जाते हैं - इनकी कुलदेवी माता भद्रकाली हैं एवं इनका जनजातीय टोटम कोबरा माना जाता है -!


मूल स्थान :- डौंडिया खेरा जिला उन्नाव उत्तर प्रदेश


मंदिर एवं मूर्ति उद्भव :- जहाँ पर आज मंदिर बना हुआ है वहां पर मूर्ति का उद्भव जमीन के अंदर से हुआ है और वास्तव में यह मूर्ति देखने पर शिवलिंग की तरह दिखती है जिसकी वजह से इस गावं में रहने वाले नयी पीढ़ी के लोगों को इस बात तक का पता नहीं है की यह मूर्ति किस देवी या देवता की है - उन्हें बस इतना पता है की यह देवी जी का मंदिर है -!


इस मूर्ति का उद्भव भी कब हुआ यह ठीक - ठीक कह पाना मुश्किल है क्योंकि इसके बारे में भी इस गावं में लोग कुछ बता पाने में असमर्थ हैं तो जाहिर सी बात है की इस मूर्ति के लिए भवन निर्माण का कार्य सर्वप्रथम किसने करवाया यह जान पाना भी बहुत मुश्किल सा है -!


लेकिन प्रचलित जनश्रुतिओं के आधार पर यह प्रचलित है की एक दिन रात में तत्कालीन किसी पूर्वज को सपने में देवी माँ ने दर्शन दिए और कहा कि " फलां जगह पर मेरी पिंडी जमीन से बाहर निकेलगी - उस स्थान पर मेरी पूजा होगी - लेकिन ध्यान रहे जिस स्थान पर मेरी पिंडी का उद्भव होगा वहां पर मेरी पिंडी के साथ कोई छेड़छाड़ या नहीं की जाये - यदि किसी ने भी ऐसा करने की कोशिश की तो उसे मेरे कोप का भाजन बनना पड़ेगा "-!



इस सम्बन्ध में गांव के ही कुछ नयी सोच रखने वाले लोगों ने जब कुछ सालों पहले इस बात का खंडन करने के उद्देश्य से पिंडी के पास कुछ निर्माण कार्य करने की सोच के साथ कार्य प्रारम्भ करवाने की कोशिश की तो उन्हें कई प्रकार की मानसिक एवं शारीरिक विपत्तियों का सामना करना पड़ा -!





इसके बाद तत्कालीन पूर्वजों ने मंदिर का निर्माण करवा दिया - फिर धीरे - धीरे मंदिर प्रांगड़ की दीवारें जो मिटटी और चूने से बानी हुयी थीं ध्वस्त होने लगीं -!


नवयुवा समाज से गांव के कुछ संपन्न लोगों द्वारा काफी सहयोग भी प्रदान किया जा रहा है माध्यम से इस सिद्ध मंदिर के कायाकल्प होने के आसार नजर आ रहे हैं -!


धनाभाव के चलते पिछले नवरात्रों में नवयुवक कमेटी द्वारा मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम पर प्रश्नचिन्ह लग जाने की वजह से गावं के ही पुत्र एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा के श्री राजाबाबू सिंह जो वर्तमान इंडो तिब्बत सेना के इंस्पेक्टर जनरल के पद पर आसीन हैं उनके द्वारा समस्त खर्च वहन किया गया तथा इस बात का संकल्प लिया की आने वाले समय में भी वे इस कार्य को अनवरत जारी रखेंगे -!




मैं उम्मीद करता हूँ कि तथाकथित इंस्पेक्टर जनरल साहब जो की धार्मिक कार्यों में बहुत रूचि लेते हैं इस पवित्र कार्य में हमेशा अपना योगदान देते रहेंगे और इस अलख को जगाये रहेंगे - जिससे की आने वाली पीढ़ियों में भी अपने धर्म - देवस्थानों तथा धार्मिक कार्यों रुझान बने एवं लोग भौतिकता से उठकर आध्यात्म को पहचानें -!


इसके पश्चात गांव के कुछ नवयुवा लोगों ने एक कमेटी का गठन किया और नवरात्रों में मूर्ति स्थापना इत्यादि के कार्यक्रमों का आयोजन होने लगा - इसके बाद कुछ अभिभावकों ने एक कमेटी का गठन किया और ग्राम समाज के सहयोग से मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ - आज काफी हद तक पुनर्निर्माण का कार्य हो चूका है एवं अनवरत जारी भी है -!


विशेष :- इस गांव की एक खास बात यह है की आज तक यहाँ कोई मुस्लिम नहीं रह सकता - यह किसी इंसान की विरोधी प्रवृत्ति नहीं है बल्कि यह प्राकृतिक चक्र है - इस प्रकार की किवदन्तिओं को असत्य सिद्ध करने के लिए अब तक कई मुस्लिम परिवारों के द्वारा ऐसी कोशिशें की गयी हैं लेकिन कभी भी उनका समय काल कुछ वर्षों से ज्यादा का नहीं रहा और अंततः उनका सब कुछ इसी गांव में स्वाहा हो गया ना घर बचा ना परिवार अब इसे क्या कहेंगे यह तो मैं नहीं कह सकता बस इसे एक दैवी खेल के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता -!




Monday, 31 March 2014

Chandika Dalam - चंडिका दलम

चण्डिका दलम एक बहुत ही प्रभावशाली स्तोत्र है - जिसका अनुष्ठान करके किसी भी तरह कि ऊपरी हवा - प्रेत दोष - इतर योनि दोष इत्यादि का निवारण होता है -!

यह स्तोत्र स्वयं सिद्ध है अतः इसे सिद्ध करने कि कोई आवश्यकता नहीं होती बस इसका विधिवत अनुष्ठान करें और सरे दोषों से मुक्ति स्वतः ही मिल जायेगी -!

इस स्तोत्र का अनुष्ठान ४० दिनों का होता है इन चालीस दिनों से पहले ही आपको इसका प्रभाव स्पष्ट नजर आने लगेगा - किन्तु कई बार गृह दोषों या नक्षत्र दोषों कि वजह से तत्काल प्रभाव परिलक्षित नहीं होता है इसलिए चिंता करने कि कोई बात नहीं होती बस मन लगाकर समर्पण से स्तोत्र का पाठ अंततः आपको सारी बाधाओं से मुक्ति दिलाता है -!







विधि :-


समय :- मध्य रात्रि १२:०० बजे 

आसन :- लाल रंग का 

दिशा :- उत्तर या पूर्व कि अपनी सुविधानुसार चुनें 

साधन :- माता चंडिका का एक चित्र किसी चौकी पर स्थापित करें जिस पर लाल रंग का आसन बिछा हुआ हो इसके बाद माँ को लाल रंग कि चुनरी समर्पित करें और अपनी समस्या को माँ के सामने दोहराएँ तथा निवारण के लिए उनसे प्रार्थना करें -!

पूजा विधान :- पंचोपचार 

अ. धुप ( धुप / अगरबत्तियां गुग्गल कि होनी चाहिए )

ब. दीप ( दीपक चौमुखी होगा एवं सरसों के तेल का होगा )

स. पुष्प ( पुष्प लाल रंग के होंगे - गुलाब हो तो अति उत्तम )

द. इत्र ( इत्र भी गुलाब का ही होगा )

य. नैवेद्य ( नैवेद्य में ऋतुफल / भोजन सामग्री होगी जो कम से कम एक व्यक्ति के खाने योग्य हो )


स्तोत्र का पाठ करें ( स्तोत्र का पाठ करते समय उच्चारण इतना तेज होना चाहिए कि आवाज आपके चारों तरफ या फिर जिस कमरे में आप पाठ कर रहे हों उस पुरे कमरे में गूंजे )


र. आरती :- ( आरती में माता चंडिका की कोई भी आरती गायें जैसे कि " ॐ जय अम्बे गौरी " या फिर " मंगल कि सेवा सुन मेरी देवा हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े "


ल. प्रदक्षिणा :- प्रदक्षिणा / परिक्रमा के लिए यदि पूजा स्थल में पर्याप्त जगह न हो तो अपने स्थान पर खड़े होकर चारों तरफ घूम जाएँ और कल्पना करें कि माँ कि परिक्रमा कर रहे हैं )





Thursday, 27 March 2014

Surya Dwadash Naam - सूर्य द्वादश नाम

Surya Dwadash Naam - सूर्य द्वादश नाम



अथ सूर्य द्वादश नाम

आदित्य: प्रथमं नाम द्वितीयं तु विभाकर: ।
तृ्तीयं भास्कर: प्रोक्तं चतुर्थं च प्रभाकर: ।।


पंचम च सहस्त्रांशु षष्ठं चैव त्रिलोचन: ।
सप्तमं हरिदश्वश्च अष्टमं च विभावसु: ।।


नवमं दिनकृ्त प्रोक्तं दशमं द्वादशात्मक: ।
एकादशं त्रयोमूर्तीद्वादशं सूर्य एव च ।।


द्वादशैतानि नामानि प्रात:काले पठेन्नर: ।
दु:स्वप्ननाशनं सद्य: सर्वसिद्धि: प्रजायते ।।


आयुरारोग्यमैश्वर्य पुत्र-पौत्र प्रवर्धनम ।
ऎहिकामुष्मिकादीनि लभन्ते नात्र संशय: ।।



इति सूर्य द्वादश नाम


Surya - Soorya Aditya Hraday Stotram - सूर्य - आदित्य ह्रदय स्तोत्र

आदित्यहृदय स्तोत्र

नोट :- भिन्न - भिन्न जगहों पर उपलब्ध स्तोत्र में कुछ श्लोकगत भिन्नता मिल सकती है किन्तु उस भिन्नता कि वजह से कोई प्रभाव नहीं पड़ता सबसे पड़ा प्रभाव आपकी एकाग्रता और समर्पण का होता है - इसलिए जब भी स्तोत्र जाप करें तो ध्यान रखें कि आपका पूरा ध्यान आपकी साधना पर हो -!



विनियोग

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्येहृदयभूतो

भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास

ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः हृदि।

ॐ बीजाय नमः, गुह्यो। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयो। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः नाभौ।

करन्यास

ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवरवते अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादि अंगन्यास

ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्।

ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्।

इस प्रकार न्यास करके निम्नांकित मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।



स्तोत्र प्रारम्भ 

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम् ।1।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा ।2।

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ।3।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ।4।

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम् ।5।

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ।6।

सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ।7।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ।8।

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ।9।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः ।10।

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ।11।

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः ।12।

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ।13।

आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः।14।
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते।15।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ।16।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ।17।

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ।18।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ।19।

तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ।20।

नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ।21।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ।22।

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः ।23।

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ।24।

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति ।25।

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ।26।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ।27।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ।28।

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ।29।

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ।30।



हिंदी अर्थ


उधर श्री रामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।

सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।

भगवान सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका (रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम मंत्रों के द्वारा) पूजन करो।

सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं।

इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है 'आदित्यहृदय'। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्ष्य और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।

इन्हीं के नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुर्वणसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक अथवा हरे रंग के घोड़े वाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणों से सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू (कल्याण के उदगमस्थान), त्वष्टा (भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने वाले), अंशुमान (किरण धारण करने वाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से ही सुख देने वाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहरकर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुति के पात्र), अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ (आकाश के स्वामी), तमोभेदी (अन्धकार को नष्ट करने वाले), ऋग, यजुः और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टि के कारण), अपां मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विन्ध्यीथीप्लवंगम (आकाश में तीव्रवेग से चलने वाले), आतपी (घाम उत्पन्न करने वाले), मण्डली (किरणसमूह को धारण करने वाले), मृत्यु (मौत के कारण), पिंगल (भूरे रंग वाले), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोदभव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त) हैं। (इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव !) आपको नमस्कार है।

पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।

आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है, आपको नमस्कार है।

(परात्पर रूप में) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा हैं, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।

आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।

आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरि (अज्ञान का हरण करने वाले) और विश्वकर्मा (संसार की सृष्टि करने वाले) हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।

रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं।

ये सब भूतों में अन्तर्यामीरूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।

(यज्ञ में भाग ग्रहण करने वाले) देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।

'राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।'

इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।

महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे।' यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये।

उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजी ने धनुष उठाकर रावण की ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया।

उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखा और निशाचराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा "रघुनन्दन" !" अब जल्दी करो "।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पंचाधिकशततमः सर्गः

Wednesday, 12 March 2014

64 Yogini - Chausath Yogini - ६४ योगिनी - चौसठ योगिनी

64 Yogini - Chausath Yogini - ६४ योगिनी - चौसठ योगिनी 



मातृका शक्ति :- सीधा सा सम्बन्ध है इस शब्द का जिसमे प्रकृति या ऐसी शक्ति का बोध होता जो उत्पन्न करने और पालन करने का दायित्व निभाती है --- जिसने भी इस शक्ति की शरण में खुद को समर्पित कर दिया उसे फिर किसी प्रकार कि चिंता करने कि कोई आवश्यकता नहीं वह परमानन्द हो जाता है ---- चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता आदिशक्ति कि सहायक शक्तियों के रूप में चिन्हित कि जाती हैं जिनकी मदद से माता आद्या इस संसार का राज काज चलाती हैं एवं श्रष्टि के अंत काल में ये मातृका शक्तियां वापस माँ आद्या में पुनः विलीन हो जाती हैं और सिर्फ माँ आदिशक्ति ही बचती हैं फिर से पुनर्निर्माण के लिए !


बहुत बार देखने में आता है कि लोग वर्गीकरण करने लग जाते हैं और उसी वर्गीकरण के आधार पर साधकगण अन्य साधकों को हीन / हेय दृष्टि से देखने लग जाते हैं क्योंकि उनकी नजर में उनके द्वारा पूजित रूप को वे मूल या प्रधान समझते हैं और अन्य को द्वितीय भाव से देखते हैं --- जबकि ऐसा उचित नहीं है --- हर साधक का दुसरे साधक के लिए सम भाव होना चाहिए -- मैं भ्रात भाव तो नहीं कहूंगा यहाँ पर क्योंकि अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो आज के युग में सबसे ज्यादा वैमनस्य कि भावना भाइयों के मध्य ही विद्यमान है !

किन्तु नैतिक दृष्टिकोण और अध्यात्मिकता के आधार पर यदि देखा जाये तो न तो कोई उच्च है न कोई हीन --- हम आराधना करते हैं तो कोई अहसान नहीं करते यह सिर्फ अपनी मानसिक शांति और संतुष्टि के लिए और अगर कोई दूसरा करता है तो वह भी इसी उद्देश्य कि पूर्ती के लिए !

अब अगर हम अपने विषय पर आ जाएँ तो इस मृत्यु लोक में मातृ शक्ति के जितने भी रूप विदयमान हैं सब एक ही विराट महामाया आद्यशक्ति के अंग / भाग / रूप हैं --- साधकों को वे जिस रूप की साधना करते हैं उस रूप के लिए निर्धारित व्यवहार और गुणों के अनुरूप फल प्राप्त होता है।

चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता दुर्गा कि सहायक शक्तियां है जो समय समय पर माता दुर्गा कि सहायक शक्तियों के रूप में काम करती हैं

एवं दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह मातृका शक्तियां तंत्र भाव एवं शक्तियों से परिपूरित हैं और मुख्यतः तंत्र ज्ञानियों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं !



प्रमुख मंदिर :- मंदिरों के हिसाब से देखा जाये तो चौसठ योगिनियों के २ प्रमुख मंदिर उड़ीसा राज्य में और २ प्रमुख मंदिर मध्य प्रदेश में अवस्थित हैं !

उड़ीसा :-

१. एक प्रमुख मंदिर उड़ीसा में नवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था जो खुर्दा डिस्ट्रिक्ट हीरापुर में भुवनेश्वर से १५ किलोमीटर कि दूरी पर स्थित है !
२. दूसरा चौंसठ योगिनी मंदिर ( रानीपुर झरिअल ) टिटिलागढ़ बलांगीर डिस्ट्रिक्ट में स्थित है लेकिन इस मंदिर में ६४ के बजाय अब ६२ मूर्तियां ही उपलब्ध हैं !


मध्य प्रदेश :-


१. नविन शताब्दी में ही निर्मित एक मंदिर मध्य प्रदेश के खजुराहो नामक स्थान पर है जो छतरपुर डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है और यहाँ पहुँचने के लिए झाँसी से इलाहबाद वाली रेलवे लाइन से जाकर महोबा स्टेशन पर उतरने के बाद लगभग ६० किलोमीटर का सफ़र तय करने के बाद खजुराहो पहुंचा जा सकता है

२. दूसरा मंदिर मध्य प्रदेश में ही भेड़ाघाट नमक स्थल पर है जो कि मध्य प्रदेश के जबलपुर डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है

अन्य :- स्थान स्थान पर इनके रूप और स्थित में भेद दृष्टिगत हो सकता है जैसे कि :-

१. हीरापुर में सभी योगिनियां अपने -२ वाहनों पर सवार हैं और खड़ी मुद्रा में हैं
२. रानीपुर झरिअल में सभी योगिनियां नृत्य मुद्रा में हैं
३. जबकि भेड़ाघाट में सभी मूर्तियां ललितासन में बैठी हुयी हैं 


A. हीरापुर में जिन नामों या रूपों का अस्तित्व मिलता है वे इस प्रकार हैं :-

१. बहुरूपा
२. तारा
३. नर्मदा
४. यमुना
५. शांति
६. वारुणी
७. क्षेमकरी
८. ऐन्द्री
९. वाराही
१०. रणवीरा
११. वानरमुखी
१२. वैष्णवी
१३. कालरात्रि
१४. वैद्यरूपा
१५. चर्चिका
१६. बेताली
१७. छिनमास्तिका
१८. वृषभानना
१९. ज्वाला कामिनी
२०. घटवारा
२१. करकाली
२२. सरस्वती
२३. बिरूपा
२४. कौबेरी
२५. भालुका
२६. नारसिंही
२७. बिराजा
२८. विकटानन
२९. महालक्ष्मी
३०. कौमारी
३१. महामाया
३२. रति
३३. करकरी
३४. सर्पश्या
३५. यक्षिणी
३६. विनायकी
३७. विन्द्यावालिनी
३८. वीरकुमारी
३९. माहेश्वरी
४०. अम्बिका
४१. कामायनी
४२. घटाबारी
४३. स्तुति
४४. काली
४५. उमा
४६. नारायणी
४७. समुद्रा
४८. ब्राह्मी
४९. ज्वालामुखी
५०. आग्नेयी
५१. अदिति
५२. चन्द्रकांति
५३. वायुबेगा
५४. चामुंडा
५५. मूर्ति
५६. गंगा
५७. धूमावती
५८. गांधारी
५९. सर्व मंगला
६०. अजिता
६१. सूर्य पुत्री
६२. वायु वीणा
६३. अघोरा
६४. भद्रकाली 


अब इसके बाद कहीं - कहीं पर एक भ्रम और पैदा होता है यदि प्राचीन ग्रंथों का अध्यन और आकलन किया जाये वो ये कि :- क्या योगिनियों कि संख्या चौसठ है या फिर इक्यासी किन्तु हम यहाँ पर सिर्फ सर्वमान्य संख्या चौंसठ को ही मानकर चल रहे हैं !


वैसे इसका एक सिद्धान्त ये है कि यदि हम ८ मातृका शक्तिया मानकर चलते हैं तो ये ८ सहायक सहकतियों के साथ मिश्रित होती हैं जिससे इनकी संख्या ८ गुना ८ = ६४ होती है किन्तु जब हम ९ मातृका शक्तियों के आधार पर गणना करते हैं तो इनकी संख्या ८१ हो जाती है - प्रत्येक मातृका शक्ति एक योगिनी के रूप में गणित होती है और अन्य ८ मातृका शक्तियों के साथ गुणित कि जाती है !


जय माता महाकाली

Chausath Yogini Mantra - चौसठ योगिनी मंत्र - 64 Yogini Mantra - ६४ योगिनी मंत्र

Chausath Yogini Mantra - चौसठ योगिनी मंत्र - 64 Yogini Mantra - ६४ योगिनी मंत्र 



चौंसठ योगिनी मंत्र :-


१. ॐ काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा
२. ॐ कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा
३. ॐ कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा
४. ॐ कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा
५. ॐ विरोधिनी विलासिनी स्वाहा
६. ॐ विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा
७. ॐ उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा
८. ॐ उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा
९. ॐ दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा
१०. ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा
११. ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा
१२. ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा
१३. ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा
१४. ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा
१५. ॐ मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा
१६. ॐ महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा
१७. ॐ कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा
१८. ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा
१९. ॐ नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा
२०. ॐ भेरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा
२१. ॐ वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा
२२. ॐ महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा
२३. ॐ शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा
२४. ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा
२५. ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा
२६. ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा
२७. ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा
२८. ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा
२९. ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा
३०. ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा
३१. ॐ चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा
३२. ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा
३३. ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा
३४. ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा
३५. ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा
३६. ॐ काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा
३७. ॐ शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा
३८. ॐ हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा
३९. ॐ तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा
४०. ॐ षोडशी लतिका देवी स्वाहा
४१. ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा
४२. ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा
४३. ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा
४४. ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा
४५. ॐ बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा
४६. ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा
४७. ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा
४८. ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा
४९. ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा
५०. ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा
५१. ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा
५२. ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा
५३. ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा
५४. ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा
५५. ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा
५६. ॐ चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा
५७. ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा
५८. ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा
५९. ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा
६०. ॐ ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा
६१. ॐ वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा
६२. ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा
६३. ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा
६४. ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा






जय माता महाकाली

Mata Mansa - माता मनसा देवी

Mata Mansa - माता मनसा देवी




माता मनसा देवी मुरादो को पूरा करने वाली देवी है । कहते हैं कि मनसा देवी का जन्म संत कश्यप के मस्तिष्क से हुआ है । मनसा देवी को भी सिद्ध पीठो में गिना जाता है ।

मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री भी माना जाता है । माता मनसा देवी के साथ एक बहुत ही प्रचलित कथा जुडी हुयी है जिसका उल्लेख मैं यहाँ करना चाहूंगा - और इस कथा को हमारे बहुत से साधक लोग एक पुरानी फ़िल्म में भी देख चुके हैं - याद करवाने के लिए मैं उस फ़िल्म का दूँ " नाग पंचमी " ।

सती बेहुला चम्पक नगरी में चन्द्रधर नामक एक धनी वैश्य था । वह परम शिव-भक्त था - किन्तु मनसा देवी से उसका बड़ा विरोध था ।


इस विरोध का मुख्य कारन था कि मनसा देवी चंद्रधर से अपनी खुद कि पूजा करवाना चाहती थीं क्योंकि चंद्रधर के बारे में मशहूर था कि वह भगवान शिव का अनन्य भक्त है और वह उनके अलावा किसी और का नाम तक नहीं लेता - इसी विरोध के कारण मनसा देवी ने चन्द्रधर के छह पुत्रों को विषधर नागों से डंसवा कर मरवा डाला ।


सातवें पुत्र लक्ष्मीचंद्र का विवाह उज्जयिनी के धार्मिक साधु नामक वैश्य की परम सुन्दरी साध्वी कन्या बेहुला के साथ हुआ। लक्ष्मीचंद्र की कुण्डली देखकर ज्योतिषियों ने बता दिया था कि विवाह की प्रथम रात्रि में ही सांप के काटने से इसकी मृत्यु हो सकती है ।


चन्द्रधर ने लोहे का ऐसा मजबूत घर बनवाया, जिसमें वायु भी प्रवेश न कर सके, मगर मनसा देवी ने भवन-निर्माता से छोटा-सा छेद छोड़ देने के लिए कह दिया ।


विवाह-रात्रि को नागिन ने लक्ष्मीचंद्र को डंस लिया और वह मर गया। सारे घर में शोर मच गया। तब उसकी पत्नी बेहुला ने केले के पौधे की नाव बनवाई और पति के शव को लेकर, उसमें बैठ गई। उसने लाल साड़ी पहन रखी थी और सिन्दूर लगा रखा था । नदी की लहरें उस शव को बहुत दूर ले गईं ।


वह अपने पति को पुन: जिन्दा करने पर तुली हुई थी । बहुत दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया, जिससे उसका शरीर सूख गया था । लक्ष्मीचंद्र के शरीर से दुर्गन्ध भी आने लगी थी । उसके सारे शरीर में कीड़े पड़ गए थे । मात्र उसका कंकाल ही शेष रह गया था ।

बेहुला नाव को किनारे की ओर ले चली ।


उसने वहां एक धोबिन के मुख से तेज टपकते देखा ।


उसके कठोर तप को देखकर ही मनसा देवी ने उसे वहां भेजा था ।


उसने बेहुला से कहा :-


"तुम मेरे साथ देवलोक में चल कर अपने नृत्य से महादेव को रिझा दो तो तुम्हारे पति पुन: जिन्दा हो जाएंगे।"


बेहुला ने उसकी सलाह मान ली। वह उसके साथ चल पड़ी पति की अस्थियां उसके वक्षस्थल से चिपकी थीं। वह अपने पति की स्मृति से उन्मत्त होकर नृत्य करने लगी। सारा देव समुदाय द्रवित हो गया। मनसा देवी भी द्रवित हो गईं। लक्ष्मीचंद्र जीवित हो गया और इसके साथ ही बेहुला का नाम अमर हो गया।



माता मनसा देवी कि एक अन्य कथा :- 
 
मुग़ल सम्राट अकबर के समय की बात हैं कि चंडीगढ़ के पास मनीमाजरा नामक स्थान हैं! यह जागीर एक राजपूत जागीरदार के अधीन थी ! सम्राट कृषकों से लगान के रूप में अन्न वसूल करवाता था ! एक बार प्राकृतिक प्रकोप वश फसल बहुत कम हुई जिससे जागीरदार वसूली करने में असमर्थ रहे !

इसलिए उन्होंने अकबर से लगान माफ़ करने की प्रार्थना की ! 

यद्यपि बादशाह अकबर काफी अच्छा शासक था लेकिन उसने जागीरदारों की कोई बात नहीं मानी व् क्रोधित होकर उन सब जागीरदारों  को जेल में डालने का हुक्म दे दिया ! इस बात की खबर पूरे गाँव में फ़ैल गई ! 

माँ का भक्त गरीबदास यह सुनकर बहुत दुखी हुआ ! उसने दुर्गा माँ से प्रार्थना कि माता प्रसन्न होकर हमें कष्ट से उबारो व् जागीरदारों को मुक्त करवा दो !

भक्त की प्रार्थना से प्रसन्न हो माता बोली तू जो चाहता हैं वैसा ही आशीर्वाद देती हूँ !

कुछ समय बाद सब जागीरदार अपने २ घरों को लौटेंगे !

गरीबदास माँ के चरणों में गिर गया और बोला - माता तेरा खेल निराला हैं !

तू सर्व शक्तिमान हैं !

 आप अपने भक्तों की सदा रक्षा करती हैं ! 

कुछ समय बाद सभी जागीरदार प्रसन्न चित्त अपने २ घर लौट आये ! 

माँ की महिमा उन सबको मालूम हो गई ! 

सबने मिलकर वहाँ एक मंदिर बनवा दिया जो की मनसा देवी के अर्थात इच्छा पूर्ण करने वाली देवी के नाम से विख्यात हो गया !

एक अन्य दंत कथा के अनुसार :-

मनसा देवी का नाम महंत मंशा नाथ के नाम पर पड़ा बताया जाता है। महंत मंशा नाथ का धूना आज भी मनसा देवी की सीढि़यों के शुरू में बाई ओर देखा जा सकता है।

श्री माता मनसा देवी के सिद्घ शक्तिपीठ पर बने मंदिर का निर्माण मनीमाजरा ( चंडीगढ़ - पंचकुला - हरयाणा ) के राजा गोपाल सिंह ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर लगभग पौने दो सौ वर्ष पूर्व चार वर्षो में अपनी देखरेख में सन 1815 ईस्वी में पूर्ण करवाया था।

पंचकूला हरियाणा के जिला पंचकूला में ऐतिहासिक नगर मनीमाजरा के निकट शिवालिक पर्वत मालाओं की गोद में सिंधुवन के अतिंम छोर पर प्राकृतिक छटाओं से आच्छादित एकदम मनोरम एवं शांति वातावरण में स्थित है-सतयुगी सिद्घ माता मनसा देवी का मंदिर।

मूर्ति के आगे तीन पिंडियां है, जिन्हे मां का रूप ही माना जाता है। ये तीनों पीडिंया महालक्ष्मी, मनसा देवी तथा सरस्वती देवी के नाम से जानी जाती है।

एक अन्य दंत कथा के अनुसार :-

कहते हैं कि एक बार पटियाला महाराजा माता मनसा देवी मंदिर में शीश नवाने आए, लेकिन मंदिर के द्वार बंद हो चुके थे। पटियाला महाराजा ने द्वार खुलवाने चाहे, परतु द्वार नहीं खुले, तो महाराजा ने प्रण लिया कि मैं मा के एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाने के बाद अब माता मनसा देवी मंदिर में आऊंगा और उन्होंने इस प्रण को पूरा किया।


माता मनसा देवी के बारे में कुछ तथ्य :-

१. मनसा देवी का मंदिर हरिद्वार में हरकी पैड़ी के पास गंगा किनारे पहाड़ी पर स्थित आस्था का केन्द्र है।

२. मनसा देवी का उल्लेख पुराणों में है। 'मनसा' शब्द का प्रचलित अर्थ इच्छा है। कहा जाता है कि माँ मनसा सच्चे मन वाले हर श्रद्धालु की इच्छा को पूरा करती हैं।

३. देवी का जन्म संत कश्यप के मस्तिष्क से हुआ है। उन्हें नाग राजा वासुकी की पत्नी भी माना जाता है।


४. हरिद्वार के चंडी देवी और माया देवी के साथ मनसा देवी को भी सिद्ध पीठों में प्रमुख माना जाता है।


५. मनसा ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या करके वेदों का अध्ययन किया और कृष्ण मंत्र प्राप्त किया, जो कल्पतरु मंत्र कहलाता है।


६. देवी ने कई युगों तक पुष्कर में तप किया। भगवान कृष्ण ने दर्शन देकर वरदान दिया कि तीनों लोकों में तुम्हारी पूजा होगी।

७. देवी की पूजा गंगा दशहरा के दिन बंगाल में भी की जाती है।


८. कृष्णपक्ष पंचमी (नाग पंचमी ) को भी देवी पूजी जाती हैं। मान्यता है कि इस दिन घर के आँगन में नागफनी की शाखा पर मनसा देवी की पूजा करने से विष का भय नहीं रह जाता।

९. मनसा देवी की पूजा के बाद ही नागों की पूजा होती है।


१०. कहते है कि मां मनसा देवी के मंदिर में यदि कोई भक्त लगातार चालीस दिनों तक दीपक जलाए और सच्चे मन से पूजा-अर्चना कर मां के दरबार में अपनी अर्जी लगाता है तो उसे वांछित फल अवश्य मिलता है।


११. इंद्रासणी मनसा देवी मंदिर, कन्दली पट्टी गाँव में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। किंवदंतियों के अनुसार माना जाता है कि यह एक प्राचीन मंदिर है जो कि आदि गुरु शंकराचार्य के ज़माने में निर्मित किया गया था। इंद्रासणी मनसा देवी मंदिर नागों की देवी मनसा माता को समर्पित है। रुद्रप्रयाग शहर से 6 किमी की दूरी पर स्थित यह मंदिर अनोखी वास्तुकला शैली का प्रदर्शन करता है। महाकाव्य स्कन्द पुराण, देवी भागवत और केदारखंड के अनुसार इंद्रासणी देवी को ‘कश्यप’ की मानसी कन्या के रूप में जाना जाता है। मनसा देवी को वैष्णवी, शिवी और विषहरी के नाम से भी जाना जाता है


१२. एक लोककथा से पता चलता है कि देवी सांप के काटने से बीमार हुए व्यक्तियों को ठीक कर सकती है।


१३. वह साँपों के कुल की अधिष्ठात्री मानी गई है।


१४. मन से उत्पन्न।


प्रमुख मंदिर क्षेत्र :-


१. हरिद्वार


२. हरियाणा-पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ से लगभग आठ किलोमीटर दूर मनीमाजरा की शिवालिक शृंखलाओं पर स्थित मनसा माता का सिद्ध स्थान है जिसकी गणना 51 शक्तिपीठों में की जाती है।



Jai Mata Mahakli